पत्र
-पत्रिकाओं मे
जो व्यंग निकलते हैं उस पर
हमारे , नेता गण
खुलेआम तो कुछ नहीं कहते लेकिन
वे क्या सोचते हैं
- इस वार्ता से
कुछ जाहिर होगा :-नेता उवाच --
" आखिर कोई हद होती है जब देखो तब नेता ,
गाली देनें को नेता , बेइज्जत करना हो नेता ।
साधु नहीं बने रहेंगे , खरी खोटी यदि और सुनेंगे ,
अब तक तो सब सुन लिया , आगे नहीं सुनेंगे ।
अखबारों में व्यंग निकलते ,पत्रिकाओं में लेख,
ग्लानि में मरता हूँ अपनीं , गन्दी फोटो देख ।
हे मेरे , पुरातन चमचे चाल चलो कुछ ऐसी ,
इन बोगस लोगों की हो जाये ऐसी तैसी ।
उपरोक्त अंश है वार्ता का , नेता चम्मच बीच ,
सुन रहा था चमचा ,अपनीं कानीं आँखें मीच ।
श्रीमुख खोला चमचे नें , मृदुल वाणी में बोला ,
गीता से भी महान् उपदेश नेता को दे डाला ।
चमचा उवाच-
स्वामी इस वर्तमान दौर में चुप्पों का है बोलबाला ,
खींच-तान के इस महासमर में वो हारा जो बोला ।
इस नश्वर संसार में , स्वामी कुछ ऐसा ही होता है ,
महान व्यक्ति ही , नीच की गाली सदा खाता है ।
इन नीचे स्तर वालों को हुजुर, नजर अन्दाज कीजिए ,
उच्च स्तर वालों के लिये , कोई अच्छी गाली सोचिए ।
नेता होकर जो मानव , लज्जा , ग्लानि की बातें करता है ,
वह नराधम , इस जनम में , कुछ नहीं कर सकता है ।
सामूहिक गाली या निन्दा से होता नहीं है कुछ भी ,
नेता वह महान् जो उपहार , सम्मान् समझे उन्हें भी ।
सर्वज्ञ चमचे की युक्ति , नेता जी को भायी ,
चेहरे पर थी अब उनके परम् शान्ति सी छायी ।
धन्यवाद दे चमचे को खामोश हो गये नेता ,
हम सब केवल भूँक रहे , ज्यों हाथी को कुत्ता । "
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