सोमवार, 18 सितंबर 2017

रोहिंग्याओं के लिये बिलखते तथाकथित सेकूलर व गद्दार


                  रोहिंग्याओं के लिये बिलखते सेकूलर व गद्दार

     जिस समय काश्मीर घाटी में हिन्दुओं को काटा जा रहा था वहाँ से भगाया जा रहा था तब तथाकथित सेकूलरों और मुस्लिम नेताओं नें अपनें मुँह को बन्द कर रखा था । भारत की संस्कृति अतिथियों का सम्मान व स्वागत करना सिखाती है लेकिन हमारी उस आवभगत वाली संस्कृति का लाभ उठाकर जब हमें बेदखल करनें की साजिश हो तब वह मेहमान नवाजी नहीं मूर्खता होगी ।

   इन रोहिंग्या मुसलमानों को काश्मीर में बसनें पर देश के सेकूलर व मुलसमान नेता चुप रहते हैं लेकिन जब काश्मीर में हिन्दुओं के बसानें की बात आती है तब ये सारे चुप क्योंं हो जाते हैं । 

  हिन्दुओं नें सदियों से अपनी बहुत दुर्गति देखी है । बहुत पीड़ा व अपमान सहा है । अब ऐसा कोई काम नहीं होना चाहिये जो हमारे देश की आनें वाली पीढ़ी के लिये दुःखदायक हो ।

  रोहिंग्या मुलसमान भविष्य में देश के लिये घातक सिद्ध होंगे या नहीं इस पर बहस करना बेकार है । हम क्यों ऐसा कोई खतरा मोल लें जो आगे हमारे लिये सिरदर्द बन जाये । हमारे देश में वैसे ही बहुत समस्यायें हैं । हमें एक और समस्या नहीं चाहिये । ये रोहिंग्या किसी भी हालत में हमारे देश में रहनें के लायक नहीं हैं । सिर्फ रोहिंग्या ही नहीं, देश के भीतर बैठे जो अन्य घुसपैठिये व गद्दार हैं उन्हें भी देश से बाहर करना चाहिये , जो हमारे हिस्से का अन्न खाकर हमारे देश के लिये घातक बने हुए हैं । 

  हमें हँसी तब आती है जब पूरी दुनिया को मानवता के सन्देश देनें वाले हमारे देश को ही मानवाधिकार की बात समझाते हैं । सच तो ये है कि यदि हम आज अपनी सहिष्णुता त्याग दें तो देश के साथ गद्दारी करनें वाले गोबरैले कीड़े से ज्यादा की हैसियत वाले साबित नहीं होगें ।

 

रविवार, 10 सितंबर 2017

प्रद्युम्न की माँ और --------- को समर्पित


प्रद्युम्न की माँ और --------- को समर्पित


तुम आओगे नहीं मालूम है , मैं दर्द सहकर, तुम्हारा नाम लेकर जी लूँगी, 

लेकिन, 

स्कूल से आकर जो कुछ भी तुम सुनाते थे,

उन्हें सुननें का जी करेगा तो क्या करूँगी,

तुम जो कपड़े उतार कर फेंक देते थे इधर उधर,

उन्हें सहजनें और साफ करनें का जी करेगा तो क्या करुँगी

तुम्हारी फर्माईशें जिनको पूरा करनें के लिये हम कुछ भी करते थे,

उन फर्माईशों को सुननें का जी करेगा तो क्या करूँगी,

रोज रात को मेरे बिना तुम सोते नहीं थे,

तुम्हें सुलानें का जी करेगा तो क्या करूँगी,

सुबह स्कूल जानें के लिये कितनी मशक्कत के बाद तुम तैयार होते थे,

तुम्हें फिर से तैयार करनें का जी करेगा तो क्या करूँगी,

टिफिन की तैयारी से होती थी, सुबह की शुरुआत मेरी,

तुम्हारे खाली टिफिन में कुछ रखनें का जी करेगा तो क्या करूँगी,

बाहर शोर हो रहा, बच्चे घर को लौटते होंगे,

ऊँगली पकड़कर, घर में लानें का जी करेगा तो क्या करूँगी

 रिकवरी आफ इंडिया   बनाम   डिस्कवरी आफ इंडिया   संसार के अधिकांश इतिहासकारों नें अपनें देश का इतिहास लिखते समय इस बात का ध्यान र...