दुनिया के साथ-साथ हमारे देश में भी कई तरह के दिवस मनाये जाते हैं , उनमें ज्यादातर ऐसे दिवस होते हैं जो वार्षिक उत्सव की तरह मनाये जाते हैं और तमाम लोग जो संकल्प आदि उस दिन लेते हैं सब कुछ अगले कुछ घन्टों में भूल जाते हैं । ऐसे ही एक दिवस का नाम है हिन्दी दिवस जिसे हम १४ सितम्बर को मनाते हैं , नहीं- नहीं सेलीब्रेट करते हैं , सरकार का काफी पैसा उसके सेलीब्रेशन में खर्च होता है , जैसे १५ अगस्त और २६ जनवरी के दिन खर्च होता है । हिन्दी बोलनें वालों को कीड़ा- मकौड़ा समझनें वाले आज दिन भर मातृ-भाषा हिन्दी पर खूब झूठा भाषण देंगे और देश के सारे कार्य हिन्दी में करनें और किये जानें पर जोर देंगे ।
हिन्दी के साथ-साथ अँग्रेजी भाषा के शब्दों को मिलाकर बोलनें में कोई दिक्कत नहीं है जब अगला उसे समझ रहा हो , लेकिन हमारे देश में तमाम ऐसे लोग है जो इस ग्लानि में जी रहें हैं कि इनका जन्म भारत में या हिन्दी भाषी क्षेत्र में क्यों हुआ , वैसे लोग नौकरों , चपारासियों , सफाईकर्मियों को भी अँग्रेजी में डाँटना पसन्द करते हैं , यद्यपि वैसे अँग्रजी-दाँ की अँग्रेजी भाषा में पकड़ किसी अमेरिकी या ब्रिटेन के सब्जी बेचनें वाले , ड्राईवर , सफाईकर्मी और अन्य कम पढ़े लिखे व्यक्ति से भी कम हो सकती है ।
मैंनें लोगों से सुना है कि , फिराक गोरखपुरी साहब कहा करते थे कि , भारत में केवल ढाई ( 2- 1/2) लोग ही अँग्रेजी जानते हैं जिनमें वे स्वयं , डॉ राजेन्द्र प्रसाद ( प्रथम राष्ट्रपति ) और आधा पं० जवाहर लाल नेहरु ।
हम लाख मेहनत करके किसी विदेशी भाषा के सारे व्याकरण , सारे मुहावरे , सारे नियम ,सारे शब्दों को तोते की तरह भले ही रट लें , लेकिन अपनी मातृ-भाषा न होनें का कारण हम उसमें कभी भी पूर्ण पारंगत नहीं हो सकते ।
हमारे देश के नियंताओं ने देश के जन्म के साथ ही , जो स्थिति पायी , उसमें उनके पास इतना समय ही नहीं था कि वे मातृ-भाषा के प्रश्न पर विचार कर सकें । जिस समय देश का प्रशासन भारतीयों के हाथ में दिया जा रहा था , देश की आन्तरिक स्थिति ठीक भी नहीं थी । परिणाम स्वरुप सम्पूर्ण गुलामी वाली व्यवस्था वैसी ही स्थिति में कायम रह गयी । जनता को पता ही नहीं चला कि वह कैसे पुनः गुलामी की मानसिकता में चली गई और एक नये प्रकार के शासक वर्ग का जन्म हुआ जो देखनें में तो भारतीयों जैसा प्रतीत होता था लेकिन भीतर से कतई भारतीय नहीं था ।
परिणाम-स्वरुप , देश के सारे कानून , देश के सारे कार्यालयों , सारे संस्थानों की कार्य शैली वही रही जो ब्रिटिश काल में रही थी , कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ ना करनें की हिम्मत हुई । आज अगर देश के किसी भी मुख्य संस्थान में आप जाइये तो शायद ही वहाँ कहीं हिन्दी नजर आये । बाहर बोर्ड पर जो नाम लिखा होगा , उसपर हो सकता है शर्म वश या अन्य किसी अज्ञात कारण से हिन्दी में उस कार्यालय का नाम अंकित हो , वैसे ज्यादातर मामलों में आपनें देखा होगा कि देश के तमाम ऐसे बड़े संस्थान हैं जिनके नाम पहले अँग्रेजी में फिर हिन्दी में लिखे होते हैं ।
सच कहा जाये तो हम हिन्दी भाषा-भाषी ही , हिन्दी भाषा के असली दुश्मन हैं । सरकार नें राज-भाषा विभाग और कई अन्य कई संस्थान खोला और खोलनें में मदद भी दी उसमें हिन्दी भाषा के जानकार लोगों को रखा सरकारी पुस्तकें प्रकाशित करवायीं , लेकिन असली हिन्दी के जानकर होनें का दावा करनें वाले हमारे साहित्यिक भाईयों नें , अपनी सारी कुण्ठा , अपनें सारे छिपे हुए अज्ञान को जाहिर करते हुए , वैसी पुस्तकों में ऐसी कठिन संस्कृत-निष्ठ भाषा का प्रयोग किया कि उसके उच्चारण और अर्थ को समझनें में भी लोगों को दिक्कत आनें लगी । ऐसे लोगों के कारण ही हिन्दी भाषा को सन् १९४७ से लेकर कुछ साल पहले तक उपेक्षा झेलनी पड़ी है । मेरा तो यहाँ तक मानना है कि यदि देवनागिरी लिपि भविष्य में लुप्त होनें के कगार पर आयी तो उसके जिम्मेदार भी वैसे ही कुण्ठाग्रस्त हिन्दी के तथा कथित विद्वान् होंगे , जिन्हें उस समय आत्म-गौरव का अनुभव होता है जब कोई , उनके शब्दों का अर्थ नहीं समझ पाता है ।
बहरहाल देश में हिन्दी का महत्व स्वयं बढ़ा है और यह बढ़ता ही रहेगा । हमारी हिन्दी भाषा को , कमजोरों की भाषा , पिछड़ों की भाषा , अनपढ़ों की भाषा बतानें वाले , भी अब महसूस करनें लगे हैं कि "बिन हिन्दी सब सून " । हिन्दी भाषा के विकास का काम हमारे देश के युवा करेंगे , और कर रहे हैं ।
अन्त में मेंरा देश के तमाम नेता जी लोगों से और तमाम अधिकारियों व कर्मचारियों से सादर निवेदन है कि , हिन्दी दिवस के साथ-साथ आप लोग आज ही यानि १४ सितम्बर को निम्नलिखित दिवसों को भी मनाये -
१- बेईमानी नहीं करेंगे दिवस ।
२- घोटाला नहीं करेंगे दिवस ।
३- विदेशों में काला धन जमा नहीं करेंगे दिवस ।
४- चुनाव में झूठा वादा नहीं करेंगे दिवस ।
५- जनता को परेशान नहीं करेंगे दिवस ।
६- देश से गद्दारी नहीं करेंगे दिवस ।
चूँकि सारे दिवस केवल एक दिन के लिये होते हैं , अतः अगले दिन आप फिर पुरानें धन्धे में लग सकते हैं ।
पचासों अन्य प्रकार के दिवस लिस्ट में हैं , लेकिन उनका जिक्र फिर कभी करूँगा -
लेकिन एक दिवस मनानें के लिये मैं जरुर अनुरोध करता हूँ -" देश भक्ति दिवस " देखता हूँ देश में कबसे मनाना शुरू होगा ?
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