बुधवार, 9 मई 2018

राहुल गाँधी और पी. एम. की कुर्सी

राहुल गाँधी और पी. एम. की कुर्सी 


        राहुल गाँधी जी बोले हैं कि यदि उनकी पार्टी उन्नीस में चुनाव जीती तो वह प्रधानमंत्री बन सकते हैं . बी,जे.पी. के एक नेता बोले कि राहुल जी मुंगेरी लाल के हसीन सपनें देखते हैं . मेरे मन में बहुत कौतूहल हुआ कि ये मुंगेरी लाल कौन थे और वे हसीन सपनें ही क्यों देखते थे . सपनें तो सब देखते हैं कोई सोते समय और कोई जागते समय . किसी के सपनें पूरे होते  हैं किसी के पूरे नहीं होते . 
           ये सपनें भी अजीब होते हैं , कभी सपनें में सब कुछ मिलता जाता है और कभी सपनें में सब खोता जाता है सपनें के अनुसार ही हम खुश होते हैं और दुखी होते हैं . 
        राहुल जी नें प्रधान मंत्री बननें का सपना सोते में देखा है या जगते में यह महत्वपूर्ण नहीं, महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने प्रधान मंत्री बननें का ही  सपना क्यों देखा ?
          हमारे देश में प्रधानमंत्री बननें का सपना देखनें वाले बहुत हैं . सपना देखनें वालों में कुछ ऐसे भी हैं जो देश के लिए एक दु:स्वप्न से कम नहीं हैं . ममता बनर्जी, सुश्री मायावती, मुलायमसुत अखिलेश यादव, अरविन्द केजरीवाल  तक तो गनीमत है लेकिन यदि वैसा कोई सपना लालू जी के पुत्र तेजस्वी जी भी देखे होंगे तो यह निश्चित रूप से हमारे देश के लिए एक बुरी खबर है .  
        राहुल गाँधी जी को प्रधानमंत्री बनने का सपनें देखनें  का पूरा हक है . एक ज्योतिषी जी नें मुझे भी बताया था कि तुम बहुत ऊंचे जाओगे , मैं आज तक ज्योतिषी जी की वाणी के सत्य होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ , हो सकता है ज्योतिषी जी नें मेरे अगले जन्म  के भविष्य के बारे में बताया  हो . 
          भगवान करें राहुल जी का सपना सच हो . यदि राहुल जी प्रधानमंत्री बन जायेंगे तो कम से कम उनके ऊपर यह आरोप नहीं लगेगा कि  वे हर काम अपनी मम्मी से पूछ कर करते हैं . आपको याद होगा जब बेचारे मनमोहन सिंह सोनिया गाँधी जी के द्वारा देश के प्रधानमंत्री बनाये गये थे तो विपक्ष वाले हल्ला करते थे कि वे बिना सोनिया जी से पूछे या उनकी अनुमति लिए बिना कोई काम नहीं करते थे . एक बार गलती से बेचारे नें अपनें मन से कोई कागज तैयार किया था उसे राहुल जी नें सार्वजनिक रूप से बकवास करार देते हुए फाड़ कर  रद्दी की टोकरी में फ़ेंक दिया था . 
            राहुल गाँधी यदि प्रधान मंत्री बन गये तो हमारे देश का भला होगा या बुरा यह अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन लालू यादव अपनें को किंग मेकर जरुर मान लेंगे जो फिलहाल चारा घोटाले के मामले  में अभी जेल में हैं. लालू के अलावा , ममता बनर्जी, अखिलेश यादव व मायावती भी यह दावा करेंगे कि उन्होंने राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनानें में मदद की है . इस प्रकार कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक यह दावा करनें वाले बहुत होंगे कि उन्होंने ही राहुल जी को प्रधानमंत्री बनवानें में मदद की है . इस प्रकार के दावेदार अपनें-अपनें अहसानों का टोकरा राहुल जी के सिर पर लाद देंगे जिसे लेकर राहुल जी को लगातार ढोना पड़ेगा . 
         राहुल गाँधी पर एहसान का टोकरा लादनें वाले अधिकांश वे लोग होंगे जो किसी न किसी तरह से राजनीति के गटर में बैठे हैं और उनके अपनें लोग किसी घोटाले में फंसे हैं या जेल में बन्द हैं . लालू जी रोज भगवान से मनाते होंगे कि अगला लोक सभा चुनाव हो और राहुल जी देश के प्रधानमंत्री बनें और वे जेल से बाहर आ सकें . 
          राहुल जी प्रधान मंत्री बनना  जितना आसान  समझ रहें हैं वास्तव में वैसा है नहीं . उनके साथ खड़े दिखायी देनें वाले तमाम नेता आपस में एक दूसरे के प्रबल दुश्मन हैं . अखिलेश और मायावती के बीच 36 का आंकड़ा है लेकिन दोनों ही मोदी जी के हाथों  पिट चुके हैं इसलिए एक साथ नजर आते हैं . राहुल गाँधी जिन दलों के लोगों को एक साथ लेकर चलनें और प्रधान मंत्री बननें का सपना देख रहें हैं वह एक अधूरा स्वप्न है जो पूरा नहीं हो पायेगा . राहुल गाँधी को पहले अपनी राजनीतिक ताकत को बढ़ाना चाहिये . वे जिन लोंगो के सहारे सत्ता के शीर्ष पर जाना चाहते हैं वे लोग बेहद अवसरवादी और चालाक लोग हैं . यदि सत्ता में आनें के बाद राहुल जी नें अखिलेश को महत्व दिया तो मायावती नाराज होंगी . परस्पर विरोधी सोच वाले लोगों को एक साथ लाना उसी प्रकार होगा जैसे तराजू पर मेंढकों को रखना . 
            मैनें तो केवल एक सलाह दी है , बाकी सपनें देखना आप का काम है . 

मंगलवार, 8 मई 2018

विचार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का शिकार


विचार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का शिकार

हिंदी फिल्मों नें जातीय विद्वेष के धीमें जहर को बहुत धीरे-धीरे फैलाया, फिल्मों में राजपूत का मतलब एक निर्दयी, क्रूर व अत्याचारी होता है जिसके अंदर रावण . पंडित का मतलब धूर्त व पाखंडी तथा राजपूत जमींदार का चमचा . राजपूत जमींदार की बेटी का छोटी जाति के युवक से प्रेम , प्रेमी का राजपूत जमींदार से जंग और राजपूत जमींदार की पराजय व पंडित जी की अच्छे से धुलाई . फ़िल्म के निर्माताओं और कहानीकारों को यह फार्मूला खूब भाता था, और कमाल तो ये था कि सभी जातियों के दर्शकों की सहानुभूति छोटे जाति के युवक के साथ होती थी और वे जमींदार व पंडित की पिटाई पर ताली भी बजाते थे .
लेकिन दर्शकों के किस वर्ग नें उन फिल्मों से क्या सीखा और क्या पाया आज हमारे सामनें है . एक ऐसा वर्ग जिसे आसानी से बरगलाया जा सकता है और जो सुनी सुनाई काल्पनिक बातों को ही यथार्थ समझता है उसके दिमाग में उस जहर का असर प्रभावकारी ढंग से हुआ और उसनें यह मान लिया कि बड़ी जातियों के लोग उनके दुश्मन हैं . जिस प्रकार आज के नेता इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर अपनी रोटी सेंक रहे हैं उससे हिन्दू जातियों के बीच खाई और चौड़ी होती जा रही है और उसमें हमारे देश के अधिकांश बुध्दिजीवी आग में घी डालनें का काम कर रहे हैं .
हम सभी लोग फ़िल्म देखते रहे हैं . क्या आप को याद है किसी ऐसे फ़िल्म की कहानी जिसमें किसी पठान या उच्च जाति के मुसलमान की बेटी का छोटी जाति के युवक से ईश्क, उस पठान की पराजय हो जाती हो तथा कोई मौलवी या पादरी को धूर्त, बेईमान या पाखंडी दिखाया गया हो . जिसमें उसकी लोग धुनाई करते हों ,
जी नहीं आप ऐसी कहानी पर फ़िल्म नहीं देख सकते . ऎसी फ़िल्म बनानें की कोई सोच ही नहीं सकता ना ही किसी माई के लाल में वह हिम्मत है .फिल्मों में अपमानित और बेईज्जत होनें के लिए केवल राजपूत और ब्राह्मण ही हो सकते हैं जो पिक्चर हॉल में बैठकर अपनें ऊपर किये गये उपहास पर भी ताली बजानें का हौसला रखते हैं , भले ही वह अज्ञानतावश हो या अत्यंत खुले दिमाग के कारण हो .



सोमवार, 7 मई 2018

बच्चों को राजनीति में भेजनें का सपना भी देखिये -



 बच्चों को राजनीति में भेजनें का सपना भी देखिये - 


                 देश में करोड़ों बच्चे हैं जो अपनें माता-पिता के सपनों को अपनें कंधों पर लादे रोज स्कूल जाते हैं . हर माता पिता की ख्वाहिश होती है कि उनका बेटा या बेटी पढ़ लिख कर बड़ा अधिकारी बनें या सम्मानजनक पद पर कार्य करे . शायद ही कोई ऐसे माता-पिता होंगे जो अपनें बेटों को एक सफल राजनेता के रूप में देखना चाहते हों, ऐसी स्थिति में किसी भी बच्चे का सपना नेता बननें का हो ही नहीं सकता . सब जानते हैं कि पढ़ लिख कर  उनका बेटा या बेटी कितने ही उच्च पद पर क्यों न आसीन हो जाये लेकिन उसे वह रुतबा व हैसियत नहीं मिल सकती जो एक सफल राजनेता को मिलती है . 
                यह  कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हम लोगों नें राजनीति को एक ऐसा उपेक्षित क्षेत्र मान लिया है जिसमें किसी सभ्य या पढ़े लिखे व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है . सोचिए जिस क्षेत्र में काम करनें वाले लोगों के ऊपर हमारे  देश का और हमारा भविष्य निर्भर करता है उसमें जानें के लिए हम जानबूझ कर ऐसे लोगों के लिए हम स्वयं रास्ता बनाते हैं जो समाज के बहिष्कृत और नकारा लोग कहे जाते हैं . 
                 एक बार इलाहाबाद में सभासद का चुनाव था , चुनाव में भद्र और सज्जन कहे जानें वाले एक प्रोफ़ेसर साहब भी चुनाव में खड़े हुए . चुनाव में जीतनें वाला उम्मीदवार कैसा था यह बतानें की जरूरत नहीं है लेकिन प्रोफ़ेसर साहब को उस चुनाव में इतनें कम वोट मिले कि उन्होंने कभी दुबारा चुनाव लड़नें की हिम्मत नहीं की .
               इसका कारण भी साफ है , प्रोफ़ेसर साहब यदि चुनाव जीत कर नगर महा पालिका में जाकर वहां के अधिकारियों व कर्मचारियों से सभ्यता से बात करते और जनता की समस्याओं को उठाते तो एक तो कोई उन्हें तवज्जो नहीं देता दूसरे नगर महा पालिका के लोगों को सभ्यता से बात सुननें की आदत भी नहीं है . 
                 बिहार में बाहुबली नेता सहाबुद्दीन और पूर्णिया के नेता पप्पू यादव नें अपने जिलों में सारे विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों को सुधार दिया था, यहाँ तक कि डॉक्टर लोग भी मनमानी फीस नहीं ले सकते थे , क्या किसी शरीफ व सज्जन नेता ऐसा कर सकता था , उत्तर एक है - नहीं , कभी नहीं . 
                   मेरी देश के तमाम माता-पिताओं से करबद्ध प्रार्थना है कि वे अपनें बच्चों को बेशक पढ़ायें , लेकिन उन्हें लुच्चई , लफंगई , गुंडई , आदि की शिक्षा भी अवश्य दें ताकि वह देश में एक सफल राजनेता के रूप में अपना कैरियर बनानें के बारे में सोचे . यदि आपका बेटा या बेटी एक सफल नेता बना गया तो फिर आपकी दस बीस पीढ़ी को किसी काम धाम की जरूरत नहीं रह जायेगी . सब कुछ हराम में मिलेगा . सोचिए यदि आपका बेटा पढ़ लिख कर कोई अधिकारी या बाबू बन गया और गलती से वह ईमानदार रह गया तो वह अपनें जीवन का नाश तो करेगा ही साथ ही साथ अपनीं पत्नी और बच्चों का जीवन भी बर्बाद कर देगा . 
                   नेता बनना आज के युग में सबसे कठिन काम भी है . जिस प्रकार किसी भी नौकरी में योग्यता जरूरी होती है और जो सबसे योग्य पाया जाता है उसे ही चुना जाता है. उसी प्रकार नेता बननें के लिए दूसरे प्रकार की योग्यता जरुरी होती है जिसे हम जैसे अज्ञानी लोग अयोग्यता की श्रेणी में रखते हैं . राजनीति में प्रतिस्पर्द्धा दूसरे तरह की है जैसे आप नें दस अपराध किये हों और खुद को योग्य समझ रहे हों लेकिन बारह या पन्द्रह संगीन अपराध करनें वाला आपसे ज्यादा योग्य माना जाता है .  किसी अपराधी को अपनें को लम्बे समय तक जिन्दा बचाए रखना बहुत मुश्किल होता है , इसके लिए उसे कभी-कभी राजनीतिक संरक्षण और पुलिस की मदद भी लेनी पड़ती है जो जोखिम भरा भी होता है . धीरे-धीरे वह अपराधी अपनें सम्पर्क सीमा का विस्तार करता जाता है और अपनी काबिलियत को निखरता जाता है यही वह काबिलियत और योग्यता होती है जिसके कारण संरक्षण देनें वाला नेता उसका चमचा और पुलिस वाला उसका बॉडी गार्ड  बन जाता है . 
                हमारे देश की जनता मिमियानें वाले व्यक्ति को नेता नहीं मान  सकती . नेता का मतलब होता है एक कड़कदार आवाज वाला रोबीला दबंग व्यक्तित्व जिसे देखते ही सरकारी अधिकारी व बाबू की पैंट गीली हो जाये, बिना दिमाग का होता हुए भी दूसरे को ज्ञान दे . छोटे मोटे गुंडे उसके यहाँ नौकरों की तरह काम करें और उसके एक ईशारे पर किसी कुत्ते की तरह सामनें वाले पर झपट पड़ें . 
                     जिस दिन हमारे देश के सारे सरकारी विभाग ईमानदारी से जनता की तकलीफों को दूर करनें लगेंगे और बिना किसी गुंडे टाईप नेता का लात- जूता खाए सही तरीके से अपना काम करेंगे तो निश्चित रूप से देश को उन नेताओं से मुक्ति मिलेगी जिनके कारण हमारे देश की संसद और विधान सभाओं का मजाक उड़ता है और उस उच्च आसन पर अपराधी और अनपढ़ लोग विराजमान होते जा रहे हैं .  

का सपना भी देखिये - ना भी देखिये - 

गुरुवार, 3 मई 2018

यात्रियों के बोझ से बैठ गई सम्पूर्ण क्रांति एक्सप्रेस



यात्रियों के बोझ से बैठ गई सम्पूर्ण क्रांति एक्सप्रेस

नई दिल्ली से पटना जानें वाली सम्पूर्ण क्रांति एक्सप्रेस रेल की जनरल बोगी में इतनें यात्री बैठ गये कि वह बोगी ही बैठ गई . आजादी के इतनें दिन बाद भी आम आदमी जो हवाई जहाज व रेल के ए.सी. बोगी में बैठ कर यात्रा नहीं कर सकता वह स्लीपर में या जनरल बोगी में बैठकर यात्रा करता है . जनरल बोगी में बैठे यात्रियों को देखकर लगता है यदि धरती पर कहीं नर्क है तो यहीं है . हमारे रेल विभाग नें मान लिया है कि आम गरीब आदमी इसी प्रकार नर्क की यातना भोगकर यात्रा करनें के लिए बना है . हमारे देश की जनरल बोगियों का हांल किसी बड़े त्यौहार में देखनें लायक होता है . ईद हो या होली , दशहरा हो या छठ उस समय वैसे तो पूरी ट्रेन को ठीक से देख पाना भी असंभव होता है चारों और केवल लटके हुए यात्री ही नजर आते हैं .
हमारे देश के नेता जिन लोगों के वोट पर मुफ्त में हवाई जहाज पर या ए.सी. में बैठकर यात्रा करनें और फाइव स्टार होटल में हराम का माल उड़ाते हैं उन्हें इन यात्रियों की कोई चिंता नहीं होती जो मेहनत मजदूरी करके पर्व त्यौहार पर अपनें घर गांव लौटते हैं .
सरकार यदि चाहे तो आम आदमी को और खास तौर पर जनरल बोगी में यात्रा करनें वालों को भी सुविधाजनक ढंग से यात्रा करनें की व्यवस्था कर सकती है लेकिन सरकार को उनसे क्या लेना देना , जिनकी किस्मत में नर्क की यातना भोगना लिखा है उनके लिए सरकार आखिर कुछ करे भी तो क्यों ?
हो सकता है आज तक देश के किसी नेता को शायद पर्व त्यौहारों पर जनरल बोगियों में यात्रा करने वाले अभागे यात्रियों को देखनें का अवसर ही नहीं मिला हो . यदि देखनें का मौका मिला भी होगा तो उन्हें उससे क्या लेना देना . देश में रोज कहीं न कहीं किसी न किसी मुद्दे पर बवाल होता है, बंदी की जाती है , सडकों पर उतर कर लोग आक्रोश व्यक्त करते हैं, लेकिन शायद ही कभी सुननें में आया हो कि रेलों में जनरल बोगियों में यात्रा करनें वाले यात्रियों की सुविधा के लिए भी किसी नें कोई चिंता की हो .
जनरल बोगियों में यात्रा करनें वालों के साथ और भी कई दिक्कते हैं . इनमें यात्रा करनें वाले यात्री साल भर कमाकर वापस अपनें घर आते हैं . जिस प्रकार जंगल में शिकारी जानवर हिरन या अन्य शाकाहारी जानवरों के शिकार में रहते हैं उसी प्रकार इन यात्रियों पर भी कई प्रकार के शिकारियों की निगाहें लगी होती हैं . यात्रा के क्रम में नशीला पदार्थ खिलाकर लूटनें वालों के अलावा किन्नर , पुलिस वाले और कभी सही ढंग से कर्तव्य का पालन न करनें वाले टी.टी. भी शिकार करनें में लगे रहते हैं .
रेल मंत्री जी से आग्रह है कि आप कृपया किसी पर्व या त्यौहार के अवसर पर किसी जनरल बोगी में आम जनता की तरह से सफर करके दिखाएँ और जिस नर्क की कल्पना हम बचपन से करते आ रहे हैं उसे स्वयं देखें और भोगें .

बहुत मस्त है


 बहुत मस्त है 


                  शर्मा जी आज बहुत दिन बाद काफी हाउस का मजा लेनें का मूड बनाकर आये थे . दोपहर का समय था अत: काफी पीनें वाले भी कम थे . ज्यादातर कुर्सियां खाली थीं . शर्मा जी नें कोनें की एक मेज चुनी और कुर्सी पर बैठकर बैरे का इंतजार करनें लगे . बैरा आया लेकिन बगल वाले मेज पर पहले से बैठे एक नवयुवक को काफी दिया और शर्मा जी की और देखे बगैर चला गया . शर्मा जी  उस युवक को लगातार देख रहे थे क्योंकि वह बैठे-बैठे लगातार अपनें मोबाईल फोन से चिपका हुआ था . उस नवयुवक के मोबाईल की घंटी बजी उसका रिंग टोन किसी आधुनिक  गानें का था . 
                     युवक अपनें किसी मित्र से बात कर रहा था . वह बोला - गजब भाई , बहुत मजेदार है , मजा आ गया . हाँ-हाँ क्यों नहीं , तुम भी रहना . हम कई लोग साथ-साथ मस्ती करते हैं , तुम भी मजा लेना . इसमें बुरा क्या है . 
                     शर्मा जी नें अपना  कान  ऊधर ही लगा रखा था , तभी बैरा आकर बोला - साब , हॉट या कोल्ड ? शर्मा जी चौंक कर बोले - एकदम हॉट . बैरे  नें ट्रे में रखी एक काफी का कप उनके सामनें रख दिया . इस दौरान वे उस युवक की बात नहीं सुन सके जिससे वे मन ही मन बैरे पर नाराज भी हुए . 
                          उस युवक की बात आगे बढ़ चुकी थी , वह बोल रहा था - हाँ यार , उसे भी ले लेना आज की रात हम सब मस्ती करेंगे . लेकिन देख कर लेना दूसरी वाली न हो, साली सर पर चढ़ जाती है . हाँ एक दो ले लेना  बाकी  सब मैं ले लूँगा . नहीं यार .  एक से काम चल जाएगा , अबे हम पांच लोग हैं , सबके लिए अलग-अलग थोड़ी चाहिए . दो से काम चल जाएगा . 
                       शर्मा जी को समझ में नहीं आ रहा था कि ये लौंडा किस चीज की बात कर रहा था . वे व्याकुल हो रहे थे . 
                    उस नवयुवक की पुन: आवाज आई , तू चिंता छोड़ न यार , जितना मस्ती करना है कर लो , साला आगे का क्या सोचना . राजेश को तुम कंट्रोल करना वह साला अकेले ही पूरा मजा मारना चाहता है . 
                     शर्मा जी परेशान थे , यह लड़का जरुर बिगड़ा हुआ है . ये अपनें दोस्तों के साथ जरुर किसी गंदे काम के बारे में बात कर रहे हैं . शर्मा जी एक बैक में क्लर्क थे . सोच  रहे थे यह लड़का अपना भविष्य खराब कर रहा है देखने में किसी सभ्य परिवार का लगता है . शर्मा जी अपनी काफी खत्म करनें वाले थे और वह नवयुवक अभी तक केवल एक या दो घूंट काफी ही पी पाया था . शर्मा जी नें सोचा कि इस युवक को समझाते हैं कि वह अपना भविष्य न खराब करे . एक बिन बुलाये गार्जियन की तरह से वे उस नवयुवक से बोले - बेटा, मुझे अपनें पिता की तरह से समझना , तुम किसी अच्छे परिवार से लगते हो , यदि तुम्हें बुरा न लगे तो एक बात पूछें .
नवयुवक बोला - हाँ अंकल बोलिए .
                         शर्मा जी बोले - बेटा , तुम मोबाईल से जो बात कर रहे थे उसे मैं सुन रहा था , मुझे ऐसा लगता है तुम किसी गलत रास्ते पर चल रहे हो , ये दोस्ती यारी सब कोई काम नहीं आनें वाली , दुनिया केवल मतलब की यार है . मुझे ऐसा लगता है तुम्हें किसी नें सही राय नहीं दी है , तुम कम से कम ग्रेजुएट तो जरुर लगते हो , 
                    नवयुवक बोला - जी मैनें एम. टेक . किया है और आप के आशीर्वाद से मैनें टॉप भी किया था . शर्मा जी चौकें - तुम एम.टेक . के टॉपर हो , माफ करना , फिर तुम कोई जॉब  नहीं करते क्या ?
               वह नवयुवक जोर से हंसा और बोला - आजकल जॉब मिलना बहुत कठिन है लेकिन आप के आशीर्वाद से मुझे एक अच्छा जॉब मिल गया है .
                   शर्मा जी को  जोर का झटका लगा , वे संयत होते हुए बोले - प्राईवेट या सरकारी ?
                  नवयुवक बोला - जी अर्द्ध सरकारी समझिये .  मैं आज ही इस जिले में आया हूँ यहाँ हमारे पुराने मित्र हैं  जो आज मुझसे मिलेंगे . मुझे कल ही  अपना नया ऑफिस भी ज्वाइन करना है . 
                  शर्मा जी नें अपनें जीवन में जो अनुभव बटोरा था वह सारा अनुभव आज उस नवयुवक के सामनें फेल हो रहा था .  वे हिम्मत करके बोले - बेटा, जब इतना बता दिया तो ये भी बता दो कि किस जगह  तुम्हे ज्वाइन  करना है . 
                   वह नवयुवक जान गया था कि ये महाशय समाज सुधारक टाईप के हैं . उसनें सहजता से उस कार्य स्थल के बारे में बताया जहाँ उसे कल ज्वाइन करना था . शर्मा जी के माथे पर पसीना आ गया . ये तो उनके ही बैक में ज्वाइन करनें की बात कर रहा है . 
                 शर्मा जी मन ही मन  सोचनें लगे - कहाँ मैं इसके चक्कर में पड़ गया . कल तो हमारे बैंक में नये चीफ मैनेंजर को ज्वाइन करना था . यह नवयुवक तो कहीं से वैसा नहीं लगता , चीफ मैनेजर लोग तो एकदम खूसट किस्म के होते हैं . शर्मा जी मन ही मन पछता रहे थे कि यदि यही नवयुवक  चीफ मेनेजर हुआ तो ---- . तभी वह नवयुवक शर्मा जी के पास आकर बोला - अंकल बहुत खुशी हुई आपसे मिलकर , अब मैं चलता हूँ . शर्मा जी नें उसके सामनें दोनो हाथ जोड़ कर कहा - ठीक है सर . नवयुवक शर्मा जी के आखिरी तीन शब्द नहीं सुन सका और चला गया . 

 रिकवरी आफ इंडिया   बनाम   डिस्कवरी आफ इंडिया   संसार के अधिकांश इतिहासकारों नें अपनें देश का इतिहास लिखते समय इस बात का ध्यान र...