मंगलवार, 10 जुलाई 2012

कहानी --- महानगरीय ईश्क की ---


       महानगरीय ईश्क और --------- 
            जिस घटना का जिक्र मैं करनें जा रहा हूँ, वह घटना उस समय की है , जब गाँव का आदमी दिल्ली कमानें जाता था तो लोग उसे सावधान करते थे कि वहाँ देश भर के शातिर किस्म के लोग रहते हैं जो सीधे-सादे लोगों को ठग लेते हैं, सावधान होकर रहना।        
             लेकिन अब दिल्ली पहले वाली दिल्ली नहीं रही और देश के तमाम शातिर किस्म के लोग दिल्ली न जाकर अपनें ही इलाके में अपना व्यवसाय कर सुखी हैं ।
            मेंरा एक मित्र किशोरावस्था से कुछ ऊपर हुआ तो उसके अन्दर अपनें पैरों पर खड़े होनें की भावना नें हिलोरें मरना शुरु किया । वह अपनें एक बाल-मित्र के यहाँ जानें की योजना बनाकर दिल्ली गया । वहाँ उसके साथ क्या-क्या घटना और दुर्घटना हुई, उसनें विस्तार से मुझे सुनाया । मैंनें उसे वचन दिया कि मैं उसके साथ घटी घटना किसी को नहीं बताऊँगा , सो मैनें किसी को उस घटना के बारे में नहीं बताया लेकिन उस घटना को लिखूँगा नहीं , ऐसा वचन मैनें उसे नहीं दिया था । अतः लेखन के माध्यम से उसकी व्यथा-कथा को ज्यों का त्यों आपके समक्ष रख रहा हूँ ।
             " बबुआ का पत्र मिलते ही मैं और अधिक विलम्ब नहीं करना चाहता था , यद्यपि उसनें मुझसे दिल्ली आनें का कोई स्पष्ट आग्रह नहीं किया था , वैसे भी आग्रह की कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि बबुआ मेरा बाल-सखा था, इसलिये औपचारिकता जैसी कोई चीज भी नहीं थी । जैसे-तैसे पैसों का जुगाड़ कर मैंनें दिल्ली का टिकट कटाया । अपनें गाँव से विदा करनें और मुझे सम्मान के साथ स्टेशन तक छोड़नें के लिये मेरे कई मित्र भी साथ में स्टेशन आये । ट्रेन आई और मैं अपनें मित्रों से विदा लेकर दिल्ली जानें वाली खचाखच भरी ट्रेन की बोगी में घुस गया।
            दोपहर के आस-पास मैं इस महानगरी के प्लेटफार्म पर खड़ा होकर मानव योनि में पैदा करनें के लिये पहली बार भगवान को धन्यवाद दे रहा था । मैं प्लेटफार्म पर खड़े लोगों, आस-पास नजर आ रही सारी चीजों को ध्यान से देखकर आत्मसात करता जा रहा था ताकि मेरे गाँव का कोई आदमी दिल्ली के बारे में पूछे तो उसे सारी जानकारी मैं दे सकूँ ।
              मैं धीरे-धीरे चलते हुए,प्लेटफार्म की सारी चीजों को दिमाग में भरते हुए प्लेटफार्म से निकल कर बाहर आया । आटो वाले, रिक्शा वाले सभी मेरे पास आकर सम्मान पूर्वक पूछ रहे थे- सा'ब कहाँ जाना है । मैं अपनें मित्र बबुआ के पता वाला कागज दिखाता तो वे लोग मुँह बनाकर चल देते और दूसरे यात्रियों से पूछ-ताछ करनें लगते । किसी भी आटो या रिक्शे वाले नें मुझे अपनें मित्र के यहाँ जानें का रास्ता नहीं बताया ।
                मैं सोचकर परेशान था कि - हमारे गाँव में जब कोई अनजान आदमी किसी का पता पूछता है तो हम लोग उसे सही-सही रास्ता बताते हैं और कभी-कभी उसे उस जगह पहुँचा भी देते हैं। लेकिन यहाँ तो सब अजीब सा बेरुखा बर्ताव कर रहे हैं ।
                मेरे अन्तर्मन नें समझाया - यहाँ के सभी लोग अपनें काम मे लगे हैं, कोई खाली नहीं है। सब भाग रहे हैं, किसी के पास ठहरनें का वक्त नही है । यह सब देश, समाज और व्यक्ति के विकास करनें के लिये जरुरी भी है, तभी तो दिल्ली नें इतना विकास किया है ।  इंसानियत और भलाई जैसे शब्द का प्रयोग यहाँ कम ही होता है क्योंकि ये शब्द विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं ।  मैं अपनें अन्तर्मन की सलाह से सन्टुष्ट हुआ ।
              अब मैं इस कोशिश में लग गया कि कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो मुझे अनजान समझकर मूर्ख ना बनाये और बबुआ के मोहल्ले का सही-सही पता बता सके ताकि उसके घर तक पहुँचनें में मुझे आसानी हो जाये ।
                मैं तीस चालीस कदम आगे बढ़ा तो देखा कि चार-पाँच लोग घेरा बनाकर कुछ कर रहे थे ।  मुझे लगा कि वे लोग मुझे सही रास्ता बता सकते हैं । मैं धीरे से जाकर उन लोगों के करीब में खड़ा हो गया और प्रतीक्षा करनें लगा कि वे हमारी ओर ध्यान दें तब मैं उनसे बबुआ का पता ठिकाना आदि पूछूँ । वे लोग पूरी तन्मयता के साथ ताश खेल रहे थे। मेरी उपस्थिति का उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता देख मेंरा धैर्य जवाब देनें लगा, मैंने उनमें से एक खिलाड़ी के कन्धे को हल्के से छूकर कहा - भईया जरा ये पता बता सकते हैं । सभी खिलाड़ियों नें मेंरी ओर एक साथ घूर कर देखा , मैं सिटपिटा गया । मेरा विधिवत् निरीक्षण करनें के उपरान्त वे लोग पुनः पूरी एकाग्रता के साथ अपनें खेल में भिड़ गये । थोड़ी देर बाद मैनें फिर उन लोगों से विनती, प्रार्थना व निवेदन के भाव को एक साथ प्रदर्शित करते हुए अनुरोध किया । उन सभी के चेहरे पर क्रोध और तिरस्कार के सम्मिलित भाव प्रकट हुए, उनमें से एक खिलाड़ी नें मेरे हाथ से बबुआ के पते वाली पूर्जी ले ली । उसनें पूर्जी को आगे पीछे से देखा फिर मुझे हाथ के ईशारे से समझाया कि अभी बताता हूँ और इतमीनान के साथ फिर खेलनें में जुट गया । मैंने कुछ समय बाद अपनें अनुरोध को दुहराया तो उसनें मुझे उसी अन्दाज में समझाया, मैं चुप हो गया । उनका खेल अनवरत चलता रहा , आधा घन्टा और बीता, मैं अधीर होनें लगा , मैंने फिर आग्रह किया , उसनें पुनः उसी अन्दाज में चुप रहनें की सलाह दी । अब मुझे क्रोध आनें लगा । मैनें कठोर होकर कहा , मैं एक घन्टे से ज्यादा समय से आप लोगों से पता पूछ रहा हूँ , और आप लोग । उनमें से एक बोला , कैसा पता ? मैनें घबराकर कहा- वही पता जो कागज पर लिखा था । तभी दूसरा  बोला - ये ले अपनी चिट, आगे बढ़, किसी दूसरे से पूछ लेना । इसमें लिखा पता हमें नहीं मालूम । भाई साहब , शुरू में ही कह देते - मैंनें दबा हुआ रोष प्रकट किया । क्या खाक कह देते,  तुम्हें खुद ही तमीज होनी चाहिये कि जब कहीं चार-पाँच लोग आपस में बात कर रहे हों , या कुछ कर रहें हों, उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहिये - उनमें से एक नें मुझे तमीज सिखायी ।
                चूँकि, लोगों ने पहले से बता दिया था, इसलिये इस हादसे का ज्यादा असर मेरे ऊपर नहीं हुआ लेकिन मैं इस अनजानी नगरी में कितना असहाय हूँ इसका अहसास हो रहा था । थकान लग रही थी । मैं आगे बढ़ा । कुछ दूरी पर एक टी स्टाल देखा, कदम स्वतः उधर बढ़ गये । जेब देखा , पैसे सही सलामत थे । मेरा मूड खराब हो रहा था  । चाय का आर्डर देकर मैनें इधर-उधर निगाह घुमायी । लगभग बगल में ही फुटपाथ पर एक कपड़े की दुकान सजी थी। दुकान पर गठीले बदन का, भद्दा सा काला-कलूटा एक आदमी चिल्ला-चिल्लाकर कपड़े बेच रहा था । उसकी दुकान पर रंग-बिरंगी शर्ट, टी-शर्ट , पैन्ट आदि कपड़े थे जो बहुत सुन्दर लग रहे थे। इक्का-दुक्का लोग ही उस दुकान के आस-पास थे।  मैंने चाय समाप्त की, चाय वाले को पैसे दिये । चाय की दुकान के पास खड़े-खड़े ही कपड़े की दुकान पर सजे कपड़ों पर निगाह डालनें लगा ।
               मुझे देखकर वह कपड़े वाला जोर-जोर से चिल्लाकर बोलनें लगा - सा'ब , आठ-आठ रुपये , ले लो सब आठ-आठ रुपये में । मैं चौंक गया और सोचनें लगा कि इतनें अच्छे रंग-बिरंगे कपड़ों की कीमत तो हमारे गाँव के बाजार में बहुत ज्यादा होती है । अवश्य ही यह कपड़े वाला या तो पागल है या ये सारे कपड़े चोरी के हैं और यह दुकानदार जल्दी से उन्हें बेचकर भागनें के चक्कर में है । मेरे पास पैसे ज्यादा नहीं थे नहीं तो सारी दुकान ही खरीद लेता और ले जाकर अपनी गाँव की हाट में बेच देता । 
                अभी मैं कुछ सोच ही रहा था कि अकस्मात् ना जानें कहाँ से कई सुन्दरियाँ एक साथ प्रकट हो गईं और मुझसे पहले ही दुकान पर पहुँचकर कपड़ों का मोल-भाव करनें लगीं । वे सभी शहरी परिधान में परियाँ लग रही थीं जिनका दर्शन हमारे गाँव में दुर्लभ नहीं असंभव है । मेरे अन्दर कुछ उर्जा सी महसूस होनें लगी । थोड़ी देर पहले उन ताश खेलनें वालों द्वारा दिये गये सदमें से मैं अब लगभग ऊबर चुका था । मेरे कदम स्वतः कपड़े की दुकान की ओर बढ़नें लगे ।
             वह कपड़े वाला ससुरा अपनें गन्दे-गन्दे दाँतों को बार-बार बाहर निकाल कर हौले-हौले मुस्कराकर उन सुन्दरियों से मोल-भाव कर रहा था । पता नहीं क्यों मुझे उससे जलन होनें लगी थी । अब तो हद हो गई थी वह उनके हाथ पकड़-पकड़ कर कपड़े छँटवा रहा था और वे सब विरोध करना तो दूर मजे से खिलखिलाये जा रहीं थीं । शायद यहाँ की यही सभ्यता हो सोचकर, मैंनें अपनें बेचैन मन को धीरज बँधवाया । मुझे बरबस उस कपड़े वाले के भाग्य से ईर्ष्या होनें लगी । वह धर्मेन्द्र , जीतेन्द्र जैसे किसी फिल्मी हीरो जैसा होता तो एक बात थी । वह बेहूदा, एकदम काला कलूटा, गन्दा, शक्ल से किसी विलेन जैसा लगता था । किसी के भाग्य से ईर्ष्या नहीं करनीं चाहिये , मेंरी अन्तरात्मा नें मुझे समझाया ।
              तभी कपड़े वाले की आवाज आयी ,सा'ब - क्या सोच रहें हैं , इतनी देर से ? वह व्यवहार कुशल था , मेरी समझ में आ चुका था । मेंरी झिझक को समझते हुए बोला - सा'ब ,आठ-आठ रुपये में अपनीं मन पसन्द की चुन लो । सब एक से बढ़कर एक हैं, कहते हुए उसनें एक साथ उन सुन्दरियों तथा मेंरी ओर शरारत वाले अन्दाज से देखा और हौले से मुस्कराया । उसके कहनें की स्टाईल से मैं शर्मा गया किन्तु सुन्दरियों पर उसका कोई असर नहीं पड़ा उन सुन्दरियों  नें बेहद शरारत भरी नजरों से मेंरी ओर देखा और जोर से खिलखिलाईं । मेरे अन्दर गजब के भौतिक परिवर्तन होनें लगे - माहौल बेहद खुशनुमा हो गया था । दुकानदार और वे सुन्दरियाँ मेरे लिये अब अपरिचित से नहीं लग रहे थे ।  
              उन सुन्दरियों नें इतनी देर में बहुत से कपड़े उलट-पलट डाले लेकिन कोई कपड़ा पसन्द नहीं किया । कपड़े इतनें सस्ते और अच्छे लग रहे थे कि मैनें पक्का इरादा कर लिया था कि कुछ कपड़े मैं अपनें और घर वालों के लिये जरुर लूँगा । इतनें में सबसे आकर्षक लगनें वाली सुन्दरी नें मेंरी ओर इशारा करते हुए अन्य सुन्दरी से कहा - ये टी-शर्ट तो इन पर खूब जँचेगी । दूसरी बोली हट ये नहीं ये वाली । वे दोनों मेरे सांवले रंग रुप और कद काठी के अनुसार अपनें-अपनें चयन को वरीयता दे रहीं थीं । मैं उनकी बातों पर अपनी कान लगाये था लेकिन निगाह केवल कपड़ों पर डाल रहा था । आज मुझे अपनें ऊपर सचमुच गर्व हो रहा था । पहली बार अहसास हुआ कि मैं भी इस दुनिया में कुछ हूँ ।
               तभी दुकानदार बोला - आप लोग क्यों बहस किये जा रही हैं , सा'ब , आप दोनों की पसन्द की एक-एक पीस ले लेंगे, क्यों सा'ब । क्यों नहीं - क्यों नहीं, मैनें उसकी बात को बीच में लपकते हुए कहा । मैं अपनी पोजीशन खराब नहीं करना चाहता था, मैंनें तुरन्त सहमति दे दी । वे दोनों सुन्दरियाँ प्रसन्न हो गईं और मैं पुलकित । अन्य सुन्दरियाँ भी मेरे कहनें के अन्दाज से प्रभावित दिखीं ।
               मैं आज स्वयं को संसार का सबसे प्रसन्न और सुखी प्राणी समझ रहा था । जिसके बारे में इतनी सुन्दर कन्याएं बात करें वह कितना भाग्यशाली होगा । उन दोनों सहेलियों नें मेरे लिये गहरे हरे रंग और सुर्ख लाल रंग की दो टी-शर्टें पसन्द कीं जो बेहद पुरानी जैसी दिख रहीं थीं लेकिन मेरे पास उन्हें स्वीकार करनें के अलावा कोई विकल्प नहीं था । सुन्दरियाँ उन्हें एकदम लेटेस्ट मॉडल की टी शर्ट बता रही थीं । मैंनें भी सोचा - हो सकता है । 
                 वह दुकानदार मेरी ओर देख कर बोला - दोनों पीस पैक कर दूँ , सा'ब । मैनें ऊँची आवाज में कहा - यह भी कोई पूछनें की बात है, दोनों पीस पैक कर दो । मेंरे इतना कहनें पर , उन दोनों हसीनाओं नें जिस अन्दाज़ में मुझे देखा - कुछ --- पूछिये -- मत । मैं बुरी तरह से घायल हो चुका था । दुकानदार नें मुझे दोनों पीस पकड़ाये, मैंनें अपना रोब जमानें के लिये, जेब से थोड़ा पुराना पर्स निकाला, पर्स में से सारे रुपये निकाले और आहिस्ता से गिनकर सोलह  रुपये दुकानदार को दिये ।
                 उस कपड़े वाले की दुकान पर इक्का-दुक्का लोग आते और देख कर चले जाते किन्तु स्थायी रुप से दुकान पर रहनें वालों में मैं और वे पाँच सुन्दरियाँ ही थीं । मेरे पैर में मानों बेड़ियाँ पड़ गयी हों , मेंरा वहाँ से हटनें का मन ही नहीं कर रहा था । तभी सबसे आकर्षक दिखनें वाली सुन्दरी बोली - हमारी बकिया सहेलियाँ भी चाहती हैं कि आप एक-एक टी-शर्ट उनकी पसन्द की भी लें ।
                  मैं किसी भी तरह से इस खूबसूरत मौके को गँवाना नहीं चाहता था , उस सुन्दरी के प्यार भरे आग्रह को अस्वीकार करनें का साहस मेरे अन्दर नहीं था और उसके स्पष्ट आमंत्रण वाले भाव को मैं थोड़ी कंजूसी कारण गंवाना भी नहीं चाहता था सो मैनें बहादुर आशिकों  की तरह मुस्कराकर कहा - आपके आदेश को मैं कैसे ठुकरा सकता हूँ। मेरे इतना कहनें पर जो खुशी उसके चेहरे पर छाई उसका वर्णन करना मेरे लिये संभव नहीं ।
                   दो टी-शर्ट तो मैं पहले ही ले चुका था । शेष तीन सहेलियों नें भी अपनी-अपनी पसन्द के तीन टी-शर्टों का चयन किया जो देखनें में भद्दे व पुरानें जैसे लग रहे थे , लेकिन मैं उनकी पसन्द को नापसन्द करनें की स्थिति में नहीं था । सच्चाई तो यह थी कि मुझे पहले वाली दोनों टी-शर्टें भी पसन्द नहीं थीं लेकिन स्वयं उपस्थित हुए इस खूबसूरत अवसर पर उन सुन्दरियों की भावना को ठेस पहुँचा कर मैं बनते जा रहे खेल को बिगाड़ना नहीं चाहता था । साथ ही साथ लोग दिल के आगे कैसे मजबूर हो जाते हैं , पहली बार जाना ।
                मैनें दुकानदार को पर्स से निकालकर सौ रुपये दिये ।  दुकानदार बोला साहब पचास रुपये और । मैंनें कहा - भाई आठ रुपये के हिसाब से तीन टी-शर्ट का चौबीस रुपया ही हुआ ना । नहीं सा'ब ये तीनों पीस पचास रुपये वाली हैं - दुकानदार बोला । मैं मोल-भाव करके बनी बनायी इमेज खराब करना नहीं चाहता था । यह जानते हुए कि दुकानदार नें मौके का फायदा उठाकर मुझे चूना लगाया है  मैंनें मन मसोसकर पर्स से पचास रुपये अतिरिक्त निकाल कर उसे दे दिये , दुकानदार नें मुस्कराकर कुल 150 रुपये मुझसे लिये और अपनी जेब में ठूंसा ।
                इस प्रकार मैंनें कुल 166 रुपये में पाँच टी-शर्ट खरीदी । मैं दुकान से हटना चाहता था, लेकिन ना जानें कौन सी अनजान शक्ति मुझे जकड़े हुए थी । मैं सोच रहा था कि वे पाँचों सुन्दरियाँ कपड़ें खरीद कर वहाँ से हटें, तब मैं उन्हें चाय-वाय का आफर करूँ । वे वहाँ से सरकनें का नाम नहीं ले रहीं थीं । मैं बबुआ के यहाँ जानें के बारे में भूल चुका था ।
                लड़कियाँ कपड़ों को बार-बार केवल उलट-पलट रहीं थीं । तभी दुकानदार फिर बोला - सा'ब आपनें तो अपनीं पसन्द का कुछ खरीदा ही नहीं । सभी सुन्दरियाँ भी एक स्वर में बोली , हाँ भाई हाँ । मैंनें सोचा कि पाँच टी-शर्ट तो ले चुका हूँ , एक और लेनें में बुराई क्या है । मैंनें , कपड़ों के ढेर में से एक टी-शर्ट पसन्द की, और दुकानदार से पूछा , इसका क्या दाम लगाओगे भाई । दुकानदार बोला , दूसरे ग्राहक से पूरे ढाई सौ (250) रुपये लेता लेकिन आपसे केवल दो सौ रुपया लूँगा । मैं समझ गया कि यह चालाक दुकानदार मौके का फायदा उठा रहा है सुन्दरियाँ मेंरी पसन्द की दाद दिये जा रही थीं और मैं ठगे जानें के दुःख के बावजूद बाग-बाग हुआ जा रहा था ।  मैंनें दाम के मसले पर दुकानदार से हुज्जत करना उचित नहीं समझा, सो चुप ही रहा और पर्स से 200 रुपये निकाल कर उस धूर्त दुकानदार को दे दिये । इस प्रकार उस चालाक दुकानदार नें मेरी मजबूरी का लाभ उठाते हुए मुझे दो बार खुलेआम ठगा था लेकिन मेरे पास ठगे जानें के अलावा कोई रास्ता ही नहीं था । 
               इधर मन में लड्डू फूट रहे थे , उधर जेब हल्की होती जा रही थी । मैं इतनी देर में यह निष्कर्ष निकाल चुका था कि वह जो सबसे सुन्दर वाली, कोमल काया वाली, पतली सी लड़की थी, जिसे मैं मन ही मन अपना बना चुका था, वह भी मुझपर आसक्त हो चुकी है , उसके सारे हाव-भाव इस बात की गवाही दे रहे थे कि वह भी मेरे साथ अपनें सुन्दर संसार की कल्पना कर रही थी । वह बार-बार मेंरी ओर देखकर -- मुस्कराकर-- नज़रें झुका लेती थी , मैं तो उसपर शुरू से कुर्बान था । तभी दुकानदार नें उसी सुन्दरी को डाँटते हुए कहा - सा'ब नें इतनी देर में कई टी-शर्ट खरीद ली और आप लोग हैं कि दो घन्टे से बस ये वाली और वो वाली करे जा रहीं हैं । कुछ लेना नहीं है तो आगे बढ़िये आप लोग ।
               मुझे बड़ा गुस्सा आया , लेकिन लड़कियों को उस दुकानदार पर कोई क्रोध नहीं आया । परदेश का मामला था सो मैं भी चुप रहा । वही सुन्दर वाली कन्या जो कि भावनाओं में अब मेरी वाली हो चुकी थी, उसनें एक सूट-पीस पसन्द किया । दाम चुकानें के लिये उसनें इधर-उधर टटोला, फिर घबराकर बोली - हाय मेंरा पर्स और कहकर सुबकनें लगी । जिसको मैंनें अपना मान लिया हो उसकी आँख में आसूँ ? मुझे बर्दास्त नहीं हुआ । मैंनें बिना देर किये दुकानदार से कहा - कितनें पैसे देनें हैं । वह बोला -सा'ब , एक सौ पचास रुपये । मैंनें उस सुन्दरी के बहुत बार मना करनें के बावजूद भी दुकानदार को 150 रुपये दे दिये । मेरे पेमेन्ट करनें के बाद उसनें अपनी आँसू भरी आँखों से मेंरी और देखा , उसकी आँखों में कृतज्ञता और प्रेम के सम्मिलित भाव थे । वह मेरे लिये अब ना तो अपरिचित थी ना ही नई जान पहचान वाली ।
                मैं प्यार की राह पर लगातार सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जा रहा था । यद्यपि उस कलूटे दुकानदार नें मुझे इस क्रम में कई बार ठगा । मैं खड़े-खड़े ही कल्पना में उस अपनी वाली के साथ भविष्य के बारे सोच रहा था तभी उसकी मधुर आवाज मेंरे कानों में पड़ी - वह मुझसे बोली मैं अपनीं सहेलियों के लिये भी एक-एक सूट पीस खरीदनें आई थी ।
                मैंनें मन ही मन घबराते हुए हिसाब लगाया । मेरी जेब से अब तक कुल पाँच सौ सोलह (516) रुपये निकलकर उस कपड़े वाले की जेब में जा चुके थे । मेंरी जेब में मात्र चार सौ चौरासी  (484) रुपये कुछ पैसे ही शेष बचे थे ।
                मैनें प्यार में कुर्बान होनें वाले आशिकों की कहानियाँ सुनी थी सो मैंनें अपनें आपको भगवान के हवाले करते हुए , दुकानदार से कहा - भाई इनकी सहेलियों के लिये भी निकाल दो । सहेलियों नें अपनी-अपनी पसन्द से कपड़े चुनें । दुकानदार से दाम पूछा । उसनें उन चारों सूट पीस का दाम साढ़े चार सौ (450) रुपया बताया ।
                 मेरी स्थिति साँप और छछून्दर वाली हो गई थी । मैं अब ना तो निगल पा रहा था ना ही उगल पा रहा था । जिस प्रकार एक जुआरी लगतार हारते-हारते अपनें अन्तिम दांव में अपनें पास का सब कुछ बचा-खुचा लगा देता है ठीक उसी अन्दाज में मैनें भगवान का नाम लेते हुए भारी मन से 450 रुपया दुकानदार को पेमेन्ट कर दिया । भगवान की कृपा से उसनें अपनी ठगनें की परम्परा को आगे नहीं बढ़ाया, अन्यथा --- ।
                सभी सुन्दरियाँ मेरी दरियादिली का तारीफ किये जा रही थीं और मेरा मन इस बात को लेकर चिन्तित था कि इस महानगर में बिना पैसे के मैं कैसे रह पाऊँगा । प्लेटफार्म पर जब उतरा था तब मेरे पास कुल 1000 रुपये और कुछ फुटकर पैसे थे, जिसमें से 966 रुपये अब तक मेरी जेब से जा चुके थे ।
                 अब मेरे पास थे, मात्र चौंतिस (34) रुपये कुछ पैसे, छः टी-शर्ट और ईश्क का भूत । कुछ पानें के लिये कुछ खोना पड़ता है । मैं कुछ पा तो नहीं पाया था लेकिन पानें की संभावना में बहुत कुछ खोता जा रहा था । वे पाँचों सुन्दरियाँ मेरी तारीफ में लीन थीं । मैं जानता था कि जो सबसे दबे जुबान से मेरी तारीफ कर रही है उसके दिलो दिमाग पर मैं पूरी तरह से हावी  होता जा रहा हूँ ।
                 मैं अपनीं जीत पर प्रसन्न हो रहा था लेकिन मुझे इस बात की चिन्ता भी सता रही थी कि यदि मेरी वाली सुन्दरी मेरे साथ जाने को तैयार भी हो जाये तो मैं उसे कैसे अपनें घर ले जाऊँगा क्योंकि मेरे पास तो खुद गाँव जानें के लायक पैसे भी नहीं बचे थे । फिर ये भी तो हो सकता है कि यदि मैं किसी प्रकार उसे साथ लेकर अपनें गाँव जाऊँ और घर वाले मेरी बात को ना मानें तथा घर से ही निकाल दें , तब क्या होगा । अन्ततः मैनें अपनें अन्तर्मन की बात को मानते हुए दिल्ली में ही रहकर काम करनें के बारे में सोचना शुरु किया । 
                   मुझे ना तो बबुआ के यहाँ जानें की फिक्र थी ना ही अपनें घर वापस होनें की चिन्ता । मैं तो केवल उसी के बारे में सोच रहा था कि पता नहीं घर पर वह एडजेस्ट कर पायेगी या नहीं , फिर विचार आता , लड़कियाँ सब एडजेस्ट कर लेती हैं । मेंरी जीवन संगिनी के रुप में वह बिल्कुल फिट नजर आ रही थी , उसके दिमाग में भी ऐसा ही कुछ चल रहा होगा, मेरे दिल नें कहा । वह भी किसी ख्याल में डूबी थी, मैं जानता था कि उसके ख्यालों में भी वही विचार आ रहे होंगे जो मुझे आ रहे थे । बिना कुछ कहे भी कितनी बातें कही जा सकती हैं, इसका अनुभव मुझे पहली बार हुआ ।
                    वह बार-बार मेंरी ओर देखकर पैर के अँगूठे से जमीन कुरेद रही थी, अपनी ऊँगलियाँ मरोड़ रही थी। मैंनें सुना था कि ये सब हरकतें लड़कियाँ तभी करती हैं, जब किसी लड़की के मन में किसी के लिये कुछ हो । सारे लक्षण इस बात की गवाही दे रहे थे कि ईश्क के शोले दोनों ओर भड़क रहे थे । हम दोनों बुरी तरह से ईश्क के गिरफ्त में आ चुके थे । मैं अपनीं विजय का जश्न अन्दर ही अन्दर मना रहा था लेकिन ऊपर से शान्त ही बना रहा । सुन्दरियाँ मेंरी ओर देखकर आपस में काना-फूँसी कर रही थीं।  मैं सब समझकर अनजान बना रहा । 
               धीरे-धीरे , दिन ढलनें लगा । बिना कुछ खाये-पीये तीन-चार घन्टे बीत गये थे , लेकिन भूख प्यास का नामो-निशान नहीं था । दुकानदार नें दुकान समेंटना शुरु कर दिया, नोटों को गिनकर जेब में डाला और कपड़े के गट्ठर पीठ पर लादकर वह चलनें लगा , उसके पीछे वे सुन्दरियाँ और उनके पीछे मैं ।
                मेंरी समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे रोकूँ उस सुन्दरी को, कैसे आगे की योजना बनाऊँ । वे सभी पीछे मुड़कर देखनें का नाम ही नहीं ले रही थीं । मैंनें आवाज देकर , अपनें होनें का अहसास कराया , सभी सुन्दरियाँ रुकी और साथ में वह काला-कलूटा दुकानदार भी रुका । मैनें सुन्दरियों से विनम्रता पूर्वक चाय पीनें का आग्रह किया । वह कलूटा कपड़े का गठ्ठर जमीन पर रख कर मेरे पास तेजी से आया और बोला - क्यों भाई , ज्यादा आशिकी चढ़ी है ? जाओ अपना काम करो , तुम्हारे जैसे यहाँ रोज आते हैं , गँवार कहीं का । मैं जड़वत् हो गया ।
                 वे सुन्दरियाँ ठहाके मार-मार कर हँस रहीं थीं, जिस बेवफा के लिये मैं अपना जीवन कुर्बान करने को तैयार था वो बेवफा सबसे तेज ठहाके लगा रही थी । मैं ग्लानि के सागर में डूब रहा था । मेंरे सारे सपनें, सारे अरमान  रेत के महल की तरह  ढह गये थे । मेंरी एक बेहद खूबसूरत दुनिया एक झटके में तबाह हो गई थी । मैं थका , हारा , लुटा-लुटा, पुनः उस चाय वाले के दुकान पर आकर बैठ गया । 
                मैंनें सारे घटना-क्रम को याद किया और स्वयं को धिक्कारना शुरु किया । तभी एक हाथ मेंरे कन्धे पर पड़ा और आवाज आई - दोस्त क्या विचार है ? मैं भी कभी तुम्हारी तरह से ही अपनें गाँव से दिल्ली आया था ।  मैंनें इस चाय की दुकान पर काम करते-करते घर जानें का पैसा जमा कर लिया है । मुझे अपनी मुक्ति के लिये तुम्हारे जैसे ही आदमी की ही जरुरत थी जो इस दुकान पर आगे मेंरी जगह काम कर सके, तभी मेंरा मालिक मुझे जानें देगा । तुम इसी दुकान में नौकरी करके पैसा जमा करो और अपनें जैसे किसी शिकार का जाल में फँसनें तक इंतजार करो, भगवान तुम्हारी मदद करे । 
                 इसके बाद की घटना के बारे में मैं कुछ भी बता पानें में असमर्थ हूँ क्योंकि मैनें वचन दिया था कि उसके बाद की घटना के बारे में लिखूँगा भी नहीं ।

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