सोमवार, 9 जनवरी 2017

कुत्ते का पिल्ला


                                                               कुत्ते का पिल्ला 

         शरीर त्याग कर वह जीव मानव योनि त्याग कर चेतन रुप में परमात्मा के समक्ष प्रस्तुत किया गया । वह चेतन रुप में परमात्मा के सामनें खड़ा था । परमात्मा नें चेतन रुप को पुनः किसी योनि में प्रविष्ट करनें का निर्देश दिया । वह चेतन रुप इस बार भी मानव योनि में उत्पन्न होनें की सोच रहा था । अचानक उसे एहसास हो गया कि परमात्मा अब उसे पुनः मानव योनि प्रदान करनें के मूड में नहीं हैं । वह गिड़गिड़ाया - प्रभू मैं धरती पर पुनः जाना नहीं चाहता । परमात्मा मुस्कराकर बोले - मुझे मालूम है तुम ऐसा क्यों कह रहे हो । मैं तुम्हे दंडित नहीं कर रहा बल्कि तुम्हे उसी योनि में विचरण करनें का अवसर देना चाहता हूँ जिसके तुम अधिकारी हो । 
      जीव घबराया । प्रभू मैं किस योनि का अधिकारी हूँ । परमात्मा पुनः मुस्कराकर बोले - तुम अपनें पूर्व योनि की बातों को भूले तो नहीं होगे । यदि भूल रहे हो तो बोलो, मैं तुम्हारे सामनें तुम्हारे भूत काल को प्रकट कर दूँ । जीव जनता था कि परमात्मा से कोई बात छिपायी नहीं जा सकती । अतः वह परमात्मा के सामनें तर्क नहीं कर सकता था । उसे यह भी मालूम था कि उसनेंं जो कुकर्म किये हैं उसके लिये उसे किसी बहुत बुरे जानवर या पंछी की योनि ही परमात्मा उसे प्रदान करेंगे ।
     उसनें अपनी तरफ से सफाई देते हुए कहा - प्रभू , मुझे मालूम है कि मैंनें मानव योनि में रहकर बहुत बुरे-बुरे कार्य किये हैं । प्रभू , मैं मानता हूँ कि मैनें मानव योनि में रहकर बहुत से पाप किये हैं लोगों को तकलीफें दी हैं । मेरे अन्दर की चेतना सुप्त हो गई थी । लेकिन प्रभू इसके पीछे एक कारण भी था । मैं मानव योनि में रहते हुए एक सरकारी सेवक बना था । मैं इस दौरान कई लोगों के अधीन सेवारत था और मानव योनि में रहते हुए हे प्रभू, एक अधीनस्थ मानव को विवेक व चेतना को परे रखकर वही कार्य करना पड़ता है जो उसके स्वामी या बॉस को अच्छा लगता हो । प्रभू आप तो जानते हैं कि मैं जिन-जिन मानवों के अधीन था उनमें कई मूर्ख, चापलूसी पसंद, हरामखोर किस्म के दम्भी लोग थे । प्रभू , ज्यादातर स्वामियों को एक चमचा या चाटुकार मानव की जरुरत होती है और मैंनें स्वयं को एक योग्य चाटुकार बनानें में ही अपना सारा समय लगाया ।
जीव पुनः बोला- प्रभू मैं अपनी सेवा काल के दौरान जिन मानवों के अधीन था, वे तो मुझसे काफी पहले ही मानव योनि को त्याग चुके थे । वह भी तो आपके सम्मुख लाये गये होगं । प्रभू मुझे अवगत करायें कि उन्हें किन-किन योनियों में आपनें धरती पर भेजा है या भेजनें जा रहे हैं । प्रभू मुस्कराये- तुम्हारे अधिकांश पूर्व स्वामी जो अधम व दुष्कर्मी थे वे अभी धरती पर ही मानव योनि में अपने कर्मों का फल भुगत रहे हैं । उनमें से कुछ को धरती पर नयी योनियों में भेजा जा चुका है । वे सब किन-किन योनियों में हैं तुम्हे इसकी जानकारी नहीं दी जा सकती । हाँ इतना अवश्य है कि तुम्हारे मानव योनि में रह चुका तुम्हारा एक स्वामी पुनः तुम्हरी नई योनि में तुम्हारे आस-पास ही रहेगा और तुम्हें लगभग वैसे ही काम करनें पड़ेंगे जैसे तुमनें उसके साथ मानव योनि में रहते हुए किये थे । 
जीव घबराकर बोला- प्रभू आपसे कुछ छिपा तो नहीं रह सकता पिर भी मैं अपनें अपराध को स्वीकार करते हुए कहना चाहता हूँ कि मैनें मानव योनि में रहकर अधिकतर केवल किसी कुत्ते के समान ही व्यवहार किया है । मैं दिन भर अपनें स्वामी के आगे-पीछे रहना चहता था ताकि मेरा प्रभुत्व बना रहे । मैनें अपनें स्वामी से झूठी शिकायत करके बहुत से लोगों को क्षति पहुँचाई है । लोग मुझे गालियां देते थे लेकिन मेरा स्वामी मेरे ऊपर आँख मूंदकर विश्वास करता था । लेकिन प्रभू , कुत्ते जैसा आचरण करते हुए भी मैं एक कुत्ते की तरह अपनें स्वामी का कभी वफादार नहीं रहा । मैं उसकी आड़ में केवल अपनी स्वार्थ-पूर्ति में  लगा रहता था । इसलिये, मैं प्रभू कुत्ते की योनि प्राप्त करनें लायक भी नहीं हूँ ।
परमात्मा मुस्कराकर बोले - हे जीव तुम जितनी चतुराई दिखा रहे हो उससे साफ है कि तुम्हारे अन्दर से मानव योनि के दौरान आई गन्दगी अभी तक बाकी है । तुम छल-कपट और प्रपंच में इस चेतन रुप में भी माहिर हो । सोचो जब तुम शरीर मानव योनि में रहे होगे तो तुमनें अन्य साधारण मानवों को कितना दुख दिया होगा । तुम अपनी चतुराई के द्वारा मुझसे यह जाननें का प्रयास कर रहे हो कि तुम्हें किस योनि में भेजा जा सकता है । प्रभू मुस्करा कर बोले - जाओ अब तुम्हारा समय हो गया है ।
जाड़े के मौसम में एक कुतिया नें खुले आकाश में पिल्लों को जन्म दिया । पिल्ले ठंड में ठिठुरते हुए किसी प्रकार चलनें-फिरनें लायक हुए । उन पिल्लों में से एक काले रंग के पिल्ले को सड़क के किनारे रहनें वाले एक भिखारी का बेटा उठाकर अपनें साथ ले गया । वह कुत्ते का पिल्ला भिखारी परिवार का सदस्य बनकर उनकी झोपड़ी के बाहर रहते हुए बड़ा होनें लगा । ना तो उस भिखारी को ना ही उस कुत्ते के पिल्ले को अपनीं पूर्व योनि का ज्ञान था । सब प्रभू की माया है ।

शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

पुनर्ठेलुआ भव


                                                          पुनर्ठेलुआ भव

      ठेलुआ उसका असली नाम नहीं था बल्कि लोगों द्वारा दी गई उपाधि थी । ठेलुआ लोगों की निगाह में आलसी व अनुपयोगी युवा था । घूरे के दिन फिरते हैं । ठेलुआ के जीवन में भी अचानक परिवर्तन हुआ । मोदी जी नें 8 नवम्बर को 8.00 बजे रात में नोट-बन्दी का एलान कर दिया । ठेलुआ नें टी.वी. पर न्यूज सुना । उसमें नई उर्जा का संचार हुआ । ठेलुआ के जिम्मे एक ऐसा काम आया जिसनें उसे एक अत्यन्त उपयोगी व्यक्ति बना दिया । ठेलुआ को उसके घर वालों व अगल-बगल के लोगों नें नोट बदलनें की जिम्मदेारी सौंपी । ठेलुआ को आज अपनी वास्तविक योग्यता का अहसास हुआ । ठेलुआ 9 नवम्बर 2016 से अपनें कर्तव्य को पूरी लगन व निष्ठा के साथ निभानें के लिये सुबह से शाम तक बैंक के आगे लाईन में खड़ा रहनें का काम करनें लगा । ठेलुआ अत्यन्त व्यवहार कुशल था । कोई वृद्ध, महिला या बीमार लाईन में नहीं लग पाता या पीछे रहता तो ठेलुआ उसे अपनी जगह खड़ा कर देता और खुद सबसे पीछे लाईन में जाकर खड़ा हो जाता । शाम को वह थका हारा खाली हाथ घर वापस आता और लोगों को बताता कि जब तक उसका नम्बर आता बैंक में नोट ही खत्म हो जाता है ।
ठेलुआ के दिन मजे से गुजर रहे थे । वह अपनें घर वालों के अलावा अपने पड़ोसियों का भी चहेता बन गया था । अब लोग उसे उसके वास्तविक नाम से ही बुलानें लगे थे । एक दिन तो वह बैंक के काऊंटर के पास पहुँच कर रुपया बदलनें ही वाला था कि एक बुजुर्ग बेहोश होकर गिर गये । ठेलुआ काऊन्टर छोड़कर तुरन्त बुजुर्ग के पास गया और उनके परिजनों को सांत्वना देनें लगा । उस दिन भी वह पुनः खाली हाथ घर वापस आया । ठेलुआ की यह संवेदनशीलता वाली क्रिया रोज चलती । ठेलुआ पत्रकारों और टी.वी. वालों के आनें पर अपनी कतार को छोड़कर उनके पास जाकर खड़ा हो जाता और रुपया न बदल पानें की शिकायत करता ।
दिसम्बर माह आते-आते ठेलुआ का उत्साह कम होनें लगा क्योंकि अब लाईनें कम होनें लगीं थीं । उस दिन ठेलुआ हमेशा की तरह कतार में सबसे पीछे खड़ा था । तभी कुछ पुलिस वाले आकर ठेलुआ को पकड़ लिये और रोज-रोज लाईन में खड़े होनें के बारे में पूछ-ताछ करनें लगे । ठेलुआ नें बताया कि उसे भीड़ के कारण आज तक एक भी नोट बदलनें का मौका नहीं मिला है । पुलिस वाले ठेलुआ को लेकर बैंक मैनेजर के पास गये और ठेलुआ के पास रखे 4 हजार रुपये के पुरानें नोट के बदले दो हजार के दो गुलाबी नोट दिलवाये । ठेलुआ को पुलिस की यह हरकत अच्छी नहीं लगी, क्योंकि उसनें अपनें पराक्रम से वे नोट हासिल नहीं किये थे । ठेलुआ उदास मन से घर वापस आया । ज्यों-ज्यों बैंक के सामनें कतारें कम होती जाती ठेलुआ का मन उसी मात्रा में दुखी हो जाता । 30 दिसम्बर 2016 के बाद ठेलुआ "पुनर्ठेलुआ भव" रह गया ।
ठेलुआ अब फिर से एक अनुपयोगी प्राणी रह गया है । काश, नोटबन्दी का एलान एक बार और होता तो ठेलुआ और उसके जैसे बहुत से लोगों को अपनी उपयोगिता साबित करनें का मौका मिलता ।

 रिकवरी आफ इंडिया   बनाम   डिस्कवरी आफ इंडिया   संसार के अधिकांश इतिहासकारों नें अपनें देश का इतिहास लिखते समय इस बात का ध्यान र...