गुरुवार, 13 दिसंबर 2012



           सोनिया मैडम गजब की सपेरिन हैं । मुलायम और माया रुपी खतरनाक साँपों कि जो कि एक दूसरे की जान के प्यासे रहते हैं , मैडम नें ना जानें कौन सी जादू की लकड़ी सूँघा दी है कि जब मैडम के हित की बात होती है तो वे दोनों ही आपसी संग्राम को बन्द कर देते हैं और एक सुर में मैडम की आरती उतारनें लगते हैं ।
            अभी वाल मार्ट का मामला चल रहा है , जबकी संसद के दोनों सदन में , मुलायम व माया के अघोषित  युद्ध विराम से जो कि सोनिया मैडम के भय के कारण हुआ  वाल मार्ट नें भारतीय नेताओं की प्रवृत्ति को परखते हुए , कुछ करोंड़ रुपये खर्च करके भारतीय अर्थव्यवस्था पर घुसपैठ करनें का जुगाड़ कर लिया है । कमाल यह है कि जनता को बताया जा रहा है कि वाल मार्ट के आनें से देश के लोगों के लाभ होगा , यहाँ उन लाभों को गिनानें की जरुरत नहीं है । 
            बात हो रही थी मुलायम और माया जैसे खतरनाक साँपों कि जो मैडम सोनिया के सामनें दन्त-विहिन और विष-विहिन हो जातें है । पूरे देश नें देखा किस प्रकार माया और मुलायम नें देंश की महान जनता को सदैव की तरह मूर्ख समझकर , खूब कोसा मालमार्ट को , लेकिन जब फैसले का वक्त आया तो दोनों सापों नें मैडम के पिटारे में रहना ज्यादा पसन्द किया । पता नहीं हमारे देश की जनता कब तक जाति पाँति आधारित सोच को ढोती रहेगी जिसका फायदा तमाम नीच किस्म के नेता सदा से उठा रहे हैं ।
             अब बात चल निकली है , नौकरियों में प्रमोशन पर आरक्षण की । दोनों साँपों को मैडम , अपनें पिटारे से उस समय निकाल देती हैं जब , देश को डँसनें जैसा कोई काम नहीं रहता । छोटे-मोटे , अन्य कई और भी साँप हैं  जो मैडम को बताते रहते हैं कि हम भी विषधर हैं और देश को स्थायी रुप से डँस सकते हैं , लेकिन मैडम कुशल सपेरिन हैं , सभी साँपों को सही समय पर विष निकालनें का अवसर प्रदान करती है । 
               हाँ , बात नौकरी में प्रमोशन को लेकर हो रही थी । मैडम की पार्टी नें नौकरी में प्रमोशन का झुनझुना बजाया था ,  माया नें मैडम से परमिशन लेकर इसके पक्ष में बोलना शुरु कर दिया है , और मुलायम नें खिलाफ में । उत्तर प्रदेश की जनता में फिर टकराव होगा , लोग मरेंगे , ये दोनों साँप अपनें राजनीतिक विष को उगलेंगे जिससे इन दोनों साँपों को फायदा होगा , और जनता के बीच जाति की खाईं और चौड़ी होगी , जो कि मैडम सोनिया के देश पर हुकूमत के लिये आवश्यक है ।
               हे , देश प्रदेश की जनता , आप लोग कब तक मूर्ख बनते रहोगे । ये मुलायम और माया ,रुपी साँप देश की महान सपेरिन सोनिया जी के पिटारे के साँप हैं उनके विष-दन्तों को निकालना और पुनः लगा देंना मैडम को बखूबी आता है ।             
              इस समय प्रमोशन- प्रमोशन खेलनें के लिये इन दोनों साँपों को मैडम सपेरिन नें अखाड़े में उतार दिया है । दोनों साँपों का एक दूसरे पर विष प्रहार जारी है । जनता भ्रमित है । समझदार साँप अगल-बगल हो गये हैं । लालू और पासवान को कोई रूचि नहीं है अपना जहर खराब करनें में । कोई भी काँग्रेसी साँप अपना जहर नहीं उगल रहा है । वह गिद्ध , चील और कौवे के समान , युद्ध भूमि पर निगाह रखे है । कई अन्य प्रकार के साँप भी हैं जो इन्हीं के बीच अपनें विष-वमन की सोचते होंगे लेकिन अनुकूल समय न होनें के कारण चुप हैं ।
              जनता से अनुरोध है कि वे इन साँपों का पहले से फिक्स प्रमोशन-प्रमोशन के खेल को ना देखे , अन्यथा जहर की बूँदें उसपर पड़ सकती हैं , जिसका फिर कोई इलाज संभव नहीं है ।

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

देश बिकाऊ है खरीदोगे ?



           सर्दी के मौसम के कारण शाम के समय दुकान पर कोई ग्राहक नहीं आया । दुकान बन्द होनें का समय  होनें को आया । तभी दुकान पर मालदार टाईप का सख्श आया और बोला - टुकड़े-टुकड़े में दोगे तो खरीदूँगा । मैं समझा नहीं, मैंनें कहा । वह धीरे से बोला - धीरे -धीरे खरीदूँगा तो दिक्कत नहीं होगी । मैनें कहा - क्या बहुत ज्यादा लेना है । वह बोला यदि सब कुछ सही और मेरी सोच के अनुसार हुआ तो सारा लेंनें की कोशिश करूँगा । अभी कितना दूँ मैनें पूछा । वह बोला - इन सब कामों में इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं होती है । मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ये किस जल्दबाजी की बात कर रहा है । मैंनें फिर भी शालीनता से कहा - जब आप को लेंनें की जल्दी नहीं तो हमें देंनें में भला क्या जल्दबाजी करनी । 
           वह बोला - इसे कहते हैं समझदारी वाली बात । फिर बोला , आप जयचन्द या मानसिंह के रिश्तेदार तो नहीं हैं । मैनें पसीना पोंछते हुए कहा , जय बाबू हमारे पड़ोसी हैं रिश्तेदार नहीं हैं और मान बाबू भी अलग बिरादरी के हैं । वह बोला - अच्छा मजाक करते हैं । पसन्द आया । 
           मेरी समझ में नहीं आया कि मैंनें क्या मजाक किया है , जो ये मेरी तारीफ कर रहा है । मैंनें जोर देकर कहा , साहब मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ वे लोग ना तो मेरी बिरादरी के हैं ना ही मेरे रिश्तेदार हैं ।  वह जोर से हँसते हुए बोला - आप तो प्रेजेन्ट टेंस में उन लोगों का नाम ले रहे हैं । मैंनें घबरा कर पूछा- ऐसा क्यों कह रहे हैं भाई साहब वे लोग तो अभी जिन्दा हैं । वह बहुत जोर से ठहाका लगाकर बोला - आप रियली बहुत उच्च कोटि के विजनेसमैंन हैं , और हर तरह से मुझे जाँच परख लेना चाहते हैं ।
            मैंनें फिर घबरा कर कहा - मैं आप को परख नहीं रहा हूँ , बता रहा हूँ । वह बोला - चलिये अब डील किया जाये । मैंनें पूछा क्या डील करना है । वह बोला - देखिये आसाम और बिहार से शुरु करते हैं । मैंनें कहा - आसाम और बिहार से , क्यों मैं तो बंगाल -- । वह बात कर बोला एक साथ तीनों को सम्भालना मुश्किल हो जायेगा । मैंनें कहा - मैं उसे बढ़ियाँ पैक कर दूँगा , कोई दिक्कत नहीं होगी । वह बोला - ठीक है , हम लोग गुप्त भाषा में ही बात करते हैं । मैंनें कहा - देखिये मैं गुप्त भाषा में नहीं साफ-साफ बात कर रहा हूँ । वह बोला अभी हम केवल असम और बिहार की ही डील कर लेते हैं । मैंनें अनजानें में हाँ कह दिया । वह बोला - मैं जानता था कि कोई ना कोई मिल ही जायेगा बेचनें वाला । मैंनें कहा - मैं यहाँ अकेले नहीं हूँ , और भी लोग बेचते हैं । लेकिन मुझे लगता है कि आपके यहाँ से खरीदनें में ठीक रहेगा । मैंनें कहा - देखिये मैं अब घर जानें की जल्दी में हूँ । वह क्रोधित होकर बोला - इतनी बड़ी डील करनें चले हो और , घर की जल्दी में हो । तुम जैसे लोग सही बेचनें वाले नहीं हो । 
            वह बोला - क्या तुम्हारे घर में बैठकर डील के बारे में बात हो सकती है । मैंनें कहा - भाई साहब , दुकान का कोई माल मैं घर नहीं ले जाता । वह चौंककर बोला - दुकान और माल तुम्हारा मतलब क्या है । तुम देश बेचनें का काम नहीं करते । मैंनें घबरा कर कहा - तौबा-तौबा , ये क्या कह रहे हैं । देश को बेचनें का कारोबार कुछ नेताओं के जिम्मे है । वह मेरे पास आकर कान में बोला - किसी से कहना नहीं , नहीं तो ? मैंनें डरते हुए कहा - नहीं कहूँगा , बेवकूफ हूँ जो आपके हाथ मारा जाऊँ या किसी नेता के चमचे का हाथ मारा जाऊँ । वह फिर बोला - लेकिन तुमनें जो पोस्टर टाँग रखा है , उसे देखो । मैंनें पोस्टर देखा - किसी शरारती लड़के नें - "यहाँ संदेश भी बिकता है"  में से "स" हटा दिया था और वह हो गया था - " यहाँ देश भी बिकता है " इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी  । 

रविवार, 18 नवंबर 2012

बेकार का टापिक --


जय ओसाम जी की , दिग्गी बाबू ।
तुम फिर आ गये लल्लन , और ये तुम जय ओसामा जी क्यों कहते रहते हो ?
क्या , ओसामा से प्रेम खत्म हो गया ?
देखो लल्लन मैं राजनीतिक आदमी हूँ , किसी से स्थाई लगाव नहीं रखता ।
लगता है मैडम आपके इस स्वभाव से परिचित हैं , फिर भी आपका कद मैडम नें कुछ तो बढ़ा ही दिया है ।
तुम काम की बात करो लल्लन ।
सच बतायें आपको देखकर काम की कोई बात दिमाग में आती ही नहीं ।
देखो मैं , टी वी पर ठाकरे जी  की शव यात्रा देख रहा था ।
बहुत लोग शामिल हैं , लगता है जैसे पूरा महाराष्ट्र उमड़ पड़ा है ।
हाँ लल्लन , सम्मान तो उनका था ही ।
उनके जैसा सम्मान तो आपको भी मिल सकता था ।
कैसे ?
पहली बात वे अपनें दल के सुपर पावर थे , और बुरा ना मानियेगा आप अपनीं ही पार्टी में पावर लेस नेता हैं ।
मुझे गुस्सा ना दिलाओ लल्लन ।
सच बात कड़वी होती है , इसमें आपका तनिक भी दोष नहीं है ।
तुम देखना जब मेरा स्वर्गवास होगा , तो उसमें पूरे देश के लोग शामिल होंगे ।
आप क्या सचमुच स्वर्ग में ही जायेंगे , श्योर है , १०० परसेंट ?
मैंनें कभी कोई बुरा काम नहीं किया है , इसलिये ऐसा कह रहा हूँ ।
सच बताइये , ठाकरे जी की मृत्यु से आप पर क्या असर पड़ा ।
यही कि इंसान को एक दिन मृत्यु से जरुर गले मिलना पड़ता है ।
तब आप ऐसा कोई धासूँ काम क्यों नहीं करते कि देश वाले आपको हमेशा याद रखते ? 
लल्लन तुम इस तरह का फालतू टाईप का टापिक क्यों मेरे सामनें उठा दिये ।
हम सोचे कि मातमी माहौल में थोड़ा अपना मूड सही कर लें, इसके लिये आपसे बेहतर देश में कोई और है ही नहीं ।
भागो यहाँ से , राहुल बाबा के यहाँ जानें में देर करा दिया ।
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सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

दिग्गी राजा को मंत्री क्यों नहीं बनाया ?


         जहाँ तक वफादारी की बात है तो मनीष तिवारी से कम तो नहीं थे अपनें दिग्गी राजा , फिर एक को बनाया दूसरे को क्यों छोड़ा , यह हम देश वासी नहीं समझ पा रहे हैं । कहा जाता है कि सलमान भाई नें भ्रष्टाचार के दलदल में सपरिवार गोता लगाकर मात्र ७१ लाख रुपये ही निकाले , एक मंत्री जी नें उनके नौसिखियापन पर कमेन्ट भी किया कि यदि सलमान खुर्शीद असल गोता-बाज या खिलाड़ी होते तो कम से कम ७१ करोड़ रुपये जरुर निकाले होते , यही नहीं  उनकी अक्षमता पर देश भर में हो हल्ला हुआ तो मैडम नें ड्यूटी बदल दी , कि शायद विदेशी सम्पर्क में उनकी क्षमता और गुणवत्ता में वृद्धि हो सके । 
        आखिर दिग्गी राजा का दोष क्या है ? जहाँ तक अनर्गल शब्द बोलनें की बात है तो दिग्गी राजा नें यदि गाली भी दी तो शालीनता के साथ , जबकि मनीष तिवारी , अन्ना को "तुम" और अन्य गन्दे शब्दों के साथ सम्बोधन करते रहे ।
         हमें दिग्गी राजा के साथ-साथ लालू जी के साथ भी पूरी सहानूभूति है । लालू जी का राजनीतिक जन्म ही काँग्रेस विरोध के साथ हुआ था , जय प्रकाश जी के आन्दोलन में उनकी सहभागिता के किस्से हमनें सुनें हैं । जिस आदमी नें अपनें सारे सिद्धान्तों को ठुकरा कर काँग्रेस के दामन को पकड़ा और काँग्रेस पर छोटी कंकड़ फेंकनें वाले पर बड़ा सा पत्थर फेंकनें को तैयार रहनें वाले शख्स को मैडम सोनिया नें क्यों नजर अन्दाज किया समझ में नहीं आता । काँग्रेस या मैडम सोनिया को क्या उनकी विश्वसनीयता पर संदेह है या वे जानती हैं के ये सब तराजू पर रखे जानें मेढक हैं जो कभी स्थिर नहीं रह सकते या वे इन लोगों को विवाह के पूर्व का कालिदास समझती हैं  कि ये लोग जिस डाल पर बैठेंगे उसी को काटेंगे ।
         मेरी राय तो मेरे घर के छोटे बच्चे तक नहीं मानते , फिर भी मैं राय देता हूँ कि सब्र कीजिये , सब्र का फल मीठा होता है । वह दिन जरुर आयेगा जब लालू जी और दिग्गी राजा अपनें-अपनें राज्य के मुखिया होंगे । मंत्री पद का क्या , आज है कल छीन जायेगा और किसी की भीख से कोई मंत्री-पद मिल भी जाये तो क्या होगा , कोई काम रुकनें वाला है आप लोगों का , कोई कितना भी बड़ा मंत्री बनें , सबकी गति मैडम सोनिया के सामनें एक जैसी ही होती है । इसलिये हताश या परेशान होनें की जरुरत नहीं है , मैडम सोनिया की भक्ति में लीन रहिये शायद उनकी कृपा की एक नजर पड़ ही जाये । 
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बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

जसपाल भट्टी और बापू की भेंट ।



ए पंडित जी देखो कैसी हलचल हो रही है , लोग क्यों हँस रहे हैं ?
अरे बापू भट्टी आया है ।
ये भट्टी कौन है भाई ।
इसे जसपाल भट्टी कहते थे , धरती पर , कार से जा रहा था , फिर यहाँ आ गया ।
क्या कार समेत आया है ?
नहीं बापू यमदूत लाये हैं , स्वर्ग में उदासी थी , अब हम लोग जी भर कर हँसेंगे ।
मेरे पास ले आओ , पंडित जी ।
मैं खुद ही आ रहा हूँ , बापू ।
आओ , अभी तो तुम धरती के लायक ही थे , क्या जल्दी थी आनें की , भट्टी जी ।
अब मैं क्या कर सकता हूँ , यमराज जी चाहते होंगे कि मैं उन्हें भी कुछ सुनाऊँ ।
धरती का हाल-चाल बताओ , भट्टी जी ।
बापू , धरती का हाल तो नहीं , लेकिन आपके और अपनें देश का हाल जरुर सुनाऊँगा ।
क्या हाल है मेरे देश का , सब ठीक तो है ?
कुछ भी ठीक नहीं है बापू , देश जिनके भरोसे आप छोड़े थे , उनके वंश का शासन अभी तक कायम है।
देखो भट्टी मैंनें किसी के हाथ में देश नहीं सौंपा था ।
लेकिन नाम तो आपका ही बदनाम हो रहा है ।
मेरी बात कोई मानता भी नहीं था । नेहरू भी मुझे घास नहीं डालते थे ।
लेकिन , देश में चारों और आपकी मूर्ति लगायी गई , सड़कों के नाम रखे गये , फोटो लगाई गई ।
अब मुझे मालूम हुआ है , कि वे सारे काम जनता को बेवकूफ बनानें के लिये किये गये थे ।
जानते हैं बापू , ना तो आपकी बात उस समय मानी जाती थी ना अब ही कोई माननें वाला है ।
मुझे सारी जानकारी मिलती रहती है , भट्टी जी ।
बापू जी , देश में इस समय भ्रष्टाचार ,घोटाले और लूट का बाजार गर्म है ।
देश का प्रधान-मंत्री कौन है ?
लोग कहते हैं कि मनमोहन सिंह हैं लेकिन ।
लेकिन क्या ?
वे नाम मात्र के हैं , केवल आदेश पालक हैं ।
किसके  ?
नाम नहीं लूँगा , पता नहीं , नर्क आनें पर वह पुलिस वालों के साथ आकर मुझे पकड़ ले तब ?
यहाँ कहाँ पुलिस वाले हैं भाई ?
स्वर्ग में नहीं होंगे बापू , दो चार होंगे भी तो , सन्टिंग में होंगे । असली पुलिस वाले नर्क में हो सकते हैं ।
देखो भट्टी , स्वर्ग में मैं बड़ा बोर होता हूँ , ये चम्पारन के पंडित जी ना रहें तो मुझसे बात करनें वाला भी कोई नहीं है ।
क्यों बापू ? आप तो काँग्रेसियों से घिरे रहते थे , क्या अब वे यहाँ नहीं हैं ?
देखो भट्टी , यहाँ पर ज्यादातर वे लोग हैं जिनका विरोध करते हुए मैंनें नेहरु का साथ दिया था ।
ये कैसे हो सकता है , आप तो सही लोगों का साथ देते थे ?
मुझसे कुछ गल्तियाँ हो गई थीं जिसके कारण मैं नेहरु का विरोध नहीं कर पाता था ।
यहाँ पर कुछ लोग तो होंगे जो आपसे जुड़े थे ?
हाँ राजेन्द्र प्रसाद , लाला लाजपत ,शास्त्री , पंत , पटेल आदि हैं लेकिन वे सब अपनें में मग्न रहते हैं ।
चिन्ता मत करिये बापू अब मैं हूँ ना , आप बोर नहीं होंगे ।
अभी तो तुम आये ही हो , थोड़ा सेटल हो जाओ तब आराम से बैठकर , चर्चा करेंगे ।
बापू , हम धरती पर इस खोज में लगे थे कि नेहरू जी कहाँ पैदा हुए थे ताकि वहाँ कोई समाधि का निर्माण हो सके ।
तुम ऐसी वाहियात खोज में क्यों लगे थे , वे पैदा नहीं हुए थे , अवतार लिये थे , समझे मूर्ख भट्टी ।
वाह बापू वाह , मैं आपके मुख से यही सुनना चाहता था , धन्य हैं आप ।
देखो सब तो ठीक है , किसी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में झाँकना उचित नहीं है ।
नेहरू जी से भेंट तो कर सकता हूँ ना बापू ?
वे यहाँ स्वर्ग में नहीं रहते ।
तब कहाँ रहते हैं ? कोई नया जन्म ले लिया क्या ?
अभी से इतनें सवाल मत करो ,भट्टी , ये पंडितजी हैं इनसे पूछ लो वे कहाँ पर रह रहे हैं ।
पंडित जी आप कृपया उनका व उनके परिवार का पता देंगे  ?
देखो भट्टी जी , वे अपनें पूरे परिवार के साथ जहाँ पर रह रहे हैं , वहाँ जानें वाले कर्म तुमनें नहीं किये ।
ये तो अन्याय है ,पंडित जी , मैं यमराज जी से शिकायत करूँगा ।
ऐसी गलती मत करना भट्टी जी वरना अगले जन्म में मनमोहन सिंह का डुप्लीकेट बनकर पैदा होगे ।
मेरी दोनों आँखें खोल दी आपनें पंडित जी , चाहे स्ट्रीट डाग बन कर पैदा हूँ या गधा लेकिन , उनके जैसा ना बाबा ना ।
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देश को लूटनें की , हजार साल पुरानी परम्परा अभी भी कायम ।

                  
            संसार के तमाम देशों की तरह हमारा देश भी परम्परा का निर्वाह करनें वाल देश है । देश की कुछ परम्परायें तो इतनी पुरानी हैं कि यह भी याद नहीं है कि उसका पालन हम भारतीय कबसे कर रहे हैं । बहुत सी परम्परायें ऐसी हैं जिनके बारे में इतिहास की पुस्तकों में कुछ गलत और कुछ सही लिखा मिल जायेगा । हमारे देश का इतिहास , अत्यन्त सावधानी पूर्वक लिखा गया है ताकि देश के किसी भाग्य- विधाता को या पुरानें भाग्य-विधाताओं को बुरा न लगनें पाये । आज की पीढ़ी को जो इतिहास की जानकारी दी जा रही है , वह एक प्रकार की सेन्सर्ड हिस्ट्री कही जा सकती है , ताकि देश के सेकूलर ढाँचे पर आँच ना आये और वोट बैंक की राजनीति पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े । खैर , सरकारी इतिहास की पुस्तकों के अलावा देश के तमाम लोग अपनें-अपनें धर्म व मजहब और विश्वास के आधार पर इतिहास आनें वाली पीढ़ी को पढ़ा रहें हैं ।
           विषय से भटकनें से पहले ही हम मूल विषय पर आते हैं । हम बात कर रहें हैं अपनें देश की उस महान् परम्परा के बारे में , जिसे देश को लूटना कहते हैं । इतिहास साक्षी है कि जब से भारत में विदेशी आक्रमणकारियों नें भारत को लूटना प्रारम्भ किया तभी से उस परम्परा को जीवित रखनें का प्रयास हम भारतीय कर रहे हैं । मोहम्मद बिन कासिम या उसके पूर्व से जारी इस देश लूट की परम्परा को हम भारतीय छोड़ना भी नहीं चाहते । हमारा इतिहास गवाह है कि जयचन्द टाईप के लोग आपसी वैमनस्य में भी वैसे लूटेरों को अपनें देश में आनें की खुली छूट देते रहे हैं , और उसको बताते हैं कि कैसे देश की सम्पत्ति को लूटा जाये और फिर वह लूटेरा दोनों को लूटकर चल देता था , और कभी-कभी वह कई-कई बार लूट की घटना को अंजाम देता था ।
             हम भारत वासी तैमूरलंग जी और महमूद गजनी जी के या मोहम्मद गोरी जी के अत्यंत आभारी हैं जिन्होंनें हम देश वासियों के लूटनें की परम्मपरा को और मजबूत किया । बाद के दिमागदार आक्रमणकारियों को जब  हमारे  देश के समझदार मेजबानों नें देश को लूटनें का न्यौता दिया तो उन्हें लगा कि बार-बार यहाँ की सम्पत्ति को लूटकर और देश की महिलाओं व पुरुषों को गुलाम बनाकर अपनें वतन ले जानें से बेहतर है , यहीं रहा जाये और यहाँ के अतिथि देवो भव की भावना वाले , नमक खानें के बाद नमक हारामी ना करनें वाले , लालच के लिये अपनें भाईयों तक का खून करके कोई उपाधि पानें वाले भारत वासी स्वयं ही सारी ऐशो आराम की चीज उपलब्ध करा देंगे , और भगवान की कृपा से सब कुछ वैसा ही हुआ ।
             उसके बाद दौर शुरु हुआ , भारत में अग्रजों का और अन्य प्रकार के विदेशियों जैसे फ्राँसीसी और पुर्तगाली लोगों का , उन लोगों को जो भी हाथ लगा वे देश को नोंचकर ले गये । देश को लूटनें और नोचनें का ज्यादा लम्बा कार्यकाल अँग्रेज लोगों का रहा और हम भारतीयों की लूटनें की परम्परा का खूब पालन हुआ और हम भारतीय अपनी उस गौरवमयी परम्परा का पालन अनवरत करते रहे । जब अँग्रेज देश को लूटते-लूटते थक कर उब गये तब उन्होंनें देश का शासन भारतीयों और पाकिस्तानियों के हाथ में सौंप दिया । जिसको हम हिन्दी में स्वतंत्रता , ऊर्दू में आजादी और अँग्रेजी भाषा में इंडिपेन्डेन्स डे के रुप में मनाते हैं ।
              लूट की परम्परा का पालन भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में कायम है , जनता का ध्यान कहीं लूट पर ना चला जाये इसलिये ये दोनों देश बीच-बीच में देश की जनता को मूर्ख बनानें के लिये और देश-भक्ति जागृत करनें के लिये , एक दूसरे पर जुबानी वार करते हैं और भले ही देश की जनता भूखे मरे , एक दूसरे का नाश करनें के लिये युद्ध की सामग्री खरीदते हैं । हद तो तब होती है जब दोनों ही देश के राजा या बादशाह ( नेता-गण ) एक ही दुकानदार से सामान खरीदते हैं , वह दुकानदार अमेरिकी हो , फ्राँस का हो ईटली का हो या जर्मनी का हो । कभी-कभी ऐसा भी लगता है जैसे दोनों देश के खरीदार राजा या बादशाह एक ही साथ दुकान पर पहुँचते हैं और एक दूसरे से सलाह करके ही सौदा पक्का करते हैं । इन सब में कितनी लूट होती है इसका खुलासा कोई नहीं कर सकता क्योंकि देश की रक्षा के मसले पर आप कोई सवाल पूछे नहीं कि देश द्रोही घोषित हुए । बहरहाल खबर उड़ती है कि करोंड़ों रुपया या करोंड़ों डालर का घपला हुआ , रक्षा सौदे में । कुछ दिन हल्ला गुल्ला होनें के बाद दोनों ही देश के नागरिक किसी नये लूट के पर्व की प्रतिक्षा करनें लगते हैं ।
               हम भारत के लोग जो कि लूट के त्यौहार को बेहद जश्न पूर्वक मनाते हैं , उसमें अब मीडिया का रोल भी शामिल हो गया है । इन्डिपेन्डेन्स मिलनें के बाद देश में लूट का त्यौहार ज्यादा लोग नहीं मना पाते थे कि क्योंकि उस समय कुछ ऐसे नेता थे जिनको सत्यमूर्ति कहा जाता था , वे जो कह देते थे वह ब्रह्म-वाक्य सरीखा होता था , वे कहते हम देश को नहीं लूटे या फलानें नें देश को नहीं लूटा , हम देश वासी उनकी बात मानकर चुप हो जाते थे ।
                अँग्रेजों के आगमन के पूर्व जिस प्रकार देश की सम्पत्ति को लूटकर या यहाँ की महिलाओं और पुरुषों को गुलाम बनाकर विदेश ले जानें की परम्परा रही है , अँग्रेजों नें उस परम्मपरा का कुछ सीमा तक पालन किया । बाद में उस परम्मपरा के निर्वहन में कुछ गिरावट आई । इन्डिपेन्डेन्स भारत में शुरुआत में यह लूट की परम्परा लगभग लुप्त होनें के कगार पर थी , लेकिन देश वासियों के सौभाग्य से  विगत २०-२५ साल से देश में इस प्रकार की लूट की परम्परा का पालन बड़े पैमानें पर किया जा रहा है । हमारा देश पर्व और त्यौहारों को उत्साह-पूर्वक मनाता है , उसी उत्साह और जोश के साथ , हम लूट रुपी पर्व को मनाते आ रहे हैं । इस पर्व की कोई तिथि या मुहुर्त नहीं होता , जब जिसको मौका मिला , इस पर्व को मना लेता है और हम देशवासी उसके जश्न में शामिल हो जाते हैं ।
             इतिहास अपनें को दुहरा रहा है , आज के समय में फिर वही ऐतिहासिक घटना हो रही है , और देश की सम्पत्ति को लूटकर हमारे वर्तमान् भाग्य-विधाता शासक वर्ग के लोग , विदेशों में हमारे देश का लूटा हुआ  धन जमा कर रहें हैं । पता नहीं उन सबकी योजना क्या है ? लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि उन्हें शंका है कि कभी ना कभी इस देश की जनता जो शीत-निद्रा में है जाग जायेगी और लूट की परम्परा को रोकनें का प्रयास करेगी , तब वैसे लोग इस देश को उसी प्रकार छोड़ देंगे जिस प्रकार , अँग्रेजों ने छोड़ा था , तब वैसे समय में विदेशों में जमा धन ही सहायक होगा ।
              फिलहाल ऐसा सोचना अभी बहुत गलत होगा , क्योंकि हम भारतवासी लूटे जानें के लिये ही बनें हैं , और बहुत दिन तक यदि कोई ठीक से नहीं लूटता तो , हम भारतवासियों को बैचैनी होनें लगती है । फिर से मन्दिरों में सोनें जमा हो गये हैं , देश वासी विकास के जश्न में लगे हैं , देश फिर सोनें की चिड़िया बननें की ओर है , पता नहीं  किसी देश-भक्त नें तैमूर जी या महमूद गजनी जी को खबर दी या नहीं । हम भारतवासी चादर तानकर सो रहें हैं , अगली कोई अच्छे किस्म की लूट देश में हो तो जगा देंना , ताकि लूट के जश्न को हम भी मीडिया के साथ सेलीब्रेट कर सकें ।
                                             Thanks .
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रविवार, 21 अक्टूबर 2012

रावण के पुतले का दहन --- ।


            विजय दशमी करीब है , फिर से रावण के पुतले जगह-जगह पर जलाये जायेंगे । बुराई पर अच्छाई की जीत पर प्रवचन होंगे , फिर साल के ३६४ दिन रावण का भूत हावी होगा और साल भर बुराई ही बुराई नजर आयेगी । रावण के पुतले को जला देने से काम नहीं चलनें वाला , रावण को अपनें अन्दर से निकालनें की कोशिश होनी चाहिये । रावण लंका का राजा था , उसके भीतर दस महा-बलवानों की ताकत थी , दस महा-विद्वानों जितना ज्ञान था , यानि हर चीज वह दसगुना था । लेकिन यदि आज रावण जिन्दा होता तो निश्चित रुप से उसका सारा धमण्ड चूर हो जाता जब वह देखता कि एक बिना पढ़ा-लिखा नेता भी उससे सौगुना ज्यादा विद्वान है , और मक्कारी में भी  रावण जी उनसे सौगुना पीछे होते । 
           मैं दशानन रावण को चुनौती देता हूँ कि यदि उसमें या उसकी आत्मा में इतनी ताकत है तो वह हमारे देश में आकर देख ले , एक गली का नेता भी उसे किसी भी फील्ड में मात देनें के लिये तैयार है । एक रावण को मारनें के लिये , प्रभू को कितनी माया फैलानी पड़ी । आज कितनें भी प्रभू अवतरित हो जायें , आज के रावणों को मारा नहीं जा सकता , क्योंकि आज के विभीषण भगवान श्रीराम के साथ नहीं बल्कि कलयुगी रावण के साथ हैं और वे भगवान श्रीराम को परास्त करनें के तरीके खोज रहे हैं । कलयुगी हनुमान बिना फायदे के अब भगवान के साथ रहनें वाले नहीं हैं । कलयुगी लक्ष्मण , अब तमाशबीन ही बने रहना चाहते हैं ।
            प्रभू आपनें गीता में आश्वसन दिया है कि जब जब धर्म की हानि होगी मैं अवतरित होऊँगा । हम भारत के ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम लोग जो आप पर यकीन करते हैं , आपकी राह तक रहे हैं । हम सभी आश्वस्त हैं कि कुछ दिन में आप अवश्य अवतार लेंगे , क्योंकि अब धर्म की हानि ही नहीं , बल्कि वह विलुप्त होनें के कगार पर है । यदि आपनें और विलम्ब किया तो , हम यही मानकर चलेंगे कि यह भी आपकी ही इच्छा है कि देश में दुनिया में अधर्म और पाप का विस्तार हो । सारे देश और सारी दुनिया पर शैतानों का कब्जा हो जाये । 
            प्रभू जी , जब आप अवतार लेनें की सोचना तो , कुछ ऐसी व्यवस्था करना , ताकि लोगों को विश्वास हो जाये कि आप अवतरित होनें वाले हैं , क्योंकि बिना पूर्व सूचना के यदि आप आये तो आपसे इतनें किस्म के सवाल पूछे जायेंगे कि आप सोचनें पर मजबूर हो जायेंगे कि कहीं गलत समय पर अवतार तो नहीं ले लिया  , इसका समाधान मैं आपको सूझा सकता हूँ , वह यह कि आप केवल मुझमें ही ऐसी समझ और बुद्धि देना ताकि मैं लोगों को बता सकूँ कि आप ही एक मात्र सारे जहाँ के मालिक हो , ये सूरज , चाँद , तारे ,आकाश , समुद्र , नदियाँ  ,सारे जीव , और सारे कायानात को आपनें ही बनाया है और आप के द्वारा ही वे रौशन हैं और आपके आदेश पर वे अपना काम कर रहे हैं । 
            सवाल ये उठता है कि यदि आप अवतार ले भी लें या मेरे माध्यम से अपना सन्देश दें , तो भी देश में कोई विश्वास करनें वाला नहीं होगा , क्योंकि , देश में इतनें फ्राड किस्म के लोगों नें अपनें को ईश्वर डिक्लेयर कर रखा है कि लोगों को अब ईश्वर पर भी विश्वास नहीं रह गया है । 
            जानते हैं प्रभू , हमारे देश में लोगों को किसी पर भी श्रद्धा उमड़ पड़ती है , चाहे वह कितना भी गया गुजरा क्यों ना हो , जब वैसा गया गुजरा व्यक्ति देख लेता है कि हजार दो हजार लोग उसके मानसिक रुप से गुलाम हो गये तो वह तुरन्त ही अपनें को आपके स्तर का बतलानें लगता है और वह तुरन्त ही अपनें आपको ईश्वर घोषित कर देता है , आश्चर्य तो तब होता है जब उसके मूर्खतापूर्ण बातों पर लोग अमल शुरू कर देते हैं । मेरे एक मित्र हैं खेदू भाई , उन्होंनें ऐसे ही एक भगवान के बारे में उसके एक समर्थक से कुछ शंका मिश्रित प्रश्न पूछे तो , बेचारे खेदू को गाली खाना पड़ा , खेदू भाई को बाद में पता चला कि उनकी पत्नीं भी उक्त भगवान की समर्थक थीं , खेदू के उक्त भगवान के सम्बन्ध में शंका-पूर्ण प्रश्न की  जानकारी  खेदू की पत्नीं को हुई तो बेचारे खेदू को  अपनी पत्नीं के हाथों , मानसिक व शारीरिक रुप से प्रताड़ित होना पड़ा ।
               मेरी बातों से प्रभू जी आप भी खिन्न हो रहे होंगे , लेकिन मैं करुँ तो क्या करूँ । यही वह लाईन है जहाँ यदि दो चार समझदार आदमी , किसी को , कुछ खास गुणवाला कहकर प्रचारित कर दें तो , लोग उत्सुकतावश जाननें की कोशिश करते हैं कि वास्तव में इसमें कोई खास गुण है या नहीं , उनकी यही उत्सुकता , उन्हें शिकार बनाती है । जहाँ दो चार पढ़े लिखे गलती से जाल में फँसे तो समझ लीजिये प्रभू कि मेरा काम बन जायेगा , क्योंकि उन पढ़े-लिखे लोगों को जाल में फँसते देख , अनपढ़ व गँवार लोग स्वयं ही जुटनें लगेंगे , और फिर वे लोग स्वयं ही मेरे प्रचारक बन जायेंगे और फिर मुझे नये जाल फैलानें की जरुरत ही नहीं होगी ।  इस प्रकार मैं लाखों करोड़ों लोगों के द्वारा सम्मान पाता हुआ , अमर हो जाऊँगा ।
                  हे मेरे परम् पूज्य प्रभू , यदि आप की कृपा रही तो , मैं सारी मानव जाति को एकदम नय़ी सोच ,नये विचार दूँगा और ना तो कोई रावण रहेगा ना ही आपको अवतार लेनें की जरुरत होगी । फिलहाल नगाड़े बज रहे हैं , राम लीला का मंचन हो रहा है , रावण के पुतले को अन्तिम रुप दिया जा रहा है ताकि विजय-दशमी यानि दशहरा के दिन उसका दहन किया जा सके । मैं तो चला रावण के पुतले के दहन की तैयारी को देखनें , हो सके तो आप भी देखियेगा रावण के पुतले का दहन , दशहरे वाले रोज -- happy Vijai-Dashmi . 
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शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

डकैतों के प्रवक्ता पर चोरी का आरोप --

        
                  सर्वप्रथम मैं उन तमाम लोगों से एडवांस क्षमा माँगता हूँ कि जिन लोगों को मैं कमीना , देश का लूटेरा , भ्रष्टाचारी , बेईमान् , टुच्चा और वे सभी गालियाँ जिनको यहाँ लिखना संभव नहीं , दे रहा हूँ , वे मुझे उन सभी गालियों और उपाधियों  के लिये क्षमा करेंगे , क्योंकि स्वयं मेरे पास वैसे लोगों के खिलाफ कोई प्रमाण नहीं है , जिनके लिये मैं उन्हें गालिया आदि परोस रहा हूँ । जो भी सुनी- सुनायी या पढ़ी-पढ़ायी जानकारी मेरे पास है वह पत्र-पत्रिकाओं के पढ़नें या समाचार चैनलों की कृपा से है । 
                  आप सोच रहे होंगे कि किस डकैतों के गिरोह का मेम्बर चोरी जैसी गिरी हुई घटिया हरकत कर सकता है , क्योंकि उसके चोरी जैसी हरकत के कारण डकैतों के अन्य समूहों के बीच उनकी साख को गिरनें  का खतरा हो सकता है । डकैतों के समूह का सरदार कौन है ये किसी को नहीं मालूम , क्योंकि दल का सरदार हमेशा किसी दूसरे को सामनें कर देता है और बाद में लोग जान पाते हैं कि वह सरदार नहीं कोई सेवक था , जिसे कुछ देर के लिये सरदार के रुप में पेश किया गया था ।
                  बात हम उस चोर की कर रहें हैं जिसके कारण डकैतों के दल की साख को खतरा पहुँचनें की संभावना है । प्रगतिशील युग में डकैतों के प्रवक्ता भी बन गये हैं । एक स्वयंभू प्रवक्ता नें ताल ठोंका है - हम डकैत हैं , देश का माल लूट सकते हैं , लेकिन हमारा कोई सदस्य चोरी जैसी ओछी हरकत नहीं कर सकता । 
                  जनता के बीच से आवाज आयी , उस चोर नें बेचारे अपाहिज , चलनें-फिरनें पर मजबूर विकलाँग लोगों को दिये जानें वाले पैसे को चुरा लिया ।
                 डकैतों के प्रवक्ता नें कहा - वह हमारे दल के लिये जान तक देनें की बात दो-चार दिन पहले कर चुका है उसकी निष्ठा पर हमारे दल के सरदार और समूह के अन्य सदस्यों को कोई संदेह नहीं है , जरुर आप लोगों को गलत फहमी हुई है या किसी नें अफवाह उड़ाई है । चोरी या चोरी-चोरी किये गये वैसे कार्य जैसा कि माननीय अभिषेक मनु सिंधवी जी नें या नारायण दत्त तिवारी जी नें किया , उसकी हम ना ही प्रशंसा करते हैं ना ही भर्त्सना करते हैं । क्योंकि वैसे कार्य अत्यंत तुच्छ प्रकृति के होते हैं जिनपर ध्यान देना हम बड़े लोगों का कार्य नहीं है ।
                 सब तो ठीक है लेकिन हम आपहिजों का पैसा क्यों चुराया - जनता नें हूँकार भरी ।
                 प्रवक्ता नाक में ऊँगली डालते हुए बोला - तुम लोगों को मुफ्त का माल चाहिये । क्या वह पैसा तुम लोगों के बाप का था , जो चिल्ला रहे हो चुरा लिया , चुरा लिया । उसके ट्रस्ट का पैसा था वह उसे बाँट कर खाये या अकेले खाये । तुम्हारे बाप के पेट में दर्द क्यों हो रहा है , जो टोपी वाले केजरीवाल के साथ हल्ला करनें पर अमादा हो ।
                  तुम नेता लोग , ये तमाम कम्पनियाँ और ट्रस्ट इतनें आराम से कैसे खोल लेते हो - जनता के बीच के एक पढ़े-लिख विकलाँग नें प्रश्न फेंका ।
                  प्रवक्ता नें लपकते हुए उत्तर दिया - इसके लिये तुम जनता ही जिम्मेदार हो , हम सभी दल के नेताओं को यह खतरा बना रहता है कि कहीं तुम लोग हम लोगों को बेरोजगार ना बना दो या हम लोगों को अपनें कारनामों के कारण देश छोड़कर भागना पड़े तो हम नेता लोग क्या करेंगे क्योंकि किसी भी नेता को स्वयं कुछ करनें आता ही नहीं वास्तव में हम नेता लोग किसी काम के लायक होते भी नहीं  , वैसी दशा में अपनें जीवन-यापन के बारे में सोचकर हम सभी दल वाले एक समझौते के तहत कम्पनी और ट्रस्ट बनाते हैं ताकि यदि देश से भागना पड़े या बेरोजगारी की दशा  आये तो अपना खर्च चलता रहे ।
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सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

वफादारी पर शक नहीं -- ।




दरवाजा खोलिये ना , काहे अकेले कमरे में बन्द पड़े हैं ?
दरवाजा नहीं खोलेंगे , जो कहना है , खिड़की से कहो ।
बाहर , कोई देख लिया आपसे बात करते तो ?
फिर तुम चुपके क्यों आते हो ?
आप सबके सामनें सेन्सर्ड बात करते हैं इसलिये , चोरी-चोरी आना पड़ता है ।
क्या पूछना चाहते हो ?
यही की सलमान खुर्शीद नें अपनीं जान कुर्बान करनें को कहा है ।
सुना तो मैनें भी है , इसमें क्या खास है ?
क्योंकि वफादारी में वे सारे टामियों और मोतियों से आगे निकल रहे हैं , आपके लिये खतरा नहीं है ?
मेरे लिये कैसा खतरा , मुझे वफादारी दिखानें की जरुरत ही नहीं पड़ती है ।
फिर भी , मैडम की वफादारी को लेकर कम्पटीशन तो आप लोगों में रहता ही होगा ?
कैसा कम्पटीशन , मैं थका हुआ लगता हूँ लेकिन मौका मिलनें पर ----
हाँ , पार्लियामेंन्ट में आपकी आवाज को मैनें टीवी में सुना था , कमाल की आवाज थी , जर्मन शेफर्ड भी  शर्मा जाये ।
और कुछ पूछना है ?
ये केजरीवाल दहाड़ रहा है , जंगल में शेर की तरह , और देश के दामाद वाड्रा जी पर कमेंन्ट कर रहा है ।
मूर्ख है , वो क्या जानें , देश हमारी मलकिन का है , वे उसे बेटा को दें या दामाद को , दर्द उसे क्यों होता है ?
यही बात तो हम चाहते हैं कि आप सार्वजनिक रुप से , इस बात को जनता को समझा दें ।
देश में दहेज देनें की परम्परा है , जिसकी जितनी औकात होगी वह उतना दहेज देगा ही । जलनें वाले जलें ।
वाड्रा जी , के बारे में आपके क्या विचार हैं ?
वाड्रा जी के बारे में कोई विचार प्रकट करनें की हमारी औकात है , क्या ?
क्यों , आपको तो पूरा अधिकार है कुछ भी कहनें का आखिर आप देश के -- ।
देखो आदमी को अपनी औकात में रहना चाहिये , मैं स्वामिनी-भक्त था , हूँ और सदैव रहूँगा , कोई शक ?
ना -- ना --- हमें और देश वालों को आपकी और तमाम टामियों और मोतियों की वफादारी पर कोई शक नहीं है ।
बहुत हो गया अब जाते हो या जोर से भौकूँ ।
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मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

पहले आओ - पहले पाओ -- ।

                खेदू बड़े खिन्न नजर आ रहे थे , मुझसे रहा नहीं गया , पूछ बैठा - काहें नेनुआ ऐसा मुँह बनाये हो खेदू । खेदू छुटते ही बोले सेल लगी है , लल्लन भाई , त्योहार आ रहा है ना , आफर है पहले आओ , पहले पाओ । ऐसा तो हर जगह होता है , जब स्टाक सीमित हो तो सही चकाचक माल वही पाता है जो पहले आता है - मैंनें समझाया । सेल मे कुछ भी चकाचक नहीं होता , सारा नाटक केवल महिलाओं और बच्चों को बहलानें के लिये होता है , उस समय पति की बात की औकात वही होती है जो मन मोहन जी की बात की सोनिया जी के सामनें होती है । पहले आओ - पहले पाओ की बात तो और भी कहीं सुना था खेदू भाई । लल्लन भाई ,२ जी घोटाला , कोयला घोटाला में भी यही पहले आओ पहले पाओ की नीति लागू हुई  थी , लेकिन दोनों का प्रभाव अलग-अलग होता है । कपड़े आदि के सेल में आपके सामनें सामान रहता है , जबकि २-जी या कोयला जैसी चीजों के लिये , ना तो किसी को पहले बुलाया जाता है ना ही कोई पहले आकर कुछ पाता है , बन्दा सेल लगनें से पहले ही एडवांस में बुक करवा लेता है और , जनता चिल्लपों करती रहती है । सेल लगनें से पहले ही सब कुछ सेल हो जाता है फिर होती है सेल में गड़बड़ी की जाँच । बाकी की बातें बतानें की जरुरत नहीं है । ठीक कहे , खेदू भाई , हमको केवल डर इस बात का है कि कहीं अपनें देश को ही पहले आओ ,पहले पाओ के बहानें , भाई लोग सेल न कर दें । लल्लन भाई , कुछ भी असंभव नहीं है , भाई लोगों के लिये ।

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

हैप्पी बर्थ-डे बापू जी ---- ।



                आदरणीय बापू ,
                                 आज २ अक्टूबर यानि आपको याद करनें का त्योहार है । देश में जहाँ-जहाँ आपकी फटी हुई धूल से भरी हुई उलटी तस्वीरें लटकी हैं और जहाँ-जहाँ आपकी मूर्तियाँ लगी हैं , उस पर जमी धूल और पक्षियों के बीट उस पर से साफ किये जा रहे हैं । देश भर में लोग आपके बताये मार्ग पर चलनें की वही पुरानी कसम दुहरानें की तैयारी में हैं और आपके विचारों को दूसरों को अपनानें का संकल्प दिलवायेंगे ,भले ही स्वयं उसको ना अपनाये , देश के नेता व मंत्री आज सुबह से ही लकदक सफेद वस्त्र में कहीं उपदेश देते नजर आयेंगे । लेकिन जिन नेताओं नें ६५ सालों में आपके विचारों को नहीं अपनाया अब क्या वे खाक अपनायेंगे । 
                               हम बहुत सी बातों का जिक्र करके आपकी आत्मा को विचलित नहीं करना चाहते हैं । फिर भी कुछ ऐसी चीजें हैं जो आपके सच्चे अनुयायियों को हमेशा खटकती रहती हैं । आपनें जो स्वप्न देश के लिये देखे थे , वे सभी आपकी तस्वीरों की तरह ही उलटे लटके हैं , एकदम चमगादड़ के माफिक । आपके विचार केवल गरीबों और कमजोरों के लिये सुरक्षित व आरक्षित कर दिये गये हैं । अन्य लोगों जिनमें देश के तमाम भाग्य-विधाता यानि मंत्री , सांसद , नेता , अधिकारियों तथा कर्मचारियों को आपके विचारों को अपनानें से मुक्त कर दिया गया है । 
                              २ अक्टूबर को ही एक अन्य महान् व्यक्ति लाल बहादुर शास्त्री जी नें जन्म लिया था । वे देश के प्रधानमंत्री भी बनें ,भले ही कम लोगों को उनके बारे में जानकारी हो । यह भी अजब संयोग है कि गोली मारकर आपकी आत्मा को आपके नश्वर शरीर से मुक्त किया गया । शास्त्री जी की आत्मा को उनके नश्वर शरीर से अलग  करनें में किस रासायनिक प्रक्रिया को अपनाया गया इसका रहस्य अभी तक बरकरार है । 
                             बापू जी , लिखनें को बहुत कुछ है लेकिन सब कुछ नहीं लिखा जा सकता है , क्योंकि हमारा देश पर्दा-प्रथा वाला देश रहा है , आप भी जानते हैं । पर्दा-प्रथा आज बदल गई है , और वह केवल घोटालों , लूटों , भ्रष्टाचार और तमाम काले करनामों पर लागू होती है । पर्दा-प्रथा का कड़ाई से पालन , विदेशों में जमा काले-धन को ढकनें में , देश को लूटनें वालों को ढकनें के लिये किया जा रहा है ।
                             सारी बातों को नजर अन्दाज करते हुए बापू -- हैप्पी बर्थ डे ।
                             

                            

सोमवार, 17 सितंबर 2012

जनता मरनें के लिये , नेता हँसनें के लिये -- ।



           देश में इस समय तमाम विचित्र किस्म के लोगों को देश के महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया गया है , जिनमें प्रधानममंत्री जी , रिमोट सिस्टम से चलते हैं , रक्षामंत्री बैटरी से चलते हैं , वित्त मंत्री साहब धक्का देनें पर चलते हैं और गृह मंत्री चाभी वाले खिलौनें के माफिक चलते हैं । चूँकि इनमें से कोई भी खिलौना स्वयं चलनें की हैसियत नहीं  रखता है , इसलिये इन खिलौनों  द्वारा किये गये किसी भी हरकत पर ऊँगली उठानें से पहले सोचना चाहिये कि , क्या आपके बुरा भला कहनें , गाली देनें , उसके हटानें की माँग कर देंनें से सब ठीक हो जायेगा , कतई नहीं ।  कुछ  समय से इन खिलौनों नें स्वतः एक चीज करना सीख लिया है , जब कोई मसला आता है तो ईशारा कर देते हैं कि जिसके हाथ में हमारी डोर है , उससे पूछकर ही तो अभिनय किया था , क्या कोई गलत हरकत हो गई ?
            ऐसे ही देश की एक महान् पार्टी के नाट्य-शाला के कलाकार हैं श्री शिन्दे जी , जिनके सत्य वचन से देश की जनता को उनका ऋणी होना चाहिये , क्योंकि उन्होनें देश की जनता पर हास्य-रस से भरा कटाक्ष करते हुए कहा कि - जनता जैसे बोफोर्स घोटाले को भूल गई , वैसे ही कोयला घोटाला को भी भूल जायेगी । 
             हम शिन्दे साहब की बात को गलत नहीं ठहराते हैं , लेकिन उनकी बात से जाहिर हो गया कि हाई कमान के यहाँ उनकी अच्छी ट्रेनिंग नहीं हुई है । कमाल तो तब हो गया जब , शिन्दे जी के बयान पर , कूड़े के ढेर में पड़े श्री दिग्विजय सिंह जी नें उनके बचाव में कुछ कहा , यद्यपि उसे किसी नें तवज्जो हीं नहीं दी , क्योंकि यदि देखा जाये तो सारे खिलौनों में सबसे बुरी हालत इसी बेचारे की है । 
             देश में इस समय , भ्रष्टाचार और घोटाले का बाजार  जिस प्रकार चल रहा है , उससे ऐसा लगता है कि सरकार जल्द ही उसे वैध घोषित करेगी और जो कोई उसमें लिप्त नहीं रहेगा या सहयोग नहीं करेगा उसे कठोर दण्ड दिया जायेगा । 
            और फिर कहीं दूर शिन्दे जी और दिग्गी राजा ठहाका लगाकर ,कह रहे होंगे - हँसना स्वास्थय के लिये सर्वोत्तम टानिक है और जनता पर हँसना सबसे सरल है , क्योंकि वह भूलनें की बीमारी से ग्रस्त है । 
             सच या झूठ मुझे नहीं पता लेकिन बुजुर्गों के मुँह से सुना है , देश के कुछ नवाबों की बेगमों का एक खास शौक हुआ करता था - अपनें महल की खिड़की से प्रतिदिन नदी में डूब कर मरते हुए लोगों को देखना , और प्रसन्न होना । 
                                 जिन्दगी का मकसद तो , पहले भी ना था , 
                                 चलो , गरीब काम तो आया तुझे हँसानें में  ।
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शनिवार, 15 सितंबर 2012

देश वासियों की सहन शक्ति को नमन -- ।

    

        
         केन्द्र में किसकी सरकार है पता करना मुश्किल है , मनमोहन जी तो कतई सरकार नहीं चला रहे हैं । बीजेपी वालों का विरोध भी केवल राजनीतिक लाभ उठानें के लिये ही प्रतीत होता है , जनता का दर्द समझनें वाला कोई नेता देश में नजर नहीं आ रहा है । अन्ना जी के साथ जनता इसलिये जुड़ी कि शायद देश में कोई बड़ा परिवर्तन हो लेकिन उनके जन आन्दोलन का अन्त जिस प्रकार से हुआ , उसके बाद देश में एक अजीब सा निराशावाद का दौर शुरु हो गया है , जनता बेबस है , और मुलायम सिंह उसी में प्रधानमंत्री बननें का ख्वाब देख रहे हैं ।
          मँहगाई बढ़नें से उन देश के तमाम हरामखोरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़नें वाला है जिनको अपनीं जेब से पैसा खर्च करके दुकान से जाकर सामान नहीं खरीदना पड़ता है । किसी भी हराम-खोर का पाँच सितारा होटल में रहना और खाना बन्द नहीं होगा , मुफ्त में हवाई जहाज से विदेश का दौरा लगाना बन्द नहीं होगा , केवल जनता त्राहि-त्राहि कुछ दिन चिल्लायेगी फिर सब कुछ शान्त हो जायेगा ।
          पिछले कुछ माह से केन्द्र में बैठी सरकार नें कई बार पेट्रोल आदि के दाम बढ़ाये ,  कुछ नेताओं नें उसका  विरोध एक राजनीतिक- रस्म के तर्ज पर किया , सरकार जानती है कि जनता की तरफ से जो लोग बोलनें वाले हैं उनमें भी तमाम छेद हैं और वे केवल रस्म-अदायगी के तौर पर केवल विरोध का अभिनय ही करेंगे । अभी डीजल , केरोसीन , रसोई-गैस आदि के दाम बढ़ाये गये , कोयले की कालिख से रंगी हुई , महा-घोटालों का ना टूटनें वाला रिकार्ड बनानें को तैयार सरकार नें देश में विदेशी बाजार खोलनें का फरमान जारी कर दिया । ये सारे घटनाक्रम इतनी तेजी से हुए कि जनता को सम्भलनें का अवसर ही नहीं मिल सका । जनता किन चीजों का विरोध करे , जनता को खुद भी समझ में नहीं आता ।  जनता की आवाज कैसे कोई सुनेगा जब देश का प्रधान-मंत्री ही कहता हो कि लड़ते-लड़ते जायेंगे , ये देश के दुर्भाग्य की पराकाष्ठा है ।
           प्रमुख विपक्षी दल को कुछ आशंका के साथ आशा है कि जनता चुनाव में सरकार के खिलाफ वोट देगी , यदि पूर्ण सुनिश्चित हो जाये कि जनता उसे अगले चुनाव में वोट देगी तब वह जनता की आवाज बनेंगे , ममता बनर्जी की औकात भी जनता और सरकार समझ चुकी है । देश की लगभग सारी पार्टियाँ पहले राजनीतिक लाभ की बात सोचती हैं फिर जनता और देश के बारे में सोचती हैं । देश की जनता की सहन-शक्ति को सहज ही नमन करनें को मन करता है । आखिर क्यों ना हो -
                           " पहनी थी जो बेड़ियाँ सदियों पहले ,कभी हमनें 
                             शामिल कर लिया है आज उन्हें गहनों में हमनें । "
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गुरुवार, 13 सितंबर 2012

हिन्दी दिवस की आवश्यकता नहीं ---



                  दुनिया के साथ-साथ हमारे देश में भी कई तरह के दिवस मनाये जाते हैं , उनमें ज्यादातर ऐसे दिवस होते हैं जो वार्षिक उत्सव की तरह मनाये जाते हैं और तमाम लोग जो संकल्प आदि उस दिन लेते हैं सब कुछ अगले कुछ घन्टों में भूल जाते हैं । ऐसे ही एक दिवस का नाम है हिन्दी दिवस जिसे हम १४ सितम्बर को  मनाते हैं , नहीं- नहीं सेलीब्रेट करते हैं , सरकार का काफी पैसा उसके सेलीब्रेशन में खर्च होता है , जैसे १५ अगस्त और २६ जनवरी के दिन खर्च होता है । हिन्दी बोलनें वालों को कीड़ा- मकौड़ा समझनें वाले आज दिन भर मातृ-भाषा हिन्दी पर खूब झूठा भाषण देंगे और देश के सारे कार्य हिन्दी में करनें और किये जानें पर जोर देंगे । 
                 हिन्दी के साथ-साथ अँग्रेजी भाषा के शब्दों को मिलाकर बोलनें में कोई दिक्कत नहीं है जब अगला उसे समझ रहा हो , लेकिन हमारे देश में तमाम ऐसे लोग है जो इस ग्लानि में जी रहें हैं कि इनका जन्म भारत में या हिन्दी भाषी क्षेत्र में क्यों हुआ , वैसे लोग नौकरों , चपारासियों , सफाईकर्मियों को भी अँग्रेजी में डाँटना पसन्द करते हैं , यद्यपि वैसे अँग्रजी-दाँ की अँग्रेजी भाषा में पकड़ किसी अमेरिकी या ब्रिटेन के सब्जी बेचनें वाले , ड्राईवर , सफाईकर्मी और अन्य कम पढ़े लिखे व्यक्ति से भी कम हो सकती है । 
                मैंनें लोगों से सुना है कि , फिराक गोरखपुरी साहब कहा करते थे कि , भारत में केवल ढाई ( 2- 1/2) लोग ही अँग्रेजी जानते हैं जिनमें वे स्वयं , डॉ राजेन्द्र प्रसाद ( प्रथम राष्ट्रपति ) और आधा पं० जवाहर लाल नेहरु । 
                हम लाख मेहनत करके किसी विदेशी भाषा के सारे व्याकरण , सारे मुहावरे , सारे नियम ,सारे शब्दों को तोते की तरह भले ही रट लें , लेकिन अपनी मातृ-भाषा न होनें का कारण हम उसमें कभी भी पूर्ण पारंगत नहीं हो सकते । 
               हमारे देश के नियंताओं ने देश के जन्म के साथ ही , जो स्थिति पायी , उसमें उनके पास इतना समय ही नहीं था कि वे मातृ-भाषा के प्रश्न पर विचार कर सकें । जिस समय देश का प्रशासन भारतीयों के हाथ में दिया जा रहा था , देश की आन्तरिक स्थिति ठीक भी नहीं थी । परिणाम स्वरुप सम्पूर्ण गुलामी वाली व्यवस्था वैसी ही स्थिति में कायम रह गयी । जनता को पता ही नहीं चला कि वह कैसे पुनः गुलामी की मानसिकता में चली गई और एक नये प्रकार के शासक वर्ग का जन्म हुआ जो देखनें में तो भारतीयों जैसा प्रतीत होता था लेकिन भीतर से कतई भारतीय नहीं था । 
               परिणाम-स्वरुप , देश के सारे कानून , देश के सारे कार्यालयों , सारे संस्थानों की कार्य शैली वही रही जो ब्रिटिश काल में रही थी , कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ ना करनें की हिम्मत हुई । आज अगर देश के किसी भी मुख्य संस्थान में आप जाइये तो शायद ही वहाँ कहीं हिन्दी नजर आये । बाहर बोर्ड पर जो नाम लिखा होगा , उसपर हो सकता है शर्म वश या अन्य किसी अज्ञात कारण से हिन्दी में उस कार्यालय का नाम अंकित हो , वैसे ज्यादातर मामलों में आपनें देखा होगा कि देश के तमाम ऐसे बड़े संस्थान हैं जिनके नाम पहले अँग्रेजी में फिर हिन्दी में लिखे होते हैं । 
                  सच कहा जाये तो हम हिन्दी भाषा-भाषी ही , हिन्दी भाषा के असली दुश्मन हैं । सरकार नें राज-भाषा विभाग और कई अन्य कई संस्थान खोला और खोलनें में मदद भी दी उसमें हिन्दी भाषा के जानकार लोगों को रखा सरकारी पुस्तकें प्रकाशित करवायीं , लेकिन असली हिन्दी के जानकर होनें का दावा करनें वाले हमारे साहित्यिक भाईयों नें , अपनी सारी कुण्ठा , अपनें सारे छिपे हुए अज्ञान को जाहिर करते हुए , वैसी पुस्तकों में ऐसी कठिन संस्कृत-निष्ठ भाषा का प्रयोग किया कि उसके उच्चारण और अर्थ को समझनें में भी लोगों को दिक्कत आनें लगी । ऐसे लोगों के कारण ही हिन्दी भाषा को सन् १९४७ से लेकर कुछ साल पहले तक उपेक्षा झेलनी पड़ी है । मेरा तो यहाँ तक मानना है कि यदि  देवनागिरी लिपि भविष्य में लुप्त होनें के कगार पर आयी तो उसके जिम्मेदार भी वैसे ही कुण्ठाग्रस्त हिन्दी के तथा कथित विद्वान् होंगे , जिन्हें उस समय आत्म-गौरव  का अनुभव होता है जब कोई , उनके शब्दों का अर्थ नहीं समझ पाता है ।
                  बहरहाल देश में हिन्दी का महत्व स्वयं बढ़ा है और यह बढ़ता ही रहेगा । हमारी हिन्दी भाषा को , कमजोरों की भाषा , पिछड़ों की भाषा , अनपढ़ों की भाषा बतानें वाले , भी अब महसूस करनें लगे हैं कि "बिन हिन्दी सब सून " । हिन्दी भाषा के विकास का काम हमारे देश के युवा करेंगे , और कर रहे हैं । 
                   अन्त में मेंरा देश के तमाम नेता जी लोगों से और तमाम अधिकारियों व कर्मचारियों से सादर  निवेदन है कि , हिन्दी दिवस के साथ-साथ आप लोग आज ही यानि १४ सितम्बर को निम्नलिखित दिवसों को भी मनाये -
     १- बेईमानी नहीं करेंगे दिवस ।
     २- घोटाला नहीं करेंगे दिवस ।
     ३- विदेशों में काला धन जमा नहीं करेंगे दिवस ।
     ४- चुनाव में झूठा वादा नहीं करेंगे दिवस ।
     ५- जनता को परेशान नहीं करेंगे दिवस ।
     ६- देश से गद्दारी नहीं करेंगे दिवस ।
        चूँकि सारे दिवस केवल एक दिन के लिये होते हैं , अतः अगले दिन आप फिर पुरानें धन्धे में लग सकते हैं ।
        पचासों अन्य प्रकार के दिवस लिस्ट में हैं ,  लेकिन उनका जिक्र फिर कभी करूँगा -
             लेकिन एक दिवस मनानें के लिये मैं जरुर अनुरोध करता हूँ -" देश भक्ति दिवस " देखता हूँ देश में कबसे मनाना शुरू होगा ?
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खेदू को प्रलय का इंतजार .



आज पाँच दिन बाद नजर आ रहे हो खेदू , कहाँ थे ?
लल्लन भाई , थानें का दरोगा , मुझे तिरछी निगाह से रोज देख रहा था , इसीलिये ।
तिरछी निगाह के देखनें भर से तुम भूमिगत हो गये खेदू , पकड़ लेता तब ?
पकड़नें की ताक में था , लोगों से कहा भी था कि अन्ना और बाबा के आन्दोलन में सक्रिय रहा है, देश-द्रोही है ।
तो तुम छिप गये ताकि वह तुम्हे देश-द्रोही ना मान ले , है ना ?
अब मामला शान्त हुआ है तो राहत मिली है ।
अब क्या विचार है ?
कुछ नहीं बस , घर पर बैठकर समाचार चैनल ब्लैक & व्हाईट टी वी देखूँगा ।
तब तो तुम्हारे जैसे बहुत से लोग जो भीड़ बनते हैं , किसी भी धरना प्रदर्शन में नहीं रहेंगे ?
ना रहें , देश-द्रोही कहलानें से अच्छा है कि घर में बीबी बच्चों के साथ रहा जाये ।
खेदू , तुम ऐसा सोचोगे तो देश का क्या होगा ?
हमी ठेका लिये हैं , क्या , देश सुधारनें का ?
तुमसे हम मोहल्ला वालों की बड़ी उम्मीद थी , खेदू भाई ।
क्या चाहते हो , लल्लन भाई , मैं भी कसाव के साथ वाले बैरक में चला जाऊँ ।
अपनें शहर के तमाम आफिस के बाबू और अधिकारी खुलेआम दाम लेते हैं , उन्हें कौन सुधारेगा ?
उन्हें सुधारनें के लिये , भगवान को एक साथ बीसों अवतार लेनें होंगे , लल्लन , समझे ।
अगर ईश्वर अवतार नहीं हुआ तो क्या सब कुछ ऐसे ही होता रहेगा ?
तुम मुझसे ही ये सवाल क्यों पूछ रहे हो , मैं कोई दिग्विजय सिंह हूँ क्या ?
नहीं खेदू भाई , तुम्हारा  मोहल्ले में बहुत सम्मान है , उन्हें कौन जानता है ।
देखो लल्लन , देश की दशा के बारे में पुरी दुनिया में गलत मैसेज जा रहा है कि हम सब भ्रष्ट और बेईमान हैं ।
इस गलत मैसेज को सही मैसेज में कैसे बदला जाये खेदू भाई ।
उस घड़ी की प्रतीक्षा करो जब संसार में प्रलय आ जाये ।

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मंगलवार, 11 सितंबर 2012

ईमानदार पार्टी क्यों असफल रहेगी - चुनाव एक खोज ।



         
                    आपनें धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नामक मित्रों की पुरानी संस्कृत कथा सुनी होगी या पढ़ी होगी । वे दोनों आपस में अच्छे मित्र थे , मित्रता के कारण का उल्लेख कथा में नहीं दिया है , लेकिन प्रायः पापी का पुण्यात्मा , दुष्ट का सज्जन , कुरुप का रुपवान , झूठे का सच्चा , मित्र देखनें को मिलता है । मेरा एक मित्र जो सामान्य रुप रंग का था , वह किशोरावस्था से लेकर विवाह होनें तक कुरुप और काले मित्रों के साथ ही रहना पसंद करता था , उसके घर वाले उसकी इस आदत पर हमेशा बिगड़ते थे लेकिन असली कारण तो हम मोहल्ले के दोस्त और वह जानता था , लेकिन बहुत उछल कूद के बाद बेचारे को वर्तमान भाभी जी मिली , जिनके साथ वह किसी आवेदन पत्र के साथ लगे , संलग्नक की भाँति ही लगता है । वैसे भी धन (प्लस) और ऋण ( माइनस) के संयोग के बिना कुछ भी संभव नहीं है । प्राचीन कथा के अनुसार , दोनों परदेश जाकर काम करनें लगे और धन कमाकर वापस घर लौटनें लगे । पापबुद्धि नें धर्मबुद्धि को सलाह दी कि धन को एक विशाल वृक्ष के नीचे छिपा दिया जाये । धर्मबुद्धि तैयार हो गया , और दोनों नें अपना सारा धन पेड़ के नीचे दबा दिया । कथा में आगे , पाप बुद्धि सारा धन स्वयं हड़प लेता है  बाद में उसको परास्त होना पड़ता है और धर्मबुद्धि की जीत होती है । 
                       हमारे आर्यावर्त देश में चुनाव का मौसम शुरू हुआ । कुछ दिन पहले जन जागरण का कार्यक्रम चलाकर जनता को समझा दिया गया कि , किसी भी बेईमान , भ्रष्टाचारी , घोटालेबाज को वोट नहीं देना है । हर पार्टी नें अपनें-अपनें योद्धाओं को मैदान में उतारा । मेरे क्षेत्र में मुख्य जंग जिन दो महारथियों के बीच थी वे दोनों  बेईमान और घोटालाबाज पार्टी के उम्मीदवार थे , वे दोनों ही  भ्रष्टाचार , घोटाला और लूट के खेल के श्रेष्ठतम् खिलाड़ी थे , कोई किसी से कम नहीं था , एक तरफ नागनाथ तो दूसरी तरफ साँप नाथ , एक तरफ अर्जुन तो एक तरफ कर्ण । जनता भी बकिया उम्मीदवारों की कोई चर्चा नहीं करती थी ।
                     तीसरे नम्बर पर चर्चा होती थी ईमानदार पार्टी के उम्मीदवार की । उसका नाम कम ही लोग जानते थे । १०-१२ लोगों के साथ वह भी पैदल अपनें प्रचार में निकलता था । कोई आडम्बर या दिखावा नहीं । हमारे मोहल्ले के खेदू , मुख्य चुनाव संचालक थे । साथ में नागेश्वर बाबू , पोस्टमास्टर साहब , जग्गी बाबू , संगम लाल , वर्मा जी भी शिफ्ट-वाईस  घरेलू काम निपटानें के बाद प्रचार में लग जाते थे । महिला मोर्चा की कमान गौरी बाबू की पत्नी के हाथ में थी , जबकि गौरी बाबू स्वयं , दोनों महारथियों में से एक के प्रचार में लगे रहते थे , और गौरी बाबू का बड़ा बेटा दूसरे महारथी के प्रचार में जी जान से जुटा था , ऐसा लोकतांत्रिक परिवार शायद ही देश में कहीं और होगा ।
                    एक दिन खेदू  मेरे पास आया , खेदू चुनाव प्रचार का मुखिया था , उसके चेहरे पर उदासी देखकर मैनें कारण पूछा । खेदू नें अनमनें भाव से बताया - कि जनता के बीच हमारा क्रेज तो है लेकिन , जनता कहती है कि  ईमानदार पार्टी के लोग आज के युग में फिट नहीं बैठते । जनता के बीच बैठी इस धारणा को तोड़ना पड़ेगा खेदू भाई , मैनें समझाया । खेदू बोला - बड़ा कठिन है , लल्लन भाई , जनता को बेईमान और घोटालेबाजों के बीच रहनें की आदत पड़ गयी है । शुरु-शुरु में तो जनता अन्य पार्टी वालों को  गाली दे रही थी , लेकिन अब जनता सभी को समान रुप से देख रही है । समान रुप से देखनें में क्या बुराई है , मैनें पूछा ।
                   खेदू नें समझाना शुरु किया । देखो लल्लन भाई समस्या बड़ी ही गम्भीर है । हमारे उम्मीदवार के पास लोग अपनी-अपनी समस्या लेकर आते हैं जिनमें कुछ व्यक्तिगत और कुछ सामूहिक होती हैं । समस्या का निदान कैसे हो इस पर हम लोग विचार करते हैं फिर किसी आफिस में या अधिकारी के यहाँ जाते हैं तो वहाँ हमारे उम्मीदवार को कोई महत्व ही नहीं देता , जब किसी अधिकारी या कर्माचारी को पता चलता है कि हम ईमानदार पार्टी के लोग हैं तो  वे मुस्कराकर समस्या सुनते हैं और फिर उस कार्य से सम्बन्धित प्रक्रिया के बारे में  बताया जाता है और उसके अनुसार ही काम होनें के बारे में बताया जाता है , हमारा उम्मीदवार नियम और कानून के पालन की सलाह देता है , जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारे ईमानदार पार्टी का उम्मीदवार किसी का भी कोई कार्य नहीं करा सका । वही दूसरी ओर , बेईमान और घोटाला पार्टी के उम्मीदवारों का अदना से चेला भी , उसी आफिस में जाकर वैसा ही कार्य , कुछ ही मिनट में कराकर ले आता है । जनता कहती है , हमारा काम जो करवायेगा हम उसी को वोट देंगे ।
                     तुम लोग उस कार्यालय या अधिकारी के पास नहीं गये , अपना विरोध करनें , खेदू भाई ? खेदू बोला- विरोध तो किये लेकिन शान्ति के साथ , हम लोग और हमारा उम्मीदवार नियम और कानून का पालन करनें के प्रति वचनबद्ध हैं ।
                      खेदू तुम्हें बुरा लगे या भला , एक बात कहे देते हैं - तुम्हारा उम्मीदवार और तुम्हारी पार्टी के प्रति लोगों की पूरी सहानुभूति हो सकती है , लेकिन जब वोट देना होगा तो जनता उसी उम्मीदवार को वोट देगी  जिसका पूरा जीवन ही अपराध के सुन्दर कृत्य से सदैव आलोकित रहा हो और जो दबंगई के साथ अपना और अपनें चमचों का कार्य करवानें में माहिर होता है और कानून जिसके सामनें बेबस हो जाता है । कोई लाख घोटाला करे , देश को बेचे , आतंकवादियों को पनाह दे , जनता को इन सबसे कोई सरोकार नहीं है ।
                     तो क्या करें लल्लन भाई - खेदू नें पूछा  ।
                   मेरी मानो खेदू भाई , उन्हें राय दो कि वे अपना नाम वापस ले लें और इस राजनीति के क्षेत्र को उन्हीं  लोगो के पास रहनें दो जिनके शरीर पर बड़े-बड़े , काले-काले चकत्ते हो गये हैं ।
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बुधवार, 5 सितंबर 2012

द वाशिंगटन पोस्ट क्या जानें ।


 प्रिय देश वासियों ,    
                  मैं यह पत्र आप सभी को लिख रहा हूँ , जिनको पढ़ना होगा ,पढ़ेंगे , जिनको न पढ़ना हो न पढ़े । मेरे पत्र को मेरा सुसाईडल नोट मत समझियेगा , क्योंकि मुझसे बेहया ना तो इतिहास में कोई हुआ है ना होगा । आज का समाचार पढ़ा , दुःख हुआ कि मुम्बई मेट्रो पुल का बन रहा एक हिस्सा गिर गया , जाहिर बात है उसके निर्माण में घोटाला अवश्य हुआ होगा , मैं जानता हूँ कि ठेकेदार को कितना परसेंट सब जगह देना पड़ा होगा लेकिन सारा दोष ठीकेदार के माथे पर और किसी इंजिनियर पर लगेगा किन्तु असली माल चाभनें वालों का कुछ भी नहीं होगा , देश के तमाम भवन , पुल आदि बस भगवान भरोसे ही खड़े हैं । 
                 अब बात करते हैं , उन हरामखोरों पेपर वालों की जो मुझे नकारा , पालतू , असफल , और ना जानें किन-किन उपाधियों से नव़ाजते रहते हैं , और आप भारत देश की जनता , उनका समर्थन करते हैं , मैं जानता हूँ कि मैडम की पार्टी जिसे लोग काँग्रेस के नाम से जानते हैं , उसमें भी तमाम लोग हैं जो रुमाल मुँह में रखकर मेरे ऊपर कमेंट करते हैं , मुझे बहुत पीड़ा होती है जब मैडम कि पार्टी वाले भी वैसे पेपर वालों के खिलाफ कुछ नहीं कहते ।
                उन मूर्ख अखबार वालों से कोई जाकर पूछे कि बताओ , जब कोई बच्चा स्कूल में गया ही ना हो तो वह पढ़नें में कमजोर कैसे कहलायेगा , कोई पान वाले को कैसे कह सकता है कि मिठाई ठीक नहीं बेचता , टमाटर के पौधे को कोई कैसे कह सकता है कि वह सेब का फल देनें में असफल रहा , कोई गधा कुत्ता ऐसा भौंकनें में कैसे सफल हो सकता है ?  आप खुद सोचिये , जब मैं कोई कार्य या फैसला स्वयं नहीं करता तो , मैं कैसे एक असफल प्रधान-मंत्री हो सकता हूँ ।
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रविवार, 2 सितंबर 2012

अजब मन्नू भईया का गजब इस्तीफा ---- ।


अरे अरे , बड़ा हँसे जा रहे हैं , क्या  बात है ?
तुम कहाँ से आ गये लल्लन ।
आप इतना जोर से हँस रहे हैं कि आवाज दूसरे देश तक जा रही है ।
जानते हो मैं क्यों हँस रहा हूँ ?
पता होता तो आप के यहाँ काहे आता , हमें तो लगा कि कहीं आप दिमागी ---- ।
सारे देश वालों को पागल कर दूँगा , तुम मेरे दिमाग पर उँगली उठाते हो ।
छोड़िये ना , हँसनें का कारण बताइये ।
देखो ये बीजेपी वाले , उनके साथी और रामदेव वगैरह मुझसे इस्तीफा माँग रहे हैं ।
सच कहें तो , देश की जनता की भी राय यही है ।
तुम और जनता क्या मुझे प्रधानमंत्री बनाये हो ?
हम सभी लोग जानते हैं कि आप को मैडम नें यह कुर्सी दी है ।
तब मैडम की यह कुर्सी है , देश की जनता से या किसी पार्टी से इससे क्या मतलब है ?
लेकिन दुनिया तो यही जानती है कि देश के प्रधानमंत्री आप ही हैं ।
दुनिया क्या जानती है मुझे उससे क्या लेना देना ।
तो आप इस्तीफा नहीं देनें वाले हैं ?
इस्तीफा क्या दुकान का सामान है कि निकाल के दे दिया ?
आप इस्तीफे का एलान कर दीजिये , बस लोग खुश हो जायेंगे  ।
देखते नहीं बीजेपी वाले , इसी बात पर हल्ला कर रहे हैं कि इस्तीफा दो ।
ना-ना-ना , बीजेपी वाले चालाकी कर रहे हैं , आप को नहीं पता ?
कैसी चालाकी ?
यही कि वे जानते हैं कि  वे लोग इस्तीफा मागेंगे और आप देंगे नहीं , और जनता को वे सब गलत मैसेज देंगे ।
तुम्हारा मतलब वे लोग इस्तीफा माँगनें का नाटक कर रहें हैं ?
सही कह रहें हैं आप , उनकी प्लानिंग है कि आप के रहते हुए आपकी पार्टी स्वतः कमजोर हो जायेगी ।
मैं कैसे अपनी पार्टी को कमजोर कर सकता हूँ , जबकि मेरे पास ना तो हाथ है ना पैर ,ना ही मुँह में जुबान ।
लेकिन , जनता के सामनें तो वे आप पर ही निशाना साधते हैं ।
देखो , वे सचमुच मूर्ख हैं , आज तक कोई खरोंच भी नहीं लगी मुझे , निशाना गलत लगाते हैं , वे लोग ।
मतलब जनता को हम यही मैसेज दे दें कि आप प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दे रहे हैं ।
जनता जानती है कि हम अपनी कुर्सी किसके आदेश से त्याग सकते हैं ?
वह आदेश मैडम से अभी क्यों नहीं ले लेते ?
मैडम को शुभ घड़ी और जनता के मूड के सही होनें का इन्तजार है ।
मान लीजिये अभी आज-कल में आप टपक जायें तब , देश का कौन प्रधान-मंत्री बनेगा ?
मैं टपका हुआ ही हूँ , राहुल बाबा के सिंहासन पर बैठनें तक मुझे फाईनली टपकनें नहीं दिया जायेगा ।
मतलब ये हुआ कि ना तो फाईनली आप टपकियेगा , ना ही सिंहासन खाली कीजियेगा ?
वह सिंहासन राहुल बाबा के लिये होगा , मेरे लिये वह कुर्सी या पद ही कहा जाता है ।
मैं आपके कहनें का मतलब नहीं समझा ?
क्यों कि प्रधानमंत्री के पद पर मेरी नियुक्ति हुई है और राहुल बाबा का उस पर पैतृक अधिकार है ।
मतलब आप अपनी कुर्सी निकट भविष्य में नहीं खाली कर रहे हैं ?
जिस मालिक नें मुझे सिंहासन की देखभाल के लिये नियुक्त किया है  उसके आनें तक मैं हटनें वाला  नहीं हूँ ।
आप तो कुर्सी और सिंहासन के चक्कर में हमें कन्फ्यूज कर दिये हैं ।
तुम ही नहीं पूरा देश ही कन्फ्यूज है , लेकिन मैं देश को पानी पिलाकर ही कुर्सी से उतरूँगा ।
फिर भी कब तक कुर्सी छोड़नें या इस्तीफा देनें का मन बनाये हैं ?
जब जनता कराह उठे और चिल्लाये कि राहुल बाबा को बुलाओ ,  तब मैं मैडम के आदेश से ---- ।
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सोमवार, 20 अगस्त 2012

हमहूँ का मौका दो ना -- प्ली-----ज---- ।


   हे भारत भाग्य विधाता ,
                           आप कौन हैं मुझे नहीं मालूम है , मैं बचपन से आप को खोज रहा हूँ , आप ना जानें कितनें आड़े-तिरछों , लुच्चे-लफंगो , गुन्डे-बदमाशों , पापियों-दुराचारियों , नीचों-अधमों को अपनीं शरण में रखकर जमीन से आसमान तक पहुँचा दिये , और वे अब आपके समानान्तर ही देश के भाग्य विधाता बननें की कोशिश में हैं , जिनमें कई तो ऐसे हो गये हैं कि वे भारत की जगह , अन्य देशों की तरक्की में हाथ भी बंटा रहे हैं ।
                           मुझे चालाकी , मक्कारी , देश से गद्दारी , कमीनापन , नीचता और बेईमानी व भ्रष्टाचार आदि के गुण सिखानें वाला कोई योग्य गुरु ही नहीं मिला , जिसके कारण मैं न तो आत्मिक विकास ही कर सका और ना ही अन्य किसी देश में धन रखकर , उस देश की आर्थिक स्थिति सुधारनें में कोई मदद ही कर सका , निश्चित रुप से मेरे अन्दर ना तो कोई प्रतिभा थी ना अब है , लेकिन परिवार में यदि कोई मन्द बुद्धि या अविकसित दिमाग का व्यक्ति  पैदा हो जाये तो क्या उसे प्रोत्साहन नहीं दिया जाना चाहिये ?
                            मैं जनता हूँ और दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि  आप की थोड़ी सी भी कृपा मिल जाये तो , लँगड़ा एवरेस्ट फतह कर सकता है , गूँगा मो० रफी की मधुर आवाज में गा सकता है , और पागल या गधा टाईप का व्यक्ति  साहित्य में नोबल प्राईज जीत सकता है और देश का सबसे बड़ा पद तक पा सकता है । मुझे आपकी महिमा के बारे में सब मालूम है , यदि आप की कृपा दृष्टि हो जाये तो , खटमल मारनें की दवा बेचनें वाला कई फाईव स्टार होटल का मालिक बन सकता हैं , पान बेचनें वाला देश का सबसे बड़ा उद्योगपति हो सकता है । 
                            आपका गुणगान करनें के लिये , करोंड़ों मुख चाहिये अफसोस कि मेरे पास केवल एक मुँह है  और वह भी आपको दिखनें लायक नहीं है । मेरे मन में विचार आया कि जब तमाम देवी देवताओं की पूजा- अर्चना  करनें , बाबा लोगों का वन्दन करनें और तमाम तंत्र-मंत्र से भी कोई बात नहीं बनी तो क्यों ना आपकी चरणधूलि अपनें गन्दे माथे पर लगाऊँ , शायद मेरा भाग्य भी तमाम नकारों की तरह से पल्टी खा जाये । 
                          मैं आपसे केवल इतना माँगता हूँ कि , अगले आनें वाले कुछ दिनों में जिन तमाम नकारे लोगों को , देश को लूटनें का अवसर मिलनें की संभावना है , उनके सम्भावितों में मुझे भी शामिल कर लीजिये , मैं निष्ठा-पूर्वक शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं जो भी घोटाला करूँगा , उसके पाई-पाई का हिसाब पूर्ण पारदर्शिता के साथ आप को दूंगा , फिर मेरी सेवा से खुश होकर जो भी ईनाम आप दीजियेगा मैं उसे सादर आपका प्रसाद समझकर ग्रहण करुँगा , और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं कुछ ही दिन में अपनी स्वामी-भक्ति का ऐसा नमूना पेश करूँगा कि कुछ ही दिन में अपनें सारे , टामियों , मोतियों , जैकियों  जैसे कुत्तों की सेवा लेनें की आपको  कोई जरुरत ही नहीं रह जायेगी  मैं विश्वास दिलाता हूँ कि यदि आपकी कृपा रही तो , देश का कोई भी कुत्ता भौंकनें में मेरी बराबरी नहीं कर पायेगा ।
                          हे भारत के नये नवेले भाग्य विधाता जी - हमहूँ का एक बार मौका प्रदान करिये ना -- प्लीज--  तबियत मस्त ना कर दिये तो ----- कहियेगा । 
                  

                                         

                                  


रविवार, 19 अगस्त 2012

भारत का अगला प्रधान मंत्री कौन ?



           अगस्त का महीना अबकी बार कई महत्वपूर्ण घटनाओं वाला रहा है । १५ अगस्त को हमनें स्वराज्य दिवस मनाया ,जिसे लोग स्वतंत्रता दिवस के नाम से भी जानते हैं । देश के खिलाड़ियों ने जहाँ पदक जीतकर देश का नाम रौशन किया वहीं , सत्ता के खिलाड़ियों नें सारे घोटालों का रिकार्ड तोड़ते हुए  कोयला आबंटन घोटाला किया  देश की जनता नें अपनी नियति मानकर उसे भी देखा ।  लगभग २ लाख करोड़ रुपये का यह घोटाला है जिसमें सोनिया मैडम के परम् भक्त श्री मन मोहन जी का नाम सबसे ऊपर रखा जा रहा है । वैसे देश की जनता घोटालों की इतनी अभ्यस्त हो चुकी है कि देश के किसी भी कोनें से इस बारे में कोई जोरदार आवाज नहीं सुनायी पड़ी , क्योंकि जनता जानती है कि नेता हैं मंत्री हैं , सबको चुनाव लड़ना है । चुनाव में सफेद पैसा तो लगाया नहीं जा सकता , इस लिये घोटाला नहीं होगा तो चुनाव खर्च कहाँ से आयेगा । दूसरे ,हमारे देश के धन से कई देशों की अर्थव्यवस्था चल रही है , उसे भी बरकरार रखना है ।
         इसी महीनें में एक नेता और मंत्री गोपाल कांडा की संगत का दुष्परिणाम भी देखनें को मिला जब गीतिका नामक एक लड़की को अपनी जान गंवानी पड़ी । इसी महीनें बेचारी फिजा नें जिसका संबन्ध भी एक नेता से था इस दुनिया को अलविदा कह दिया , नेतागण की सोहबत में पड़ी अन्य बेचारियों की जिन्दगी सलामत रहे यही रब से दुआ है । इसी महीनें बाबा रामदेव नें अपनीं लीला का प्रदर्शन किया , केन्द्र सरकार नें पुलिस से लाठियाँ नहीं भंजवायी , गोली नहीं चलवायी , इसलिये देश के तमाम लीला-दर्शकों को कोई मजा नहीं आया ।
        इसके अलावा देश नें देखा कि किस तरह से पाकिस्तान के हिन्दू , वहाँ से भागकर देश में आरहे हैं , यदि संसार के किसी कोनें में हमारे वोट बैंक वालों के साथ कुछ होता तो हमारे नेतागण किस कदर आसूँ बहाते , कहना नहीं है , लेकिन हमारे देश के किसी बड़े मंत्री या नेता नें इसपर कोई सकारात्मक टिप्पणी नहीं की । मेरी , छोटी सी राय है कि जिन आतंक वादियों को सोनिया जी की सरकार दामाद ऐसा बैठाकर खिला रही है , वह बन्द करे और उनका सारा राशन पाकिस्तान से आनें वाले लोगों पर खर्च करे , तथा , आतंकवादियों को बाबा रामदेव के आश्रम में काम करनें के लिये भेज दे , ताकि वे आश्रम के व्यवसाय में बाबा की मदद करें , और सरकार उन्हें बतौर खुफिया अधिकारी बाबा के यहाँ से सूचना प्राप्त करनें के लिये भी नियुक्त कर सकती है , क्योंकि इतनें दिन हराम का खानें के बाद हो सकता है वे सरकार के हितैषी हो गये हों । वैसे भी देश से दोनों को ही लगाव नही है ।
          इसके अलावा अगस्त के महीनें में असम में दंगे और उसके कारण देश के अन्य भागों में किये जानें वाले दंगों को भी देश के लोगों नें देखा और पूर्वोत्तर के लोगों का देश के अन्य भागों से पलायन भी देखा , हम भारत देश के लोग बहुत सी बातों को समान्य ही समझ कर उसकी अनदेखी करते हैं और वह दिन दूर नहीं जब सारे भारत वासियों को एक जगह से दूसरी जगह पलायन करना होगा , और फिर अलग- अलग बस्तियाँ होंगी , अलग-अलग के धर्म के लोगों की । देश के भीतर ही इस प्रकार का पलायन देश के नेताओं की समझ में भले ही न आ रहा हो लेकिन देश के हालात पर नजर रखनें वालों की बेचैनी , भयानक भविष्य की ओर इशारा कर रही है ।
           देश भीतर ही भीतर किस तरह सुलगनें की ओर बढ़ रहा है , इस बात से बेपरवाह हमारे नेतागण किस चिन्ता में हैं , यह देखना महत्पूर्ण है ।
          कोयला आबंटन में किये गये महाघोटाले से ध्यान हटानें की साजिश के तहत या अन्य किसी मकसद से मुलायम सिंह जी नें शगूफा छोड़ा है कि , अगला प्रधानमंत्री तीसरे मोर्चे का होगा । देश में घटनें वाली सारी महत्वपूर्ण घटनाओं को दरकिनार कर हमारे देश में बहस चल रही है कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा । सारे लोग तमाम लोगों के नाम गिना रहे हैं । भारत वर्ष की जनता वैसे  भी सब कुछ भूलनें में माहिर है , लेकिन हमारे नेतागण चाहते हैं कि जनता को सोचनें समझनें का वक्त ही ना दो या उसे सोचनें समझनें के लायक ही न रखो , ताकि भूलनें की बीमारी का नाम लेंनें की जरुरत ही न पड़े ।
         मेरा भी आप से सादर निवेदन है कि आप भी देश के हालत के बारे में अपना माथा न खराब करें , और केवल इसपर विचार करें की कौन बनेगा प्रधान-मंत्री , कलमाडी जैसा , राजा जैसा या मनमोहन जी जैसा , देश में ये ही लोग ऐसे हैं जो काफी लोकप्रिय हैं , अभी तो घोटालों की दौड़ में सबसे बड़ी गठरी सिर पर लिये मनमोहन जी ही नम्बर-१ नजर आ रहे हैं , क्या विचार है ?   
        

सोमवार, 13 अगस्त 2012

आप इस देश के कौन ?



प्रणाम , बड़ा रेलेक्स फील  कर रहे होंगे ?
मैं तो हमेशा से रिलेक्स ही फील करता हूँ ।
अन्ना का भूत बिना डरवाये निकल गया और अब बाबा नें अपनें जिन्न को खुद ही बोतल में बन्द कर दिया ।
देखो मैं भूत और जिन्न से नहीं डरनें वाला , समझे ।
तो काहे कुछ नहीं कहे , बाबा और अन्ना के आन्दोलन के समय ?
मैडम नें आदेश दिया था , हम सभी को ।
कैसा आदेश ?
यही कि बोलना मत , ये दोनों खुद ही शान्त हों जायेंगे ।
अच्छा ये बताइये कि आप तो काला धन विदेश में जमा नहीं किये , भ्रष्टाचार नहीं किये , फिर डरे क्यों ?
मैं कहाँ डरा , मैं बस चुप ही रहा ।
ये आन्दोलन तो आपके खिलाफ नहीं था , लेकिन आप ---?
देखो मैं जिन लोगों की संगत में हूँ वे लोग मुझसे कहे कि मैं भी उनके गैंग का मेम्बर हूँ ।
और आप मान लिये कि आप देश के लूटेरों के गैंग के सदस्य हैं ?
नहीं मानूं तो जाऊँ कहाँ । आखिर मैं मैडम का प्रधानमंत्री हूँ , मेरा भी उनके प्रति कोई फर्ज है ।
अरे भाई आप देश के प्रधानमंत्री हैं , आपका फर्ज देश के प्रति पहले है , मैडम के प्रति बाद में ।
ना बाबा ना , मुझे बेवकूफ मत बनाओ , मैं जानता हूँ कि देश की जनता मुझे कुछ नहीं मानती है ।
आप , देश के प्रति , वफदार नहीं हैं क्या ?
हूँ , लेकिन मैडम के आदेश का पालन भी तो करना है ।
वित्त-मंत्री , रक्षा-मंत्री , गृह-मंत्री ,और तमाम मंत्री क्या देश के मंत्री नहीं हैं ?
मेरी अन्तरात्मा से पूछोगे तो मैं कहूँगा , बिल्कुल नहीं ।
क्यों ?
मेरे बारे में तो सब लोग जानते हैं कि ,मैडम नें मुझे यह कुर्सी दी है ।
हाँ ,सब लोग जानते हैं कि आप ---- ।
मेरे समेत सारे मंत्री , मैडम द्वारा बनाये गये हैं , तो तुम्ही बताओ हम सब किसके मंत्री हुए ?
आपके अनुसार भारत देश का ना तो कोई राष्ट्रपति है ना ही प्रधानमंत्री और ना ही कोई मंत्री या नेता है ।
लगता तो है कि , वे लोग हैं , लेकिन हकीकत में , बिना मैडम की चाभी के कोई हिल भी नहीं सकता ।
अब आप बर्दाश्त से बाहर की बात कर रहे हैं ।
तुम भारत वासियों को सब बर्दाश्त करना होगा , देश में ना कोई आन्दोलन होगा ना ही जनता की आवाज होगी ।
तब क्या होगा ?
घोटाले होंगे , हम बिना देखे सुनें कागज पर दस्तखत करेंगे, लोग हमें गाली देंगे ।
आप देश को नरक होते देखते रहें हैं , क्या आगे भी देखते रहेंगे ?
अगर मैडम की कृपा रही तो देश का नाम बदलनें पर भी विचार किया जा सकता है ,समझे ।
सब समझ गया , अब मुझे सोचना है कि मैं इस देश का क्या हूँ ?
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शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

अन्यथा भारत-रत्न जरुर मिलता ।



आज सन्डे मना रहे हैं क्या ?
अच्छा किये आ गये , अन्ना के आन्दोलन के समय से ही कान में रुई और आँख पर पट्टी बँधवाकर अकेले पड़ा रहा ।
रूई और पट्टी क्यों ?
ताकि कुछ देख सुन ना पाऊँ ।
लेकिन मुँह तो खुला ही था , कुछ बोल तो सकते थे ।
जानते हो मैं बिना पूछे , कुछ बोलता नहीं ।
आपकी खामोशी को लोग आप की चतुराई समझे लिये ।
अक्सर मेरे साथ ऐसा ही होता है , मेरी मजबूरी ,ना तो अन्ना समझेंगे ना ही उनकी टीम वाले ।
क्या आपकी पार्टी के सभी नेता को रूई और पट्टी बाँधना अनिवार्य था ?
हाँ जी , और कुछ के मुँह में तो विदेशी टेप भी चिपकाया गया था , कुछ को शीत-निद्रा में भी भेजा गया ।
कपिल सिब्बल टाईप के कुछ लोग जो सर्प योनि में जन्में लगते हैं , अब धीरे-धीरे बाहर आ रहे हैं ।
जानते हो , ये सब मेरे ऊपर , हँसते हैं जब मैं , अपनें पद की गरिमा की बात उन्हें बताता हूँ ।
अच्छा , आप को ऐसा नहीं लगता जैसे आपकी पार्टी के लोग जरुरत से ज्यादा गुलामी में जी रहे हैं ?
लगता तो है , लेकिन करें क्या , मेरी आड़ में सब नंगा नाच कर रहें हैं , बदनाम मैं होता हूँ ।
आप कपड़ा पहनकर नाचनें के लिये क्यों नहीं कहते ।
मजाक मत करो , मैंनें निष्ठा के साथ मैडम की सेवा की है , जो कहा गया सब किया , लेकिन सोचो --- ।
लेकिन सोचें क्या ?
यदि मैंनें वैसी सेवा देश की , की होती तो , मैं भारत-रत्न या देश रत्न का पुरस्कार पानें का हकदार होता ।
लेकिन आप दुखी ना हों , मैडम सेवा मैडल या मैडम रत्न पुरस्कार आपको जरुर मिलेगा ।
वैसा मैडल या पुरस्कार तो है नहीं , लेकिन होता भी तो भी घड़ियाल टाईप के लोग मुझे लेनें नहीं देते ।
आप जैसा व्यक्ति जिसनें देश-हित से कहीं ज्यादा मैडम हित पर ध्यान दिया , आपको ईनाम तो मिलना ही चाहिये ।
सच पूछो तो हमें लगता है कि हम देश से गद्दारी कर रहे हैं , लेकिन करें क्या , दलदल में फँसे हैं ।
आप क्यों दलदल में जाना स्वीकार किये ?
उस समय कितनें नकली आँसू बहे थे ,  मैंनें भवना में बहकर वैसा फैसला लिया ।
लेकिन जनता तो जानती थी कि आप केवल कठपुतली से ज्यादा कुछ नहीं हैं ।
जनता क्या , मैं स्वयं जानता था कि मेरी क्या हैसियत है , लेकिन ऐसी लूट होनें की मुझे उम्मीद नहीं थी ।
झूठ मत बोलिये , आपनें स्वयं घोटाले बाजों के बचाव में कई बयान दिये हैं , आप सब जानते हैं ।
हाँ , मैं सब जानता हूँ किसनें-किसनें , कहाँ-कहाँ कितनें-कितनें घोटाले किये हैं , लेकिन बता नहीं सकता ।
समय आ गया है कि आप , सारे राज खोल कर जनता के सामनें रख दीजिये , और भारतरत्न हो जाइये ।
जानते हो , हर घोटालें में पता नहीं मेरा नाम भी कैसे आ गया है ?
यानि आपको भी चोरों के गैंग नें अपना सदस्य बना ही लिया । आप सच बोलकर  निकल लीजिये वहाँ से ।
अब मैं जहाँ हूँ वही मेरा समाज है , मैं चाहकर भी सामाजिक बन्धनों को तोड़ नहीं सकता ना ही निकल सकता हूँ ।
चोर उचक्कों के समाज में रहना भी चाहते हैं , और सज्जन भी कहलाना चाहते हैं , ये कैसे हो सकता है ?
सहीं कहते हो लेकिन , कुछ वैसे ही काम अनजानें में हम भी कर बैठे हैं , यही हमारी मजबूरी है ।
तब यदि आपको इस जन्म में मिलेगा भी तो केवल मैडम रत्न पुरस्कार या फिर देश का तिरस्कार ।
जा रहे हो क्या ?
जी , अभी आप भी फ्रेश नहीं हुए होंगे , नमस्ते ।
हाँ सही कह रहे हो मैडम से शौच करनें की परमिशन भी अभी लेना है ।
 


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गुरुवार, 26 जुलाई 2012

क्रान्ति की विफलता के कारण ।


             देखो खेदू , इतिहास में इस बात का जिक्र है कि सन् १८५७ ई० की क्रान्ति किस बात पर हुई और क्यों विफल रही । लेकिन  दोनों के लिये इतिहासकारों द्वारा अधिकांश ऐसे कारण बताये गये जो कम से कम समझदार लोगों को हजम नहीं हो सकते । देश भक्ति से ज्यादा बढ़कर क्रान्ति का मूल कारण उस कारतूस के इस्तेमाल को बताया गया जिसमें चर्बी का प्रयोग होता था , इसके अतिरिक्त अन्य बहुत से बेतूके कारण भी बताये गये । अँग्रेजों के अत्याचार को इतिहासकारों नें बहुत सावधानी पूर्वक लिखा ताकि अँग्रेज बन्धु नाराज होकर उन्हें जेल में ना डाल दें । आजादी के बाद ब्रिटेन वालों का शासन खत्म हो गया किन्तु उनके अनुयायियों के हाथ में सत्ता हस्तान्तरित होनें से इतिहास ज्यों का त्यों रहा ।
 लेकिन लल्लन भाई , तुम इस समय काहे , उस क्रान्ति को याद कर रहे हो ?
            खेदूलाल , हमारा देश किस तरफ जा रहा है , यही सोच रहा था । जानते हो उस क्रान्ति को विफल करनें वाले अँग्रेज कतई नहीं हो सकते थे क्योंकि इतना बड़ा देश और मुट्ठी भर अँग्रेज कहाँ-कहाँ लड़नें जाते , हमारे देश के तलुवे चाटनें वालों गद्दारों नें ,अँग्रजों से ज्यादा मेहनत क्रान्ति को विफल करानें में की , १८५७ की क्रान्ति को क्रान्तिकारियों को समर्पित न करके , देश के गद्दारों को समर्पित करना चाहिये , जिनके सहयोग से देश-भक्तों की पराजय हुई ।
लल्लन भाई तुम्हारा मतलब है , अन्ना जी का आन्दोलन भी -----।
            देखो खेदू , ये आन्दोलन है और वो क्रान्ति थी , जिसे गदर भी कहा जाता है । तुम जानते हो , जिस पेड़ को उस समय का भयानक तूफान नहीं हिला सका था , उसे आज की हवा क्या हिलायेगी । 
मतलब ?
           एकदम साफ है , आगे आनें वाली पीढ़ियाँ पढ़ेंगी , अन्ना के आन्दोलन के कारण और उस आन्दोलन  की विफलता के कारण , जिसमें विफलता का केवल एक कारण लिखा होगा जन समर्थन का अभाव ।
देखो लल्लन भाई , जैसा तुम सोचते हो वैसा, आज देश के ज्यादातर लोग सोचते हैं , लेकिन -- ।
लेकिन क्या खेदू ?
तुम जैसे लोग हताश होकर सोचते हो लल्लन भाई , कोई ना कोई तो चाहिये अँधेरे में रोशनी दिखानें वाला ।
हम मानते हैं खेदू , लेकिन सोचो , १८५७ की क्रान्ति , सफल न होनें का क्या असर हुआ ?
यही ना कि हम लोग उसके बाद फिर , काफी दिन तक गुलाम रह गये ।
दिन ही नहीं खेदू लाल , कई दशक तक गुलाम रहे कहो । जोड़ो १८५७ से १९४७ तक कितनें साल हुए ?
पूरे ९० साल लल्लन भाई , सही कहे ।
और १९४७ से आज तक कितनें साल हुए बताओ ?
लल्लन भाई , काहे गणित सिखानें पर तुले हो ।
खेदू लाल , अगर अबकी अन्ना जी दुष्ट नेताओं के बहकावे में आये तो , फिर सन् २१०२ तक यही स्थिति रहेगी ।
लल्लन भाई देश की जनता जानती है कि अबकी अगर वह नहीं जागी तो फिर जगानें के लिये कोई नहीं आनें वाला ।
खेदू लाल , आनें वाली पीढ़ी के लोग इस आन्दोलन की असफलता के गलत कारणों को पढ़ेंगे तो कितना बुरा होगा ।
लल्लन भाई , आशावादी बनिये , समय आयेगा और हम होंगे कामयाब --- एक दिन ।

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बुधवार, 25 जुलाई 2012

खेदू के बुआ के घर में चोर ------ ।



              खेदू की बुआ और फूफा की कोई सन्तान नहीं थी । वे लोग खेदू को बचपन में अपनें घर में रखे । बुआ , के इलाके में चोर काफी सक्रिय रहते थे । चोर भी आजकल जैसे नहीं थे बल्कि अपनें पेशे को अपना धर्म समझकर एक से बढ़कर एक चोरी का आईडिया निकालते थे । वे बड़े धैर्यवान् थे , कई-कई दिन रेकी करनें बाद तब किसी वारदात को अन्जाम देते थे । अगर पकड़ गये तो , दो-चार डन्डे खानें के बाद मृतक समान बन जाते थे , जब लोग नब्ज टटोलनें का प्रयास करते तो उसी समय बिजली की फूर्ती के साथ उठते और किसी को कुछ समझ में आता तब तक वे हवा हो जाते थे । उसके बाद चोरी की वारदात और चोरों के कारामात की चर्चा कई दिन तक चलती , क्योंकि तब मीडिया की कमी के कारण बड़े चोरों के कारनामों को लोग नहीं जान पाते थे । दिल्ली के चोरों की चर्चा दिल्ली तक , इलाहाबादी चोर की चर्चा इलाहाबाद तक , मलीहाबादी चोर की चर्चा मलीहाबाद तक , हैदराबादी चोर की चर्चा , हैदराबाद तक सीमित रहती थी । 
              हाँ तो बात हो रही थी , पुरानें किस्म के चोर की । चोर की हरकत के बारे में जानने से पहले , खेदू के बुआ की घर का स्थल निरीक्षण आवश्यक है । प्रथम तल वाला मकान ,जिसमें पुताई  ५-६ साल पहले  वाली दीपावली में आखिरी बार हुई रही होगी , उसमें कुल जमा दो कमरे , एक बाहरी दूसरा भीतरी , प्रवेश-द्वार सड़क से सलंग्न , बगल में गलियारा जिसमें ताला रात के समय लगता था । गलियारे में पुरानी एटलस साईकिल जिसके पैडल में प्राब्लम रहती थी , ज्यादातर गलियारे में खड़ी रहती थी जिसका केवल पिछली पहिये का टायर ही नजर आता था । खुट्ट से आवाज  आनें पर , बुआ ,फूफा और खेदू सबसे पहले साईकिल का पहिया देखकर आश्वस्त हो जाते थे कि साईकिल सही सलामत है । एक बार फूफा जी , कीर्तन करनें चले गये थे , बिजली भी आती जाती थी , गलियारे से दो तीन बार खुट-खुट की आवाज हुई , खेदू और उसकी बुआ नें साईकिल का पिछला टायर देखा और आवाज को चूहे की शरारत समझकर शान्त हो गये । फूफा जी , करीब ९ बजे रात में लौटे , नवम्बर का महीना था , हल्की ठण्ड भी थी बुआ जी नें मेन गेट देखा तो फूफा जी गेट से होकर भीतर आ रहे थे , जो पहले से ही खुला लग रहा था । बुआ जी दौड़ती हुई आईं और पूछा - कैसे गेट खोला ? फूफा जी घबरा कर बोले - बन्द करना भूल गई होगी , ये तो खुला ही था । बुआ जी बोली - मैंनें खुद बन्द किया था । तब तक बालक खेदू भी वहाँ पहुँच गया और , गेट कैसे खुला पर चल रहे गहन विमर्श में शामिल हो गया । सब लोगों नें गलियारे में देखा ,साईकिल का टायर वाला भाग नजर आ रहा था , राहत मिली । फूफा जी नें ताला मेंन गेट में बन्द किया और ताले को कई बार जोर लगाकर खींच कर देखा  आश्वस्त हुए ,फिर सब लोग कमरे में दाखिल हुए । उसके बाद फूफा जी गलियारे में ताला बन्द करनें गये और जोर से चीखे । बुआ और खेदू  पूरी ऊर्जा के साथ वहाँ पहुँचे , फूफा जी के मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी वे थर-थर काँप रहे थे , बुआ जी बोली, करेन्ट मार दिया न , कहते थे कि लटकते कटे-फटे तार को ठीक कराओ । फूफा नें तर्जनी से साईकिल वाली जगह पर इशारा किया , बुआ जी को जबरदस्त झटका लगा , क्योंकि वहाँ साईकिल की जगह पुराना टायर रखा था ,जिसे इस तरह से रखा गया था कि वह बाहर से देखनें पर लगे की साईकिल वहाँ पर है । खेदू सारा माजरा समझ चुका था वह , झट से बाहर भागा और जोर-जोर से चोर-चोर का हल्ला करनें लगा । बैहत्था के बाबा , नकबहन्चू के बाबू , संगम लाल , श्रीवास्तव जी , जग्गी बाबू और अन्य पड़ोसी आये , और खेदू से पूछे । तब तक रोती चिल्लाती बुआ जी दौड़ती हुई आयीं और भीड़ की ओर देखकर बोली - हाय चोर नें बर्बाद कर दिया । फूफा जी भी पराजित टीम के कैप्टन की भाँति मुण्डी नीचे किये वहाँ आ गये । जग्गी बाबू बोले - चोर की हिम्मत तो देखिये , घर में दिन-दहाड़े चोरी । श्रीवास्तव जी नें जग्गी बाबू को सुधारा , ये दिन नहीं रात है जग्गी बाबू । नकबहन्चू के बाबू बोले - बड़ा हरामी चोर लगत है , बताओ सब लोग घर में और चोरी करके के निकल गवा । बैहत्था के बाबा भी कमेन्ट दिये - देखो ना कल , साईकिल के टायर बदलवा रहा , आज सुबह कऊनो ले के चम्पत हो गवा । हाँ तो का भवा रहा - निर्मल बाबू (खेदू के फूफा) आप के यहाँ ? देखिये ना गलियारे से साईकिल ले गया और एक फटा टायर वहाँ रख दिया , फूफा जी बोले । जग्गी बाबू बोले - कहीं वह वही टायर तो नहीं है जो बैहत्था के बाबा के यहाँ से चोर ले गया था । श्रीवास्तव जी बोले - बेटा खेदू जरा टायर तो लाना । खेदू झट से जाकर टायर ले आया , बैहत्था के बाबा - जोर से बोले - देखा हरामी चोर का , हमार टायर निर्मल बाबू के यहाँ रखके साईकिल ले गवा , साईकिल कहूँ रखीगा और कऊनो के स्कूटर चोराईगा । बात काटकर नकबहन्चू के बाबू बोले - फिर कहबो कि स्कूटर रखके उ कार चुराई , फिर कार रखके उ हवाई जहाज चुराई है ना । निर्मल बाबू चोरी का पता कैसे चला आपको - श्रीवास्तव जी बोले । फिर खेदू के फूफा नें सारे घटनाक्रम का वर्णन किया । पुलिस में रिपोर्ट की जाये या नहीं , इस पर सर्व सम्मत प्रस्ताव नहीं हो सका । सारे मोहल्ले वालों नें  वहाँ एक दो घन्टे तक,  उन सभी चोरी की वारदातों को याद किया जिसमें हैरतअंगेज ढ़ग से चोरों नें साबुन , तौलिया , घड़ी से लेकर साईकिल आदि की चोरी की थी । 
              दिसम्बर माह के आखिरी दिन चल रहे थे , खेदू की बुआ के भाई नें एक सुन्दर मरफी ट्रांजिस्टर , बुआ को खरीद कर दिया , बुआ जी अक्सर उसे सिरहानें मेंज पर रखकर विविध भारती से गानें सुनती रहती थीं । चूँकि ट्रांजिस्टर अभी नया-नया था इसलिये वे उसका वोल्यूम भी तेज रखती थीं , मोहल्लेवालों को भी अपना रेडियो या ट्रांजिस्टर बजानें की जरुरत नहीं पड़ती थी । एक दिन वे बाहरी दरवाजा खोलकर खाट पर लेटकर किशोर कुमार का एक गाना - सुन रही थीं, हलकी-हलकी झपकी उन्हें आ रही थी , माथे पर हाथ रखकर वे सोयी थीं , उन्हें नींद आ गयी । उनकी आँख खुली तो मोहम्मद रफी का गाना ट्रांजिस्टर में बज रहा था , मेंज की ओर देखा तो मरफी ट्रांजिस्टर की जगह एक पुराना मरम्मत किया हुआ ट्रांजिस्टर बज रहा था , उनका कलेजा धक्क से हो गया , इधर-उधर देखा मरफी ट्रांजिस्टर गायब था और उसका रुप बदल गया था , बुआ जी जोर से चिल्लायीं । अगल-बगल की महिलायें आ गईं , एक बारगी किसी को समझ में नहीं आया कि माजरा क्या है । बुआ जी नें सारी बात बताई । खेदू भी स्कूल से आया तो उसे चोर की कारामात का पता चला । फूफा जी शाम में घर आये तो वे भी चोर की अक्लमंदी के कायल हो गये । फिर उस दिन शाम को मोहल्ले वाले बुआ जी यहाँ जमा हुए और चाय पीकर मातम मनाया । सभी एक स्वर से चोर की ढिठाई पर तरह-तहर के कमेन्ट कर रहे थे । चोर नें एक बार फिर बुआ कर घर को निशाना बनाया था ।
                                                                                         क्रमशः

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

(अ) नैतिक समर्थन --- ।



प्रणाम ।
तुम इतनी रात में कैसे आ गये , तुम्हें सिक्योरिटी वाले रोकते क्यों नहीं ?
लंका में , हनुमान जी कैसे घुस गये बताईये , रावण की सिक्योरिटी तो आप से कहीं ज्यादा रही होगी ।
हनुमान जी , मच्छर के समान शरीर बनाकर गये थे , जैसा कि रामायण में लिखा है ।
हम कौन से हाथी बनकर आप के पास आये हैं , मँहगाई में शरीर पारदर्शी हो गया है ।
झूठ बोलते हो , सिक्योरिटी वालों को तुमनें सेट कर रखा है कल को कोई आतंकवादी आ जाये तब क्या होगा ।
पूरा देश ही सेटिंग पर चल रहा है , देश में कुछ भी असंभव नहीं है ।
तुम यहाँ किस लिये आये हो , कारण बताओ ?
मैं बिना मकसद , आप के यहाँ रात में आनें का रिस्क नहीं ले सकता । मैं पवार जी के बारे में जानना चाहता हूँ ।
२ नम्बर की कुर्सी उन्हें नहीं मिलेगी , इसके अलावा तुम और क्या जानना चाहते हो ?
सुना है कि वे बहुत नाराज हैं और सरकार गिरायेंगे नहीं लेकिन हिलाते रहेंगे ?
वे सरकार में भले न रहें लेकिन अपना नैतिक समर्थन हमें देते रहेंगे ।
बाहर रह कर समर्थन , सरकार में रहकर समर्थन , नैतिक समर्थन , इसका क्या अर्थ होता है ?
इसका अर्थ तो मुझे भी नहीं मालूम है , इसका अर्थ वे ही समझते हैं जो वैसा समर्थन हमें करते हैं ।
यदि आप मैडम से प्रार्थना करके अपनें बगल में टूटी कुर्सी ही रखवा देते तो क्या, आपकी इज्जत गिर जाती ?
टूटी कुर्सी तो क्या, वहाँ जमीन पर बैठनें को नहीं मिलनें वाला , वैसे मेरी तरफ से नो कमेन्ट ।
अपनें बगल से आप एन्टॉनी को भी यदि हटा देते और दिग्विजय बाबू को बैठा देते तो झगड़ा खत्म नहीं हो जाता ?
क्या मैंनें उन्हें बिठाया है , अपनें बगल में ? पागल जैसी बात करते हो, मेरी हिम्मत है , उन्हें वहाँ से हटानें की ?
आप तो शालीन व्यक्ति हैं , क्रोध क्यों कर रहें हैं मेरे ऊपर ।
तुम ऐसी बेवकूफी की बात करोगे तो मुर्दा भी गुस्से से उठकर चिल्लानें लगेगा ।
देखिये कभी-कभी जन भावना का ख्याल भी रखना चाहिये , आप लोगों को ।
कैसी जन भावना ? मैडम की भावना को ठेस नहीं लगे ,सदैव हम लोग केवल इसी प्रयास में लगे रहते हैं । 
अच्छा , बाबा रामदेव और अन्ना जी देशव्यापी अनशन व आन्दोलन करनें जा रहें हैं , इसपर कुछ कहेंगे ?
देखो , मेरी समझ में आज तक ये नहीं आया कि वे लोग आन्दोलन क्यों और किसके विरुद्ध  कर रहें हैं ?
आप ही लोगों के विरुद्ध तो आन्दोलन हो रहा है, जो-जो कुकर्म हुए हैं वे लोग हिसाब माँग रहे हैं ।
मैंनें अपनें पूरे जीवन काल में मैंने कोई बुरा काम नहीं किया, लेकिन किसी को कुकर्म करनें मना भी नहीं किया ?
देखिये , बाबा रामदेव विदेशों में जमा काला धन देश में लाना चाहते हैं और अन्ना जी लोक-पाल बिल चाहते हैं ।
बाबा रामदेव को किसनें मना किया है कि  काला धन देश में न लाकर रखें , मैंनें तो नहीं रोका है ।
वे भ्रष्टाचारियों और घोटाले-बाजों द्वारा विदेशों में जमा किये गये काले धन को लानें की बात कर रहे हैं ।
मेंरी समझ में नहीं आता कि दूसरों के द्वारा जमा पैसे को कोई और कैसे ला सकता है ?
लोग आपसे उम्मीद करते हैं कि आप यदि चाहें तो कानून बनाकर सारा काला धन देश में मँगा सकते हैं ।
ऐसा कानून बनना संभव नहीं है ,क्योंकि इससे देश का विकास रुक जायेगा ।
आप तो अर्थ-शास्त्री हैं , फिर ऐसा क्यों कह रहे हैं ?
पहले तुम बोलो , सब जानते हुए तुमनें ऐसा प्रश्न क्यों किया ? 
काला-धन तो देश में आनें से रहा , लेकिन अन्ना जी के लोकपाल बिल के बारे में आप की क्या राय है ?
इस बिल को मेरा वैसा ही नैतिक समर्थन है , जैसा समर्थन हमें पवार जी दे रहे हैं ।
तो हम जनता को आश्वस्त कर दें कि लोकपाल बिल जल्द पास हो जायेगा ?
मैंनें उसके पास होनें के बारे में नहीं नैतिक समर्थन देनें के बारे में कहा है ।
कुछ और सवाल पूछूँ , जिनके उत्तर देश की जनता बहुत दिन से चाह रही है ?
अब बहुत हो गया , भागते हो कि बुलाऊँ, सिक्योरिटी को ।

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रविवार, 22 जुलाई 2012

फूट डालो और कूट डालो ।



ई का बड़बड़ा रहे हो लल्लन भाई ?
मैं सही कह रहा हूँ , यही नीति का पालन ही सबसे उत्तम राजनीति है । समझे खेदू लाल ।
यही नीति तो अँग्रेजों की भी रही ना लल्लन भाई , कि पहले झगड़ा कराओ , ना झगड़ें तो दोनों को कूटो ।
तुम लोग सारा दोष बस अँग्रेजों के माथे पर मढ़ देते हो , यह नीति वे हमारे देश में सीखे और यहीं लागू किये ।
लल्लन , तुम कोई स्टेटमेंट नहीं दिये , जो बाबा के सेना पति को जेल में डाला गया ।
देखो खेदू हम तुम्हें एक पुरानी कहानीं सुनाते हैं , ध्यान से सुनना हो तो सुनायें ।
शिक्षा-प्रद हो तो सुनाओ ।
सुनो --
              " बहुत समय पहले की बात है , एक ब्राह्मण , एक क्षत्रिय और एक नाई , देशाटन पर निकले । एक नगर के भ्रमण के दौरान , वे लोग एक खेत के पास पहुँचे और देखा कि खेत में मकई (भुट्टा) की सुन्दर फसल लगी है। अगल-बगल देखा , खेत का कोई रक्षक वहाँ मौजूद नहीं था । आपस में राय विचार करके वे लोग खेत के पास बैठ गये और , भुट्टा तोड़-तोड़ कर उसे भूनकर खाना शुरु कर दिये । खेत के मालिक नें दूर से खेत में हलचल देखी , वह थोड़ा करीब आया तो , उसनें उन लोगों को भुट्टा तोड़कर खाते देखा । उसनें मन में विचार किया कि यदि मैं तत्काल उन लोगों से पंगा लूँगा तो ठीक नहीं होगा ,क्योंकि एक तो वे संख्या में तीन हैं और मैं अकेला  ,साथ ही साथ वे शारीरिक बल में भी ज्यादा लगते हैं इस लिये भेद की नीति का पालन करता हूँ । इस प्रकार विचार करता हुआ वह तीनों के सम्मुख उपस्थित हुआ और बोला - आप लोग राहगीर हैं , ये खेत मेंरा ही है , चूँकि आप लोग हमारे अतिथि हैं , जी भर के खाइये । इस पर प्रसन्न हो , तीनों नें मुफ्त माल दिले-बेरहम समझ कर बेरहमी से मकई की फसल को कम करना शुरु कर दिया । इस बीच खेत के मालिक नें तीनों की जात का पता लगा लिया ।
             खेत का मालिक , क्रोध को नियंत्रित करते हुए , नाई से बोला - तुम रुक जाओ । नाई ने कहा - मुझे  ही केवल क्यों रोक रहे हो । इस पर खेत का मालिक बोला -   ये ब्राह्मण देवता तो साक्षात् भगवान के रुप हैं , और ये क्षत्रिय जी अगर न रहें तो , हमारी रक्षा कौन करेगा । इनका तो पूरा अधिकार है हमारे खेत पर  । अरे नीच नाई , तू इन ब्राह्मण देवता और क्षत्रिय जी के समकक्ष अपनें को रखता है । इन बातों को कहनें के साथ ही उसनें नाई की खूब पिटाई की , नाई मुँह लटकाये चला गया , लेकिन ब्राह्मण और क्षत्रिय मित्रों नें कोई हस्तक्षेप नहीं किया ।
            नाई की पिटाई पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया न करके वे दोनों आराम से भुट्टा खानें में लगे रहे । तभी उस खेत के मालिक नें अपनें हाथ से दो-चार भुट्टे की बालियाँ तोड़ी और ब्राह्मण के सामनें रख दिया । फिर क्षत्रिय की ओर  आया और बोला - ब्राह्मण तो साक्षात् भगवान होते हैं । तुम अपनें को क्षत्रिय कहते हो , जिसे पुरुषार्थ के बल पर रहना चाहिये , तुम को शर्म नहीं आती चोरी करके खाते , तुम अपनें वंश और कुल के लिये घातक हो , इस प्रकार उसनें क्षत्रिय को भी बुरा भला कहते हुए बेरहमी से पीटा । ब्राह्मण मित्र नें कोई हस्तक्षेप नहीं किया । क्षत्रिय और नाई को बल भर कूट लेनें के बाद , खेत का मालिक ब्राह्मण के पास आकर बोला - बन्द कर भुट्टे खाना नीच , तेरे सामनें तेरे मित्र मार खाते रहे तू कुछ नहीं बोला , तेरे जैसे ब्राह्मण ही कलंक के समान हैं , जो सबको धर्म की बात बताता है , पाप करनें से मना करता है और खुद चोरी करके भुट्टे खाता है , इन वचनों को बार-बार दुहराते हुए उस खेत वाले नें नाई और क्षत्रिय के सामनें ब्राह्मण की जम कर पिटाई की । 
            इस प्रकार उस अकेले खेत वाले नें पहले तीनों के बीच फूट पैदा की और बाद में उन तीनों को  जम कर  कूटा , और तीनों की स्थिति ऐसी कर दी , ताकि उनमें से कोई किसी पर हँसनें ना पाये । तीनों मुँह लटकाये , देशाटन को छोड़कर , एक दूसरे पर आरोप लगाते , अपनें गाँव आ गये ।"
लल्लन भाई , बड़ी जोरदार कहानी सुनाये , लेकिन समझ में ई नहीं आ रहा है कि क्या सचमुच किसान अक्लमंद था ?
खेदू लाल , किसान अक्लमंद रहा हो या नहीं लेकिन , आपसी एकता के अभाव में तीनों कूटे गये और बेईज्जत हुए ।
लल्लन भाई , ई कहानी सुनाये के तुम्हार मकसद का रहा ?
देखो खेदू , रामदेव बाबा के कमान्डर बाल किशन हैं , उनकी हालत नाई वाली बननें वाली है ।
कैसे लल्लन भाई ?
देखो खेदू , कैसे आराम से जेल में ठूँस दिये गये , कहीं कुछ हल्ला या चिल्लपों मचा । 
लेकिन लल्लन भाई , उनसे बड़े-बड़े कुकर्मी तो बाहर टहल रहे हैं , उनको काहे नहीं जेल भेजती सरकार ?
देखो खेदू , तुम्हारे कहनें से कोई कुकर्मी नहीं हो सकता , जो बाहर हैं , उनके खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं है ।
पुख्ता सबूत के बावजूद भी तो , उनके खिलाफ कोई कायर्वाही नहीं होती ?
यहीं पर एकता काम आती है खेदू , हाथ लगाते ही हल्ला , हंगामा हो जायेगा , और फिर -- ।
हल्ला , हंगामा तो ये लोग भी कर सकते हैं , लल्लन भाई ?
दोनों के हल्ला करनें में बहुत अन्तर होगा खेदू लाल , वे लोग भुट्टा चोर थोड़े हैं , पावर फूल खेत चोर हैं ।
लल्लन भाई आप तो हताश करनें वाली बात करते हैं , पूरा देश एक साथ खड़ा है अन्ना व बाबा रामदेव के साथ ।
खेदू , ज्यादा क्रान्तिकारी न बनों, यदि एकता न होगी तो नाई के बाद किसकी बारी आती है , इसका इंतजार करो ।
लल्लन तुमरे जईसे आदमी देश के लिये कलंक और आपसी एकता में बाधक हैं , आज से बात न करना , समझे ।

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