बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

देश को लूटनें की , हजार साल पुरानी परम्परा अभी भी कायम ।

                  
            संसार के तमाम देशों की तरह हमारा देश भी परम्परा का निर्वाह करनें वाल देश है । देश की कुछ परम्परायें तो इतनी पुरानी हैं कि यह भी याद नहीं है कि उसका पालन हम भारतीय कबसे कर रहे हैं । बहुत सी परम्परायें ऐसी हैं जिनके बारे में इतिहास की पुस्तकों में कुछ गलत और कुछ सही लिखा मिल जायेगा । हमारे देश का इतिहास , अत्यन्त सावधानी पूर्वक लिखा गया है ताकि देश के किसी भाग्य- विधाता को या पुरानें भाग्य-विधाताओं को बुरा न लगनें पाये । आज की पीढ़ी को जो इतिहास की जानकारी दी जा रही है , वह एक प्रकार की सेन्सर्ड हिस्ट्री कही जा सकती है , ताकि देश के सेकूलर ढाँचे पर आँच ना आये और वोट बैंक की राजनीति पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े । खैर , सरकारी इतिहास की पुस्तकों के अलावा देश के तमाम लोग अपनें-अपनें धर्म व मजहब और विश्वास के आधार पर इतिहास आनें वाली पीढ़ी को पढ़ा रहें हैं ।
           विषय से भटकनें से पहले ही हम मूल विषय पर आते हैं । हम बात कर रहें हैं अपनें देश की उस महान् परम्परा के बारे में , जिसे देश को लूटना कहते हैं । इतिहास साक्षी है कि जब से भारत में विदेशी आक्रमणकारियों नें भारत को लूटना प्रारम्भ किया तभी से उस परम्परा को जीवित रखनें का प्रयास हम भारतीय कर रहे हैं । मोहम्मद बिन कासिम या उसके पूर्व से जारी इस देश लूट की परम्परा को हम भारतीय छोड़ना भी नहीं चाहते । हमारा इतिहास गवाह है कि जयचन्द टाईप के लोग आपसी वैमनस्य में भी वैसे लूटेरों को अपनें देश में आनें की खुली छूट देते रहे हैं , और उसको बताते हैं कि कैसे देश की सम्पत्ति को लूटा जाये और फिर वह लूटेरा दोनों को लूटकर चल देता था , और कभी-कभी वह कई-कई बार लूट की घटना को अंजाम देता था ।
             हम भारत वासी तैमूरलंग जी और महमूद गजनी जी के या मोहम्मद गोरी जी के अत्यंत आभारी हैं जिन्होंनें हम देश वासियों के लूटनें की परम्मपरा को और मजबूत किया । बाद के दिमागदार आक्रमणकारियों को जब  हमारे  देश के समझदार मेजबानों नें देश को लूटनें का न्यौता दिया तो उन्हें लगा कि बार-बार यहाँ की सम्पत्ति को लूटकर और देश की महिलाओं व पुरुषों को गुलाम बनाकर अपनें वतन ले जानें से बेहतर है , यहीं रहा जाये और यहाँ के अतिथि देवो भव की भावना वाले , नमक खानें के बाद नमक हारामी ना करनें वाले , लालच के लिये अपनें भाईयों तक का खून करके कोई उपाधि पानें वाले भारत वासी स्वयं ही सारी ऐशो आराम की चीज उपलब्ध करा देंगे , और भगवान की कृपा से सब कुछ वैसा ही हुआ ।
             उसके बाद दौर शुरु हुआ , भारत में अग्रजों का और अन्य प्रकार के विदेशियों जैसे फ्राँसीसी और पुर्तगाली लोगों का , उन लोगों को जो भी हाथ लगा वे देश को नोंचकर ले गये । देश को लूटनें और नोचनें का ज्यादा लम्बा कार्यकाल अँग्रेज लोगों का रहा और हम भारतीयों की लूटनें की परम्परा का खूब पालन हुआ और हम भारतीय अपनी उस गौरवमयी परम्परा का पालन अनवरत करते रहे । जब अँग्रेज देश को लूटते-लूटते थक कर उब गये तब उन्होंनें देश का शासन भारतीयों और पाकिस्तानियों के हाथ में सौंप दिया । जिसको हम हिन्दी में स्वतंत्रता , ऊर्दू में आजादी और अँग्रेजी भाषा में इंडिपेन्डेन्स डे के रुप में मनाते हैं ।
              लूट की परम्परा का पालन भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में कायम है , जनता का ध्यान कहीं लूट पर ना चला जाये इसलिये ये दोनों देश बीच-बीच में देश की जनता को मूर्ख बनानें के लिये और देश-भक्ति जागृत करनें के लिये , एक दूसरे पर जुबानी वार करते हैं और भले ही देश की जनता भूखे मरे , एक दूसरे का नाश करनें के लिये युद्ध की सामग्री खरीदते हैं । हद तो तब होती है जब दोनों ही देश के राजा या बादशाह ( नेता-गण ) एक ही दुकानदार से सामान खरीदते हैं , वह दुकानदार अमेरिकी हो , फ्राँस का हो ईटली का हो या जर्मनी का हो । कभी-कभी ऐसा भी लगता है जैसे दोनों देश के खरीदार राजा या बादशाह एक ही साथ दुकान पर पहुँचते हैं और एक दूसरे से सलाह करके ही सौदा पक्का करते हैं । इन सब में कितनी लूट होती है इसका खुलासा कोई नहीं कर सकता क्योंकि देश की रक्षा के मसले पर आप कोई सवाल पूछे नहीं कि देश द्रोही घोषित हुए । बहरहाल खबर उड़ती है कि करोंड़ों रुपया या करोंड़ों डालर का घपला हुआ , रक्षा सौदे में । कुछ दिन हल्ला गुल्ला होनें के बाद दोनों ही देश के नागरिक किसी नये लूट के पर्व की प्रतिक्षा करनें लगते हैं ।
               हम भारत के लोग जो कि लूट के त्यौहार को बेहद जश्न पूर्वक मनाते हैं , उसमें अब मीडिया का रोल भी शामिल हो गया है । इन्डिपेन्डेन्स मिलनें के बाद देश में लूट का त्यौहार ज्यादा लोग नहीं मना पाते थे कि क्योंकि उस समय कुछ ऐसे नेता थे जिनको सत्यमूर्ति कहा जाता था , वे जो कह देते थे वह ब्रह्म-वाक्य सरीखा होता था , वे कहते हम देश को नहीं लूटे या फलानें नें देश को नहीं लूटा , हम देश वासी उनकी बात मानकर चुप हो जाते थे ।
                अँग्रेजों के आगमन के पूर्व जिस प्रकार देश की सम्पत्ति को लूटकर या यहाँ की महिलाओं और पुरुषों को गुलाम बनाकर विदेश ले जानें की परम्परा रही है , अँग्रेजों नें उस परम्मपरा का कुछ सीमा तक पालन किया । बाद में उस परम्मपरा के निर्वहन में कुछ गिरावट आई । इन्डिपेन्डेन्स भारत में शुरुआत में यह लूट की परम्परा लगभग लुप्त होनें के कगार पर थी , लेकिन देश वासियों के सौभाग्य से  विगत २०-२५ साल से देश में इस प्रकार की लूट की परम्परा का पालन बड़े पैमानें पर किया जा रहा है । हमारा देश पर्व और त्यौहारों को उत्साह-पूर्वक मनाता है , उसी उत्साह और जोश के साथ , हम लूट रुपी पर्व को मनाते आ रहे हैं । इस पर्व की कोई तिथि या मुहुर्त नहीं होता , जब जिसको मौका मिला , इस पर्व को मना लेता है और हम देशवासी उसके जश्न में शामिल हो जाते हैं ।
             इतिहास अपनें को दुहरा रहा है , आज के समय में फिर वही ऐतिहासिक घटना हो रही है , और देश की सम्पत्ति को लूटकर हमारे वर्तमान् भाग्य-विधाता शासक वर्ग के लोग , विदेशों में हमारे देश का लूटा हुआ  धन जमा कर रहें हैं । पता नहीं उन सबकी योजना क्या है ? लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि उन्हें शंका है कि कभी ना कभी इस देश की जनता जो शीत-निद्रा में है जाग जायेगी और लूट की परम्परा को रोकनें का प्रयास करेगी , तब वैसे लोग इस देश को उसी प्रकार छोड़ देंगे जिस प्रकार , अँग्रेजों ने छोड़ा था , तब वैसे समय में विदेशों में जमा धन ही सहायक होगा ।
              फिलहाल ऐसा सोचना अभी बहुत गलत होगा , क्योंकि हम भारतवासी लूटे जानें के लिये ही बनें हैं , और बहुत दिन तक यदि कोई ठीक से नहीं लूटता तो , हम भारतवासियों को बैचैनी होनें लगती है । फिर से मन्दिरों में सोनें जमा हो गये हैं , देश वासी विकास के जश्न में लगे हैं , देश फिर सोनें की चिड़िया बननें की ओर है , पता नहीं  किसी देश-भक्त नें तैमूर जी या महमूद गजनी जी को खबर दी या नहीं । हम भारतवासी चादर तानकर सो रहें हैं , अगली कोई अच्छे किस्म की लूट देश में हो तो जगा देंना , ताकि लूट के जश्न को हम भी मीडिया के साथ सेलीब्रेट कर सकें ।
                                             Thanks .
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