भक्तों ,
सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र नें सतयुग में त्याग किया ।
भगवान राम नें त्रेता युग में पिता के वचन की रक्षा में त्याग किया और वन में गये ।
द्वापर युग में कोई त्यागी नहीं हुआ । लेकिन , दानवीर कर्ण और महान प्रतिज्ञाकारी भीष्म इस युग की देंन रहे ।
स्वामी जी, कलियुग में कोई दानी या त्यागी हुआ कि नहीं ।
अभी , कलियुग का अन्त नहीं आया है , रेकॉर्ड में नाम तो कई हैं , युग के अन्त में सर्वश्रेष्ठ घोषित होगा ।
स्वामी जी , हमारी जिज्ञासा है कि अभी जिनका रेकॉर्ड सबसे ऊँचा है , उनके बारे में बताया जाये ।
बेटा , तुम्हारी जिज्ञासा हम यदि अभी शान्त कर देंगे तो , फिर तुम कई प्रश्न और पूछोगे ।
स्वामी जी , आप विस्तार से कलियुग के उस महान् त्याग की गाथा हमें सुनायें , ताकि हम भक्त कृत्य-कृत्य हो सकें ।
भक्तों ,
जोर दार ताली बजाईये , वह गाथा , जिसका आप को इंतजार था मैं सुनानें जा रहा हूँ ।
जय हो --- जय हो ----- जय हो ----- ।
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सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र नें सतयुग में त्याग किया ।
भगवान राम नें त्रेता युग में पिता के वचन की रक्षा में त्याग किया और वन में गये ।
द्वापर युग में कोई त्यागी नहीं हुआ । लेकिन , दानवीर कर्ण और महान प्रतिज्ञाकारी भीष्म इस युग की देंन रहे ।
स्वामी जी, कलियुग में कोई दानी या त्यागी हुआ कि नहीं ।
अभी , कलियुग का अन्त नहीं आया है , रेकॉर्ड में नाम तो कई हैं , युग के अन्त में सर्वश्रेष्ठ घोषित होगा ।
स्वामी जी , हमारी जिज्ञासा है कि अभी जिनका रेकॉर्ड सबसे ऊँचा है , उनके बारे में बताया जाये ।
बेटा , तुम्हारी जिज्ञासा हम यदि अभी शान्त कर देंगे तो , फिर तुम कई प्रश्न और पूछोगे ।
स्वामी जी , आप विस्तार से कलियुग के उस महान् त्याग की गाथा हमें सुनायें , ताकि हम भक्त कृत्य-कृत्य हो सकें ।
प्रिय भक्त जन , मैं कथा प्रारम्भ करता हूँ , यदि कोई प्रसंग ना समझ में आये तो भी बीच में कुछ बोलना नहीं है ।
अब अपनीं श्वासें रोककर सुनिये और अपनें देश की प्राचीन गौरवमयी संस्कृति को समझिये ।भक्तों ,
कलियुग का प्रारम्भ ही , छल ,कपट, धोखेबाजी , प्रपंच , के चरम पर पहुँचनें पर हुआ था । यूँ कह सकते हैं कि कलियुग नें अपनीं आँखें ही , छल ,कपट , कमीना गिरि , जाल फरेब ,धूर्तई ,धोखेबाजीके वातावरण में खोली थी । चूँकि कलियुग का जन्म भारत देश में ही हुआ अतः सर्वाधिक प्रभावित भी यही देश रहा । वसुधैव कुटुम्बकम् के सिद्धान्त के अनुयायी भारत वासियों नें खुले दिल से अतिथि देवो भवः की भावना के साथ , जो भी भारत भूमि पर आया सबका स्वागत् किया और , ऐसी स्थिति बना दी कि , उन बाहरी अतिथियों को अपना घर , परिवार ,और जो कुछ भी संभव था , वह उन्हें प्रदान किया और अन्ततः देश भी सौंप दिया जिसका विकृत रुप भारत वासियों के सामनें है । एक समय ऐसा आया जब भारत वासियों को अपनें देश के शासकों से ज्यादा प्रिय बाहरी शासक लगनें लगे और उनकी सत्ता कायम करवानें में भारत वासियों नें बढ़-चढ़ कर सहयोग किया, इसके लिये भले ही अपनें भाई का गला ही क्यों ना काटना पड़े । वे शान से रहें इसके लिये उनके रहनें के लिये महल बनवाये , किले बनवाये और बाद में अपनें हाथ को कटवा कर भी नत मस्तक रहे । परिणाम स्वरुप भारत वासियों के रग-रग में समा गया , कि कोई बाहरी या बाहरी जैसा दिखनें वाला ही उनके ऊपर शासन करनें योग्य है । समय बदला भारत वालों नें अपनें स्वामी को बदलनें का विचार किया क्योंकि बाहर से आये शासक ७-८ सौ सालों तक रहनें के बाद देश वासियों जैसे लगनें लगे और बाहरी शासक की चाहत और मनोवृत्ति वाले भारत वासियों नें शुद्ध गोरी चमड़ी वालों को जी जान लगाकर अपना नया स्वामी और शासक बना दिया और कई सौ बरस तक उनकी सेवा में जी जान से जुटे रहे । भारत वासियों को उस समय जबरदस्त झटका लगनें से बचा जब गोरी चमड़ी वाले जिन्हें अँग्रेज कहा गया देश को छोड़कर जानें लगे , लेकिन भगवान , नें भारत वासियों की सुन ली और एक बिल्कुल अँग्रेजों की तरह के सोच वाले व्यक्ति को देश का भाग्य विधाता बनाया गया । देश वासियों नें काफी खुशी का इजहार किया । इस प्रकार यद्यपि गोरी चमड़ी वाले चले गये किन्तु उनके शासन के सारे तत्वों को , नियम कानून को , संक्षेप में कहा जाय तो सारी चीजों को ज्यों का त्यों रहनें दिया गया ताकि भारतीयों को एहसास होता रहे कि देश पर अभी भी अग्रजों की हुकुमत है । इस विषय पर विस्तार से गाथा बतानें में कई महीनें लग जायेंगे इसलिये , सारी कथा का बड़ा भाग, सार रुप में कह दिया ।
भक्तों ,
भारत वासियों के मन में , सदैव यह इच्छा बनी रही कि , देशी टाईप का कोई आदमी देश पर शासन ना करनें पाये किन्तु होनी को कौन टाल सकता है , वंशानुगत सत्ताधारी द्वारा, आपात् काल लगा दिया , जनता क्रांति पर उतर आयी और देशी टाईप के लोगों नें सत्ता पायी , लेकिन जैसा होता है कि, कई दिन के भूखे को जब खाना मिलता है तो वह एक साथ ढेर सारा खाना खा लेता है और उसे अपच हो जाता है , जिन्हें सत्ता मिली , वे पहली बार सत्ता का स्वाद चख रहे थे , सो उन्हें खानें का तरीका नहीं आया और वे एक दूसरे की थाली का भोजन छीननें लगे , और आपस में इतना सिर फुटव्वल किये कि जनता , को फिर से , पुरानी शासक की याद आनें लगी और , जनता नें अपनीं पिछली गलती को सुधारते हुए , क्षमा याचना के साथ उन्हें फिर गद्दी पर बैठाया ।
भक्तों ,
आप सोचते होंगे कि त्याग गाथा की जगह मैं यह कथा क्यों सुनानें लगा । पूर्ण जानकारी के लिये ,थोड़ा उसकी पृष्ठ भूमि पर गौर करना जरूरी है । आगे सुनिये -
गद्दी पर दुबारा बैठनें के बाद , यह तय हो गया कि किसी देशी टाईप के व्यक्ति के लिये सत्ता के शीर्ष पर पहुँचना , या उसे बरकरार रखना असंभव है , क्योंकि एक तो देशी टाईप के दलों में लगभग एक ही स्तर के तमाम लोग होते हैं , और बिना बात ही , आपस में एक दूसरे से आगे निकलनें का प्रयास करते हैं जनता सब देखकर समझ जाती है कि बिना सत्ता के शीर्ष पर पहुँचे ही ये हाल है तो , पहुँचनें पर क्या होगा ।
भक्तों ,
समय बीतता गया , देशी लोगों के पास सत्ता पुनः आयी लेकिन जैसा पहले कहा था कि आपसी खींच तान के कारण , सत्ता जहाँ , जिसके हाथ में होनी चाहिये थी आ गई ।
भक्तों ,जोर दार ताली बजाईये , वह गाथा , जिसका आप को इंतजार था मैं सुनानें जा रहा हूँ ।
चुनाव हुए , कुछ देशी पार्टियों के गठबन्धन को पराजित होना पड़ा , कुछ देशी दल जो कभी क्रांति के समय में देशी पार्टियों के साथ खड़े थे पाला बदल कर , सत्ताधारियों के साथ में खड़े हो गये , और प्रस्ताव आया कि माता त्यागमूर्तिको देश की सत्ता सौंपी जाये । तमाम लोगों ने आंसूँ का दरिया बहा दिया , बहुत अनुरोध किया , पैरों पर गिर कर प्रार्थना की , लेकिन , जय हो - जय हो - , उन्होनें अन्तर्-आत्मा की आवाज पर पद को स्वीकार नहीं किया और सिंहासन को त्याग दिया । उस समय लगा जैसे सारे देश को काठ मार गया , कई नेता व नेत्री के आँसू तो रुकनें का नाम ही नहीं ले रहे थे । ऐसा त्याग देश वासियों ने केवल सुना था देखा नहीं था । जब उनका मौन आश्वासन मिला कि मैं ही सब कुछ हूँ सर्वत्र मैं ही विराजमान रहूँगी , तब जाकर लोगों के आसूँ रुके ।
किसी भक्त को कोई शंका हो तो प्रश्न लिखकर गले में लटका ले ,देश का कोना-कोना विद्वानों से भरा पड़ा है , कोई ना कोई शंका का सामाधान कर देगा ।
जय हो --- जय हो ----- जय हो ----- ।
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