शनिवार, 15 सितंबर 2012

देश वासियों की सहन शक्ति को नमन -- ।

    

        
         केन्द्र में किसकी सरकार है पता करना मुश्किल है , मनमोहन जी तो कतई सरकार नहीं चला रहे हैं । बीजेपी वालों का विरोध भी केवल राजनीतिक लाभ उठानें के लिये ही प्रतीत होता है , जनता का दर्द समझनें वाला कोई नेता देश में नजर नहीं आ रहा है । अन्ना जी के साथ जनता इसलिये जुड़ी कि शायद देश में कोई बड़ा परिवर्तन हो लेकिन उनके जन आन्दोलन का अन्त जिस प्रकार से हुआ , उसके बाद देश में एक अजीब सा निराशावाद का दौर शुरु हो गया है , जनता बेबस है , और मुलायम सिंह उसी में प्रधानमंत्री बननें का ख्वाब देख रहे हैं ।
          मँहगाई बढ़नें से उन देश के तमाम हरामखोरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़नें वाला है जिनको अपनीं जेब से पैसा खर्च करके दुकान से जाकर सामान नहीं खरीदना पड़ता है । किसी भी हराम-खोर का पाँच सितारा होटल में रहना और खाना बन्द नहीं होगा , मुफ्त में हवाई जहाज से विदेश का दौरा लगाना बन्द नहीं होगा , केवल जनता त्राहि-त्राहि कुछ दिन चिल्लायेगी फिर सब कुछ शान्त हो जायेगा ।
          पिछले कुछ माह से केन्द्र में बैठी सरकार नें कई बार पेट्रोल आदि के दाम बढ़ाये ,  कुछ नेताओं नें उसका  विरोध एक राजनीतिक- रस्म के तर्ज पर किया , सरकार जानती है कि जनता की तरफ से जो लोग बोलनें वाले हैं उनमें भी तमाम छेद हैं और वे केवल रस्म-अदायगी के तौर पर केवल विरोध का अभिनय ही करेंगे । अभी डीजल , केरोसीन , रसोई-गैस आदि के दाम बढ़ाये गये , कोयले की कालिख से रंगी हुई , महा-घोटालों का ना टूटनें वाला रिकार्ड बनानें को तैयार सरकार नें देश में विदेशी बाजार खोलनें का फरमान जारी कर दिया । ये सारे घटनाक्रम इतनी तेजी से हुए कि जनता को सम्भलनें का अवसर ही नहीं मिल सका । जनता किन चीजों का विरोध करे , जनता को खुद भी समझ में नहीं आता ।  जनता की आवाज कैसे कोई सुनेगा जब देश का प्रधान-मंत्री ही कहता हो कि लड़ते-लड़ते जायेंगे , ये देश के दुर्भाग्य की पराकाष्ठा है ।
           प्रमुख विपक्षी दल को कुछ आशंका के साथ आशा है कि जनता चुनाव में सरकार के खिलाफ वोट देगी , यदि पूर्ण सुनिश्चित हो जाये कि जनता उसे अगले चुनाव में वोट देगी तब वह जनता की आवाज बनेंगे , ममता बनर्जी की औकात भी जनता और सरकार समझ चुकी है । देश की लगभग सारी पार्टियाँ पहले राजनीतिक लाभ की बात सोचती हैं फिर जनता और देश के बारे में सोचती हैं । देश की जनता की सहन-शक्ति को सहज ही नमन करनें को मन करता है । आखिर क्यों ना हो -
                           " पहनी थी जो बेड़ियाँ सदियों पहले ,कभी हमनें 
                             शामिल कर लिया है आज उन्हें गहनों में हमनें । "
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