सर्वप्रथम मैं उन तमाम लोगों से एडवांस क्षमा माँगता हूँ कि जिन लोगों को मैं कमीना , देश का लूटेरा , भ्रष्टाचारी , बेईमान् , टुच्चा और वे सभी गालियाँ जिनको यहाँ लिखना संभव नहीं , दे रहा हूँ , वे मुझे उन सभी गालियों और उपाधियों के लिये क्षमा करेंगे , क्योंकि स्वयं मेरे पास वैसे लोगों के खिलाफ कोई प्रमाण नहीं है , जिनके लिये मैं उन्हें गालिया आदि परोस रहा हूँ । जो भी सुनी- सुनायी या पढ़ी-पढ़ायी जानकारी मेरे पास है वह पत्र-पत्रिकाओं के पढ़नें या समाचार चैनलों की कृपा से है ।
आप सोच रहे होंगे कि किस डकैतों के गिरोह का मेम्बर चोरी जैसी गिरी हुई घटिया हरकत कर सकता है , क्योंकि उसके चोरी जैसी हरकत के कारण डकैतों के अन्य समूहों के बीच उनकी साख को गिरनें का खतरा हो सकता है । डकैतों के समूह का सरदार कौन है ये किसी को नहीं मालूम , क्योंकि दल का सरदार हमेशा किसी दूसरे को सामनें कर देता है और बाद में लोग जान पाते हैं कि वह सरदार नहीं कोई सेवक था , जिसे कुछ देर के लिये सरदार के रुप में पेश किया गया था ।
बात हम उस चोर की कर रहें हैं जिसके कारण डकैतों के दल की साख को खतरा पहुँचनें की संभावना है । प्रगतिशील युग में डकैतों के प्रवक्ता भी बन गये हैं । एक स्वयंभू प्रवक्ता नें ताल ठोंका है - हम डकैत हैं , देश का माल लूट सकते हैं , लेकिन हमारा कोई सदस्य चोरी जैसी ओछी हरकत नहीं कर सकता ।
जनता के बीच से आवाज आयी , उस चोर नें बेचारे अपाहिज , चलनें-फिरनें पर मजबूर विकलाँग लोगों को दिये जानें वाले पैसे को चुरा लिया ।
डकैतों के प्रवक्ता नें कहा - वह हमारे दल के लिये जान तक देनें की बात दो-चार दिन पहले कर चुका है उसकी निष्ठा पर हमारे दल के सरदार और समूह के अन्य सदस्यों को कोई संदेह नहीं है , जरुर आप लोगों को गलत फहमी हुई है या किसी नें अफवाह उड़ाई है । चोरी या चोरी-चोरी किये गये वैसे कार्य जैसा कि माननीय अभिषेक मनु सिंधवी जी नें या नारायण दत्त तिवारी जी नें किया , उसकी हम ना ही प्रशंसा करते हैं ना ही भर्त्सना करते हैं । क्योंकि वैसे कार्य अत्यंत तुच्छ प्रकृति के होते हैं जिनपर ध्यान देना हम बड़े लोगों का कार्य नहीं है ।
सब तो ठीक है लेकिन हम आपहिजों का पैसा क्यों चुराया - जनता नें हूँकार भरी ।
प्रवक्ता नाक में ऊँगली डालते हुए बोला - तुम लोगों को मुफ्त का माल चाहिये । क्या वह पैसा तुम लोगों के बाप का था , जो चिल्ला रहे हो चुरा लिया , चुरा लिया । उसके ट्रस्ट का पैसा था वह उसे बाँट कर खाये या अकेले खाये । तुम्हारे बाप के पेट में दर्द क्यों हो रहा है , जो टोपी वाले केजरीवाल के साथ हल्ला करनें पर अमादा हो ।
तुम नेता लोग , ये तमाम कम्पनियाँ और ट्रस्ट इतनें आराम से कैसे खोल लेते हो - जनता के बीच के एक पढ़े-लिख विकलाँग नें प्रश्न फेंका ।
प्रवक्ता नें लपकते हुए उत्तर दिया - इसके लिये तुम जनता ही जिम्मेदार हो , हम सभी दल के नेताओं को यह खतरा बना रहता है कि कहीं तुम लोग हम लोगों को बेरोजगार ना बना दो या हम लोगों को अपनें कारनामों के कारण देश छोड़कर भागना पड़े तो हम नेता लोग क्या करेंगे क्योंकि किसी भी नेता को स्वयं कुछ करनें आता ही नहीं वास्तव में हम नेता लोग किसी काम के लायक होते भी नहीं , वैसी दशा में अपनें जीवन-यापन के बारे में सोचकर हम सभी दल वाले एक समझौते के तहत कम्पनी और ट्रस्ट बनाते हैं ताकि यदि देश से भागना पड़े या बेरोजगारी की दशा आये तो अपना खर्च चलता रहे ।
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सब तो ठीक है लेकिन हम आपहिजों का पैसा क्यों चुराया - जनता नें हूँकार भरी ।
प्रवक्ता नाक में ऊँगली डालते हुए बोला - तुम लोगों को मुफ्त का माल चाहिये । क्या वह पैसा तुम लोगों के बाप का था , जो चिल्ला रहे हो चुरा लिया , चुरा लिया । उसके ट्रस्ट का पैसा था वह उसे बाँट कर खाये या अकेले खाये । तुम्हारे बाप के पेट में दर्द क्यों हो रहा है , जो टोपी वाले केजरीवाल के साथ हल्ला करनें पर अमादा हो ।
तुम नेता लोग , ये तमाम कम्पनियाँ और ट्रस्ट इतनें आराम से कैसे खोल लेते हो - जनता के बीच के एक पढ़े-लिख विकलाँग नें प्रश्न फेंका ।
प्रवक्ता नें लपकते हुए उत्तर दिया - इसके लिये तुम जनता ही जिम्मेदार हो , हम सभी दल के नेताओं को यह खतरा बना रहता है कि कहीं तुम लोग हम लोगों को बेरोजगार ना बना दो या हम लोगों को अपनें कारनामों के कारण देश छोड़कर भागना पड़े तो हम नेता लोग क्या करेंगे क्योंकि किसी भी नेता को स्वयं कुछ करनें आता ही नहीं वास्तव में हम नेता लोग किसी काम के लायक होते भी नहीं , वैसी दशा में अपनें जीवन-यापन के बारे में सोचकर हम सभी दल वाले एक समझौते के तहत कम्पनी और ट्रस्ट बनाते हैं ताकि यदि देश से भागना पड़े या बेरोजगारी की दशा आये तो अपना खर्च चलता रहे ।
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