सोमवार, 17 सितंबर 2012

जनता मरनें के लिये , नेता हँसनें के लिये -- ।



           देश में इस समय तमाम विचित्र किस्म के लोगों को देश के महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया गया है , जिनमें प्रधानममंत्री जी , रिमोट सिस्टम से चलते हैं , रक्षामंत्री बैटरी से चलते हैं , वित्त मंत्री साहब धक्का देनें पर चलते हैं और गृह मंत्री चाभी वाले खिलौनें के माफिक चलते हैं । चूँकि इनमें से कोई भी खिलौना स्वयं चलनें की हैसियत नहीं  रखता है , इसलिये इन खिलौनों  द्वारा किये गये किसी भी हरकत पर ऊँगली उठानें से पहले सोचना चाहिये कि , क्या आपके बुरा भला कहनें , गाली देनें , उसके हटानें की माँग कर देंनें से सब ठीक हो जायेगा , कतई नहीं ।  कुछ  समय से इन खिलौनों नें स्वतः एक चीज करना सीख लिया है , जब कोई मसला आता है तो ईशारा कर देते हैं कि जिसके हाथ में हमारी डोर है , उससे पूछकर ही तो अभिनय किया था , क्या कोई गलत हरकत हो गई ?
            ऐसे ही देश की एक महान् पार्टी के नाट्य-शाला के कलाकार हैं श्री शिन्दे जी , जिनके सत्य वचन से देश की जनता को उनका ऋणी होना चाहिये , क्योंकि उन्होनें देश की जनता पर हास्य-रस से भरा कटाक्ष करते हुए कहा कि - जनता जैसे बोफोर्स घोटाले को भूल गई , वैसे ही कोयला घोटाला को भी भूल जायेगी । 
             हम शिन्दे साहब की बात को गलत नहीं ठहराते हैं , लेकिन उनकी बात से जाहिर हो गया कि हाई कमान के यहाँ उनकी अच्छी ट्रेनिंग नहीं हुई है । कमाल तो तब हो गया जब , शिन्दे जी के बयान पर , कूड़े के ढेर में पड़े श्री दिग्विजय सिंह जी नें उनके बचाव में कुछ कहा , यद्यपि उसे किसी नें तवज्जो हीं नहीं दी , क्योंकि यदि देखा जाये तो सारे खिलौनों में सबसे बुरी हालत इसी बेचारे की है । 
             देश में इस समय , भ्रष्टाचार और घोटाले का बाजार  जिस प्रकार चल रहा है , उससे ऐसा लगता है कि सरकार जल्द ही उसे वैध घोषित करेगी और जो कोई उसमें लिप्त नहीं रहेगा या सहयोग नहीं करेगा उसे कठोर दण्ड दिया जायेगा । 
            और फिर कहीं दूर शिन्दे जी और दिग्गी राजा ठहाका लगाकर ,कह रहे होंगे - हँसना स्वास्थय के लिये सर्वोत्तम टानिक है और जनता पर हँसना सबसे सरल है , क्योंकि वह भूलनें की बीमारी से ग्रस्त है । 
             सच या झूठ मुझे नहीं पता लेकिन बुजुर्गों के मुँह से सुना है , देश के कुछ नवाबों की बेगमों का एक खास शौक हुआ करता था - अपनें महल की खिड़की से प्रतिदिन नदी में डूब कर मरते हुए लोगों को देखना , और प्रसन्न होना । 
                                 जिन्दगी का मकसद तो , पहले भी ना था , 
                                 चलो , गरीब काम तो आया तुझे हँसानें में  ।
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