दहेज और हमारी ओछी मानसिकता
नीतीश जी दहेज-मुक्त बिहार की बात करते हैं , सही है लेकिन यह तभी संभव है जब हम खुद इसके लिये आगे आयें -इस सन्दर्भ में एक सच्ची घटना का जिक्र करना चाहता हूँ --यह कहानी उस सख्श की है जो दहेज-प्रथा का प्रबल विरोधी था । वह बिहार में एक बड़ा अधिकारी बना । उसनें बिना दहेज की शादी करनें का प्रण लिया था । उसनें वैसे तमाम वैवाहिक प्रस्तावों को ठुकराया जो उसे अच्छी खासी रकम दहेज में दे रहे थे । उसनें एक अत्यंत साधारण परिवार की लड़की से विवाह फाईनल कर तारीख आदि तय कर दी ।
शादी तो तय हो गयी अब लोगों की कानाफूसी शुरु होनें लगी । केवल उसके घर वाले जानते थे कि वह सही कर रहा है । रिश्तेदार नातेदार और करीबी लोग अनुमान लगाते थे कि वह निश्चित रुप से प्रेम विवाह कर रहा है अन्यथा आज के युग में मिलती रकम कौन छोड़ता है ।
उधर कन्या पक्ष के जलनशील रिश्तेदारों का दावे के साथ कहना था कि लड़के में जरुर कोई ऐब होगा अन्यथा इतना बड़ा अफसर बिना दहेज की शादी क्यों करेगा । लोगों नें तो यह भी दावा करना शुरु कर दिया कि लड़का पहले से ही शादीशुदा है और अधिकारी बननें के बाद वह दूसरी शादी कर रहा है ।
बहरहाल शादी भी हो गई । बिना दहेज की शादी लोगों के लिये कौतूहल का विषय बन गई । हद तो तब हो गई जब उसकी पहली पुत्री को कुछ तथाकथित करीबी लोगों नें दावे के साथ यह बताना शुरु कर दिया कि ये तो उसकी पहली पत्नी की बेटी है ।
इसके अलावा भी बहुत सी ऐसी बातें लोगों नें कहीं जो बहुत ही विचित्र थीं लेकिन दोनों पति पत्नी शादी के बाद से लोगों की मानसिकता का उपहास उड़ाते हुए मजे से खुशहाल जिन्दगी गुजारते हैं ।
इस कहानी के जिक्र करनें का मकसद मात्र इतना है कि आज के युग में हम जब कोई अच्छा काम करना चाहें तो उसमें भी लोगों को शक होता है क्योंकि लोगों को यह उम्मीद या आशा ही नहीं होती कि कोई नेक काम भी कर सकता है । बहुत ही गन्दी व ओछी है हमारी मानसिकता ।
मैं तमाम वैसे लोगों से अनुरोध करुँगा कि हमारा समाज बदलाव के खिलाफ बोलता तो है लेकिन बदलाव को अपनें फायदे के लिये हो अपनाना चाहता है, अतः अच्छे पद पर पहुँच कर दहेज नहीं लेनें पर उलाहना, उपेक्षा व व्यंगबाणों को झेलनें से बेहतर है, भाई लोग, आप वही करो जो समाज चाहता है ।
मेरे इस पोस्ट से जिन लोगों को तकलीफ या ठेस पहुँची हो उनकी आत्मा को भगवान शान्ति दे ।