मंगलवार, 11 सितंबर 2012

ईमानदार पार्टी क्यों असफल रहेगी - चुनाव एक खोज ।



         
                    आपनें धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नामक मित्रों की पुरानी संस्कृत कथा सुनी होगी या पढ़ी होगी । वे दोनों आपस में अच्छे मित्र थे , मित्रता के कारण का उल्लेख कथा में नहीं दिया है , लेकिन प्रायः पापी का पुण्यात्मा , दुष्ट का सज्जन , कुरुप का रुपवान , झूठे का सच्चा , मित्र देखनें को मिलता है । मेरा एक मित्र जो सामान्य रुप रंग का था , वह किशोरावस्था से लेकर विवाह होनें तक कुरुप और काले मित्रों के साथ ही रहना पसंद करता था , उसके घर वाले उसकी इस आदत पर हमेशा बिगड़ते थे लेकिन असली कारण तो हम मोहल्ले के दोस्त और वह जानता था , लेकिन बहुत उछल कूद के बाद बेचारे को वर्तमान भाभी जी मिली , जिनके साथ वह किसी आवेदन पत्र के साथ लगे , संलग्नक की भाँति ही लगता है । वैसे भी धन (प्लस) और ऋण ( माइनस) के संयोग के बिना कुछ भी संभव नहीं है । प्राचीन कथा के अनुसार , दोनों परदेश जाकर काम करनें लगे और धन कमाकर वापस घर लौटनें लगे । पापबुद्धि नें धर्मबुद्धि को सलाह दी कि धन को एक विशाल वृक्ष के नीचे छिपा दिया जाये । धर्मबुद्धि तैयार हो गया , और दोनों नें अपना सारा धन पेड़ के नीचे दबा दिया । कथा में आगे , पाप बुद्धि सारा धन स्वयं हड़प लेता है  बाद में उसको परास्त होना पड़ता है और धर्मबुद्धि की जीत होती है । 
                       हमारे आर्यावर्त देश में चुनाव का मौसम शुरू हुआ । कुछ दिन पहले जन जागरण का कार्यक्रम चलाकर जनता को समझा दिया गया कि , किसी भी बेईमान , भ्रष्टाचारी , घोटालेबाज को वोट नहीं देना है । हर पार्टी नें अपनें-अपनें योद्धाओं को मैदान में उतारा । मेरे क्षेत्र में मुख्य जंग जिन दो महारथियों के बीच थी वे दोनों  बेईमान और घोटालाबाज पार्टी के उम्मीदवार थे , वे दोनों ही  भ्रष्टाचार , घोटाला और लूट के खेल के श्रेष्ठतम् खिलाड़ी थे , कोई किसी से कम नहीं था , एक तरफ नागनाथ तो दूसरी तरफ साँप नाथ , एक तरफ अर्जुन तो एक तरफ कर्ण । जनता भी बकिया उम्मीदवारों की कोई चर्चा नहीं करती थी ।
                     तीसरे नम्बर पर चर्चा होती थी ईमानदार पार्टी के उम्मीदवार की । उसका नाम कम ही लोग जानते थे । १०-१२ लोगों के साथ वह भी पैदल अपनें प्रचार में निकलता था । कोई आडम्बर या दिखावा नहीं । हमारे मोहल्ले के खेदू , मुख्य चुनाव संचालक थे । साथ में नागेश्वर बाबू , पोस्टमास्टर साहब , जग्गी बाबू , संगम लाल , वर्मा जी भी शिफ्ट-वाईस  घरेलू काम निपटानें के बाद प्रचार में लग जाते थे । महिला मोर्चा की कमान गौरी बाबू की पत्नी के हाथ में थी , जबकि गौरी बाबू स्वयं , दोनों महारथियों में से एक के प्रचार में लगे रहते थे , और गौरी बाबू का बड़ा बेटा दूसरे महारथी के प्रचार में जी जान से जुटा था , ऐसा लोकतांत्रिक परिवार शायद ही देश में कहीं और होगा ।
                    एक दिन खेदू  मेरे पास आया , खेदू चुनाव प्रचार का मुखिया था , उसके चेहरे पर उदासी देखकर मैनें कारण पूछा । खेदू नें अनमनें भाव से बताया - कि जनता के बीच हमारा क्रेज तो है लेकिन , जनता कहती है कि  ईमानदार पार्टी के लोग आज के युग में फिट नहीं बैठते । जनता के बीच बैठी इस धारणा को तोड़ना पड़ेगा खेदू भाई , मैनें समझाया । खेदू बोला - बड़ा कठिन है , लल्लन भाई , जनता को बेईमान और घोटालेबाजों के बीच रहनें की आदत पड़ गयी है । शुरु-शुरु में तो जनता अन्य पार्टी वालों को  गाली दे रही थी , लेकिन अब जनता सभी को समान रुप से देख रही है । समान रुप से देखनें में क्या बुराई है , मैनें पूछा ।
                   खेदू नें समझाना शुरु किया । देखो लल्लन भाई समस्या बड़ी ही गम्भीर है । हमारे उम्मीदवार के पास लोग अपनी-अपनी समस्या लेकर आते हैं जिनमें कुछ व्यक्तिगत और कुछ सामूहिक होती हैं । समस्या का निदान कैसे हो इस पर हम लोग विचार करते हैं फिर किसी आफिस में या अधिकारी के यहाँ जाते हैं तो वहाँ हमारे उम्मीदवार को कोई महत्व ही नहीं देता , जब किसी अधिकारी या कर्माचारी को पता चलता है कि हम ईमानदार पार्टी के लोग हैं तो  वे मुस्कराकर समस्या सुनते हैं और फिर उस कार्य से सम्बन्धित प्रक्रिया के बारे में  बताया जाता है और उसके अनुसार ही काम होनें के बारे में बताया जाता है , हमारा उम्मीदवार नियम और कानून के पालन की सलाह देता है , जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारे ईमानदार पार्टी का उम्मीदवार किसी का भी कोई कार्य नहीं करा सका । वही दूसरी ओर , बेईमान और घोटाला पार्टी के उम्मीदवारों का अदना से चेला भी , उसी आफिस में जाकर वैसा ही कार्य , कुछ ही मिनट में कराकर ले आता है । जनता कहती है , हमारा काम जो करवायेगा हम उसी को वोट देंगे ।
                     तुम लोग उस कार्यालय या अधिकारी के पास नहीं गये , अपना विरोध करनें , खेदू भाई ? खेदू बोला- विरोध तो किये लेकिन शान्ति के साथ , हम लोग और हमारा उम्मीदवार नियम और कानून का पालन करनें के प्रति वचनबद्ध हैं ।
                      खेदू तुम्हें बुरा लगे या भला , एक बात कहे देते हैं - तुम्हारा उम्मीदवार और तुम्हारी पार्टी के प्रति लोगों की पूरी सहानुभूति हो सकती है , लेकिन जब वोट देना होगा तो जनता उसी उम्मीदवार को वोट देगी  जिसका पूरा जीवन ही अपराध के सुन्दर कृत्य से सदैव आलोकित रहा हो और जो दबंगई के साथ अपना और अपनें चमचों का कार्य करवानें में माहिर होता है और कानून जिसके सामनें बेबस हो जाता है । कोई लाख घोटाला करे , देश को बेचे , आतंकवादियों को पनाह दे , जनता को इन सबसे कोई सरोकार नहीं है ।
                     तो क्या करें लल्लन भाई - खेदू नें पूछा  ।
                   मेरी मानो खेदू भाई , उन्हें राय दो कि वे अपना नाम वापस ले लें और इस राजनीति के क्षेत्र को उन्हीं  लोगो के पास रहनें दो जिनके शरीर पर बड़े-बड़े , काले-काले चकत्ते हो गये हैं ।
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