सोमवार, 17 सितंबर 2012

जनता मरनें के लिये , नेता हँसनें के लिये -- ।



           देश में इस समय तमाम विचित्र किस्म के लोगों को देश के महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया गया है , जिनमें प्रधानममंत्री जी , रिमोट सिस्टम से चलते हैं , रक्षामंत्री बैटरी से चलते हैं , वित्त मंत्री साहब धक्का देनें पर चलते हैं और गृह मंत्री चाभी वाले खिलौनें के माफिक चलते हैं । चूँकि इनमें से कोई भी खिलौना स्वयं चलनें की हैसियत नहीं  रखता है , इसलिये इन खिलौनों  द्वारा किये गये किसी भी हरकत पर ऊँगली उठानें से पहले सोचना चाहिये कि , क्या आपके बुरा भला कहनें , गाली देनें , उसके हटानें की माँग कर देंनें से सब ठीक हो जायेगा , कतई नहीं ।  कुछ  समय से इन खिलौनों नें स्वतः एक चीज करना सीख लिया है , जब कोई मसला आता है तो ईशारा कर देते हैं कि जिसके हाथ में हमारी डोर है , उससे पूछकर ही तो अभिनय किया था , क्या कोई गलत हरकत हो गई ?
            ऐसे ही देश की एक महान् पार्टी के नाट्य-शाला के कलाकार हैं श्री शिन्दे जी , जिनके सत्य वचन से देश की जनता को उनका ऋणी होना चाहिये , क्योंकि उन्होनें देश की जनता पर हास्य-रस से भरा कटाक्ष करते हुए कहा कि - जनता जैसे बोफोर्स घोटाले को भूल गई , वैसे ही कोयला घोटाला को भी भूल जायेगी । 
             हम शिन्दे साहब की बात को गलत नहीं ठहराते हैं , लेकिन उनकी बात से जाहिर हो गया कि हाई कमान के यहाँ उनकी अच्छी ट्रेनिंग नहीं हुई है । कमाल तो तब हो गया जब , शिन्दे जी के बयान पर , कूड़े के ढेर में पड़े श्री दिग्विजय सिंह जी नें उनके बचाव में कुछ कहा , यद्यपि उसे किसी नें तवज्जो हीं नहीं दी , क्योंकि यदि देखा जाये तो सारे खिलौनों में सबसे बुरी हालत इसी बेचारे की है । 
             देश में इस समय , भ्रष्टाचार और घोटाले का बाजार  जिस प्रकार चल रहा है , उससे ऐसा लगता है कि सरकार जल्द ही उसे वैध घोषित करेगी और जो कोई उसमें लिप्त नहीं रहेगा या सहयोग नहीं करेगा उसे कठोर दण्ड दिया जायेगा । 
            और फिर कहीं दूर शिन्दे जी और दिग्गी राजा ठहाका लगाकर ,कह रहे होंगे - हँसना स्वास्थय के लिये सर्वोत्तम टानिक है और जनता पर हँसना सबसे सरल है , क्योंकि वह भूलनें की बीमारी से ग्रस्त है । 
             सच या झूठ मुझे नहीं पता लेकिन बुजुर्गों के मुँह से सुना है , देश के कुछ नवाबों की बेगमों का एक खास शौक हुआ करता था - अपनें महल की खिड़की से प्रतिदिन नदी में डूब कर मरते हुए लोगों को देखना , और प्रसन्न होना । 
                                 जिन्दगी का मकसद तो , पहले भी ना था , 
                                 चलो , गरीब काम तो आया तुझे हँसानें में  ।
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शनिवार, 15 सितंबर 2012

देश वासियों की सहन शक्ति को नमन -- ।

    

        
         केन्द्र में किसकी सरकार है पता करना मुश्किल है , मनमोहन जी तो कतई सरकार नहीं चला रहे हैं । बीजेपी वालों का विरोध भी केवल राजनीतिक लाभ उठानें के लिये ही प्रतीत होता है , जनता का दर्द समझनें वाला कोई नेता देश में नजर नहीं आ रहा है । अन्ना जी के साथ जनता इसलिये जुड़ी कि शायद देश में कोई बड़ा परिवर्तन हो लेकिन उनके जन आन्दोलन का अन्त जिस प्रकार से हुआ , उसके बाद देश में एक अजीब सा निराशावाद का दौर शुरु हो गया है , जनता बेबस है , और मुलायम सिंह उसी में प्रधानमंत्री बननें का ख्वाब देख रहे हैं ।
          मँहगाई बढ़नें से उन देश के तमाम हरामखोरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़नें वाला है जिनको अपनीं जेब से पैसा खर्च करके दुकान से जाकर सामान नहीं खरीदना पड़ता है । किसी भी हराम-खोर का पाँच सितारा होटल में रहना और खाना बन्द नहीं होगा , मुफ्त में हवाई जहाज से विदेश का दौरा लगाना बन्द नहीं होगा , केवल जनता त्राहि-त्राहि कुछ दिन चिल्लायेगी फिर सब कुछ शान्त हो जायेगा ।
          पिछले कुछ माह से केन्द्र में बैठी सरकार नें कई बार पेट्रोल आदि के दाम बढ़ाये ,  कुछ नेताओं नें उसका  विरोध एक राजनीतिक- रस्म के तर्ज पर किया , सरकार जानती है कि जनता की तरफ से जो लोग बोलनें वाले हैं उनमें भी तमाम छेद हैं और वे केवल रस्म-अदायगी के तौर पर केवल विरोध का अभिनय ही करेंगे । अभी डीजल , केरोसीन , रसोई-गैस आदि के दाम बढ़ाये गये , कोयले की कालिख से रंगी हुई , महा-घोटालों का ना टूटनें वाला रिकार्ड बनानें को तैयार सरकार नें देश में विदेशी बाजार खोलनें का फरमान जारी कर दिया । ये सारे घटनाक्रम इतनी तेजी से हुए कि जनता को सम्भलनें का अवसर ही नहीं मिल सका । जनता किन चीजों का विरोध करे , जनता को खुद भी समझ में नहीं आता ।  जनता की आवाज कैसे कोई सुनेगा जब देश का प्रधान-मंत्री ही कहता हो कि लड़ते-लड़ते जायेंगे , ये देश के दुर्भाग्य की पराकाष्ठा है ।
           प्रमुख विपक्षी दल को कुछ आशंका के साथ आशा है कि जनता चुनाव में सरकार के खिलाफ वोट देगी , यदि पूर्ण सुनिश्चित हो जाये कि जनता उसे अगले चुनाव में वोट देगी तब वह जनता की आवाज बनेंगे , ममता बनर्जी की औकात भी जनता और सरकार समझ चुकी है । देश की लगभग सारी पार्टियाँ पहले राजनीतिक लाभ की बात सोचती हैं फिर जनता और देश के बारे में सोचती हैं । देश की जनता की सहन-शक्ति को सहज ही नमन करनें को मन करता है । आखिर क्यों ना हो -
                           " पहनी थी जो बेड़ियाँ सदियों पहले ,कभी हमनें 
                             शामिल कर लिया है आज उन्हें गहनों में हमनें । "
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गुरुवार, 13 सितंबर 2012

हिन्दी दिवस की आवश्यकता नहीं ---



                  दुनिया के साथ-साथ हमारे देश में भी कई तरह के दिवस मनाये जाते हैं , उनमें ज्यादातर ऐसे दिवस होते हैं जो वार्षिक उत्सव की तरह मनाये जाते हैं और तमाम लोग जो संकल्प आदि उस दिन लेते हैं सब कुछ अगले कुछ घन्टों में भूल जाते हैं । ऐसे ही एक दिवस का नाम है हिन्दी दिवस जिसे हम १४ सितम्बर को  मनाते हैं , नहीं- नहीं सेलीब्रेट करते हैं , सरकार का काफी पैसा उसके सेलीब्रेशन में खर्च होता है , जैसे १५ अगस्त और २६ जनवरी के दिन खर्च होता है । हिन्दी बोलनें वालों को कीड़ा- मकौड़ा समझनें वाले आज दिन भर मातृ-भाषा हिन्दी पर खूब झूठा भाषण देंगे और देश के सारे कार्य हिन्दी में करनें और किये जानें पर जोर देंगे । 
                 हिन्दी के साथ-साथ अँग्रेजी भाषा के शब्दों को मिलाकर बोलनें में कोई दिक्कत नहीं है जब अगला उसे समझ रहा हो , लेकिन हमारे देश में तमाम ऐसे लोग है जो इस ग्लानि में जी रहें हैं कि इनका जन्म भारत में या हिन्दी भाषी क्षेत्र में क्यों हुआ , वैसे लोग नौकरों , चपारासियों , सफाईकर्मियों को भी अँग्रेजी में डाँटना पसन्द करते हैं , यद्यपि वैसे अँग्रजी-दाँ की अँग्रेजी भाषा में पकड़ किसी अमेरिकी या ब्रिटेन के सब्जी बेचनें वाले , ड्राईवर , सफाईकर्मी और अन्य कम पढ़े लिखे व्यक्ति से भी कम हो सकती है । 
                मैंनें लोगों से सुना है कि , फिराक गोरखपुरी साहब कहा करते थे कि , भारत में केवल ढाई ( 2- 1/2) लोग ही अँग्रेजी जानते हैं जिनमें वे स्वयं , डॉ राजेन्द्र प्रसाद ( प्रथम राष्ट्रपति ) और आधा पं० जवाहर लाल नेहरु । 
                हम लाख मेहनत करके किसी विदेशी भाषा के सारे व्याकरण , सारे मुहावरे , सारे नियम ,सारे शब्दों को तोते की तरह भले ही रट लें , लेकिन अपनी मातृ-भाषा न होनें का कारण हम उसमें कभी भी पूर्ण पारंगत नहीं हो सकते । 
               हमारे देश के नियंताओं ने देश के जन्म के साथ ही , जो स्थिति पायी , उसमें उनके पास इतना समय ही नहीं था कि वे मातृ-भाषा के प्रश्न पर विचार कर सकें । जिस समय देश का प्रशासन भारतीयों के हाथ में दिया जा रहा था , देश की आन्तरिक स्थिति ठीक भी नहीं थी । परिणाम स्वरुप सम्पूर्ण गुलामी वाली व्यवस्था वैसी ही स्थिति में कायम रह गयी । जनता को पता ही नहीं चला कि वह कैसे पुनः गुलामी की मानसिकता में चली गई और एक नये प्रकार के शासक वर्ग का जन्म हुआ जो देखनें में तो भारतीयों जैसा प्रतीत होता था लेकिन भीतर से कतई भारतीय नहीं था । 
               परिणाम-स्वरुप , देश के सारे कानून , देश के सारे कार्यालयों , सारे संस्थानों की कार्य शैली वही रही जो ब्रिटिश काल में रही थी , कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ ना करनें की हिम्मत हुई । आज अगर देश के किसी भी मुख्य संस्थान में आप जाइये तो शायद ही वहाँ कहीं हिन्दी नजर आये । बाहर बोर्ड पर जो नाम लिखा होगा , उसपर हो सकता है शर्म वश या अन्य किसी अज्ञात कारण से हिन्दी में उस कार्यालय का नाम अंकित हो , वैसे ज्यादातर मामलों में आपनें देखा होगा कि देश के तमाम ऐसे बड़े संस्थान हैं जिनके नाम पहले अँग्रेजी में फिर हिन्दी में लिखे होते हैं । 
                  सच कहा जाये तो हम हिन्दी भाषा-भाषी ही , हिन्दी भाषा के असली दुश्मन हैं । सरकार नें राज-भाषा विभाग और कई अन्य कई संस्थान खोला और खोलनें में मदद भी दी उसमें हिन्दी भाषा के जानकार लोगों को रखा सरकारी पुस्तकें प्रकाशित करवायीं , लेकिन असली हिन्दी के जानकर होनें का दावा करनें वाले हमारे साहित्यिक भाईयों नें , अपनी सारी कुण्ठा , अपनें सारे छिपे हुए अज्ञान को जाहिर करते हुए , वैसी पुस्तकों में ऐसी कठिन संस्कृत-निष्ठ भाषा का प्रयोग किया कि उसके उच्चारण और अर्थ को समझनें में भी लोगों को दिक्कत आनें लगी । ऐसे लोगों के कारण ही हिन्दी भाषा को सन् १९४७ से लेकर कुछ साल पहले तक उपेक्षा झेलनी पड़ी है । मेरा तो यहाँ तक मानना है कि यदि  देवनागिरी लिपि भविष्य में लुप्त होनें के कगार पर आयी तो उसके जिम्मेदार भी वैसे ही कुण्ठाग्रस्त हिन्दी के तथा कथित विद्वान् होंगे , जिन्हें उस समय आत्म-गौरव  का अनुभव होता है जब कोई , उनके शब्दों का अर्थ नहीं समझ पाता है ।
                  बहरहाल देश में हिन्दी का महत्व स्वयं बढ़ा है और यह बढ़ता ही रहेगा । हमारी हिन्दी भाषा को , कमजोरों की भाषा , पिछड़ों की भाषा , अनपढ़ों की भाषा बतानें वाले , भी अब महसूस करनें लगे हैं कि "बिन हिन्दी सब सून " । हिन्दी भाषा के विकास का काम हमारे देश के युवा करेंगे , और कर रहे हैं । 
                   अन्त में मेंरा देश के तमाम नेता जी लोगों से और तमाम अधिकारियों व कर्मचारियों से सादर  निवेदन है कि , हिन्दी दिवस के साथ-साथ आप लोग आज ही यानि १४ सितम्बर को निम्नलिखित दिवसों को भी मनाये -
     १- बेईमानी नहीं करेंगे दिवस ।
     २- घोटाला नहीं करेंगे दिवस ।
     ३- विदेशों में काला धन जमा नहीं करेंगे दिवस ।
     ४- चुनाव में झूठा वादा नहीं करेंगे दिवस ।
     ५- जनता को परेशान नहीं करेंगे दिवस ।
     ६- देश से गद्दारी नहीं करेंगे दिवस ।
        चूँकि सारे दिवस केवल एक दिन के लिये होते हैं , अतः अगले दिन आप फिर पुरानें धन्धे में लग सकते हैं ।
        पचासों अन्य प्रकार के दिवस लिस्ट में हैं ,  लेकिन उनका जिक्र फिर कभी करूँगा -
             लेकिन एक दिवस मनानें के लिये मैं जरुर अनुरोध करता हूँ -" देश भक्ति दिवस " देखता हूँ देश में कबसे मनाना शुरू होगा ?
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खेदू को प्रलय का इंतजार .



आज पाँच दिन बाद नजर आ रहे हो खेदू , कहाँ थे ?
लल्लन भाई , थानें का दरोगा , मुझे तिरछी निगाह से रोज देख रहा था , इसीलिये ।
तिरछी निगाह के देखनें भर से तुम भूमिगत हो गये खेदू , पकड़ लेता तब ?
पकड़नें की ताक में था , लोगों से कहा भी था कि अन्ना और बाबा के आन्दोलन में सक्रिय रहा है, देश-द्रोही है ।
तो तुम छिप गये ताकि वह तुम्हे देश-द्रोही ना मान ले , है ना ?
अब मामला शान्त हुआ है तो राहत मिली है ।
अब क्या विचार है ?
कुछ नहीं बस , घर पर बैठकर समाचार चैनल ब्लैक & व्हाईट टी वी देखूँगा ।
तब तो तुम्हारे जैसे बहुत से लोग जो भीड़ बनते हैं , किसी भी धरना प्रदर्शन में नहीं रहेंगे ?
ना रहें , देश-द्रोही कहलानें से अच्छा है कि घर में बीबी बच्चों के साथ रहा जाये ।
खेदू , तुम ऐसा सोचोगे तो देश का क्या होगा ?
हमी ठेका लिये हैं , क्या , देश सुधारनें का ?
तुमसे हम मोहल्ला वालों की बड़ी उम्मीद थी , खेदू भाई ।
क्या चाहते हो , लल्लन भाई , मैं भी कसाव के साथ वाले बैरक में चला जाऊँ ।
अपनें शहर के तमाम आफिस के बाबू और अधिकारी खुलेआम दाम लेते हैं , उन्हें कौन सुधारेगा ?
उन्हें सुधारनें के लिये , भगवान को एक साथ बीसों अवतार लेनें होंगे , लल्लन , समझे ।
अगर ईश्वर अवतार नहीं हुआ तो क्या सब कुछ ऐसे ही होता रहेगा ?
तुम मुझसे ही ये सवाल क्यों पूछ रहे हो , मैं कोई दिग्विजय सिंह हूँ क्या ?
नहीं खेदू भाई , तुम्हारा  मोहल्ले में बहुत सम्मान है , उन्हें कौन जानता है ।
देखो लल्लन , देश की दशा के बारे में पुरी दुनिया में गलत मैसेज जा रहा है कि हम सब भ्रष्ट और बेईमान हैं ।
इस गलत मैसेज को सही मैसेज में कैसे बदला जाये खेदू भाई ।
उस घड़ी की प्रतीक्षा करो जब संसार में प्रलय आ जाये ।

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मंगलवार, 11 सितंबर 2012

ईमानदार पार्टी क्यों असफल रहेगी - चुनाव एक खोज ।



         
                    आपनें धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नामक मित्रों की पुरानी संस्कृत कथा सुनी होगी या पढ़ी होगी । वे दोनों आपस में अच्छे मित्र थे , मित्रता के कारण का उल्लेख कथा में नहीं दिया है , लेकिन प्रायः पापी का पुण्यात्मा , दुष्ट का सज्जन , कुरुप का रुपवान , झूठे का सच्चा , मित्र देखनें को मिलता है । मेरा एक मित्र जो सामान्य रुप रंग का था , वह किशोरावस्था से लेकर विवाह होनें तक कुरुप और काले मित्रों के साथ ही रहना पसंद करता था , उसके घर वाले उसकी इस आदत पर हमेशा बिगड़ते थे लेकिन असली कारण तो हम मोहल्ले के दोस्त और वह जानता था , लेकिन बहुत उछल कूद के बाद बेचारे को वर्तमान भाभी जी मिली , जिनके साथ वह किसी आवेदन पत्र के साथ लगे , संलग्नक की भाँति ही लगता है । वैसे भी धन (प्लस) और ऋण ( माइनस) के संयोग के बिना कुछ भी संभव नहीं है । प्राचीन कथा के अनुसार , दोनों परदेश जाकर काम करनें लगे और धन कमाकर वापस घर लौटनें लगे । पापबुद्धि नें धर्मबुद्धि को सलाह दी कि धन को एक विशाल वृक्ष के नीचे छिपा दिया जाये । धर्मबुद्धि तैयार हो गया , और दोनों नें अपना सारा धन पेड़ के नीचे दबा दिया । कथा में आगे , पाप बुद्धि सारा धन स्वयं हड़प लेता है  बाद में उसको परास्त होना पड़ता है और धर्मबुद्धि की जीत होती है । 
                       हमारे आर्यावर्त देश में चुनाव का मौसम शुरू हुआ । कुछ दिन पहले जन जागरण का कार्यक्रम चलाकर जनता को समझा दिया गया कि , किसी भी बेईमान , भ्रष्टाचारी , घोटालेबाज को वोट नहीं देना है । हर पार्टी नें अपनें-अपनें योद्धाओं को मैदान में उतारा । मेरे क्षेत्र में मुख्य जंग जिन दो महारथियों के बीच थी वे दोनों  बेईमान और घोटालाबाज पार्टी के उम्मीदवार थे , वे दोनों ही  भ्रष्टाचार , घोटाला और लूट के खेल के श्रेष्ठतम् खिलाड़ी थे , कोई किसी से कम नहीं था , एक तरफ नागनाथ तो दूसरी तरफ साँप नाथ , एक तरफ अर्जुन तो एक तरफ कर्ण । जनता भी बकिया उम्मीदवारों की कोई चर्चा नहीं करती थी ।
                     तीसरे नम्बर पर चर्चा होती थी ईमानदार पार्टी के उम्मीदवार की । उसका नाम कम ही लोग जानते थे । १०-१२ लोगों के साथ वह भी पैदल अपनें प्रचार में निकलता था । कोई आडम्बर या दिखावा नहीं । हमारे मोहल्ले के खेदू , मुख्य चुनाव संचालक थे । साथ में नागेश्वर बाबू , पोस्टमास्टर साहब , जग्गी बाबू , संगम लाल , वर्मा जी भी शिफ्ट-वाईस  घरेलू काम निपटानें के बाद प्रचार में लग जाते थे । महिला मोर्चा की कमान गौरी बाबू की पत्नी के हाथ में थी , जबकि गौरी बाबू स्वयं , दोनों महारथियों में से एक के प्रचार में लगे रहते थे , और गौरी बाबू का बड़ा बेटा दूसरे महारथी के प्रचार में जी जान से जुटा था , ऐसा लोकतांत्रिक परिवार शायद ही देश में कहीं और होगा ।
                    एक दिन खेदू  मेरे पास आया , खेदू चुनाव प्रचार का मुखिया था , उसके चेहरे पर उदासी देखकर मैनें कारण पूछा । खेदू नें अनमनें भाव से बताया - कि जनता के बीच हमारा क्रेज तो है लेकिन , जनता कहती है कि  ईमानदार पार्टी के लोग आज के युग में फिट नहीं बैठते । जनता के बीच बैठी इस धारणा को तोड़ना पड़ेगा खेदू भाई , मैनें समझाया । खेदू बोला - बड़ा कठिन है , लल्लन भाई , जनता को बेईमान और घोटालेबाजों के बीच रहनें की आदत पड़ गयी है । शुरु-शुरु में तो जनता अन्य पार्टी वालों को  गाली दे रही थी , लेकिन अब जनता सभी को समान रुप से देख रही है । समान रुप से देखनें में क्या बुराई है , मैनें पूछा ।
                   खेदू नें समझाना शुरु किया । देखो लल्लन भाई समस्या बड़ी ही गम्भीर है । हमारे उम्मीदवार के पास लोग अपनी-अपनी समस्या लेकर आते हैं जिनमें कुछ व्यक्तिगत और कुछ सामूहिक होती हैं । समस्या का निदान कैसे हो इस पर हम लोग विचार करते हैं फिर किसी आफिस में या अधिकारी के यहाँ जाते हैं तो वहाँ हमारे उम्मीदवार को कोई महत्व ही नहीं देता , जब किसी अधिकारी या कर्माचारी को पता चलता है कि हम ईमानदार पार्टी के लोग हैं तो  वे मुस्कराकर समस्या सुनते हैं और फिर उस कार्य से सम्बन्धित प्रक्रिया के बारे में  बताया जाता है और उसके अनुसार ही काम होनें के बारे में बताया जाता है , हमारा उम्मीदवार नियम और कानून के पालन की सलाह देता है , जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारे ईमानदार पार्टी का उम्मीदवार किसी का भी कोई कार्य नहीं करा सका । वही दूसरी ओर , बेईमान और घोटाला पार्टी के उम्मीदवारों का अदना से चेला भी , उसी आफिस में जाकर वैसा ही कार्य , कुछ ही मिनट में कराकर ले आता है । जनता कहती है , हमारा काम जो करवायेगा हम उसी को वोट देंगे ।
                     तुम लोग उस कार्यालय या अधिकारी के पास नहीं गये , अपना विरोध करनें , खेदू भाई ? खेदू बोला- विरोध तो किये लेकिन शान्ति के साथ , हम लोग और हमारा उम्मीदवार नियम और कानून का पालन करनें के प्रति वचनबद्ध हैं ।
                      खेदू तुम्हें बुरा लगे या भला , एक बात कहे देते हैं - तुम्हारा उम्मीदवार और तुम्हारी पार्टी के प्रति लोगों की पूरी सहानुभूति हो सकती है , लेकिन जब वोट देना होगा तो जनता उसी उम्मीदवार को वोट देगी  जिसका पूरा जीवन ही अपराध के सुन्दर कृत्य से सदैव आलोकित रहा हो और जो दबंगई के साथ अपना और अपनें चमचों का कार्य करवानें में माहिर होता है और कानून जिसके सामनें बेबस हो जाता है । कोई लाख घोटाला करे , देश को बेचे , आतंकवादियों को पनाह दे , जनता को इन सबसे कोई सरोकार नहीं है ।
                     तो क्या करें लल्लन भाई - खेदू नें पूछा  ।
                   मेरी मानो खेदू भाई , उन्हें राय दो कि वे अपना नाम वापस ले लें और इस राजनीति के क्षेत्र को उन्हीं  लोगो के पास रहनें दो जिनके शरीर पर बड़े-बड़े , काले-काले चकत्ते हो गये हैं ।
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बुधवार, 5 सितंबर 2012

द वाशिंगटन पोस्ट क्या जानें ।


 प्रिय देश वासियों ,    
                  मैं यह पत्र आप सभी को लिख रहा हूँ , जिनको पढ़ना होगा ,पढ़ेंगे , जिनको न पढ़ना हो न पढ़े । मेरे पत्र को मेरा सुसाईडल नोट मत समझियेगा , क्योंकि मुझसे बेहया ना तो इतिहास में कोई हुआ है ना होगा । आज का समाचार पढ़ा , दुःख हुआ कि मुम्बई मेट्रो पुल का बन रहा एक हिस्सा गिर गया , जाहिर बात है उसके निर्माण में घोटाला अवश्य हुआ होगा , मैं जानता हूँ कि ठेकेदार को कितना परसेंट सब जगह देना पड़ा होगा लेकिन सारा दोष ठीकेदार के माथे पर और किसी इंजिनियर पर लगेगा किन्तु असली माल चाभनें वालों का कुछ भी नहीं होगा , देश के तमाम भवन , पुल आदि बस भगवान भरोसे ही खड़े हैं । 
                 अब बात करते हैं , उन हरामखोरों पेपर वालों की जो मुझे नकारा , पालतू , असफल , और ना जानें किन-किन उपाधियों से नव़ाजते रहते हैं , और आप भारत देश की जनता , उनका समर्थन करते हैं , मैं जानता हूँ कि मैडम की पार्टी जिसे लोग काँग्रेस के नाम से जानते हैं , उसमें भी तमाम लोग हैं जो रुमाल मुँह में रखकर मेरे ऊपर कमेंट करते हैं , मुझे बहुत पीड़ा होती है जब मैडम कि पार्टी वाले भी वैसे पेपर वालों के खिलाफ कुछ नहीं कहते ।
                उन मूर्ख अखबार वालों से कोई जाकर पूछे कि बताओ , जब कोई बच्चा स्कूल में गया ही ना हो तो वह पढ़नें में कमजोर कैसे कहलायेगा , कोई पान वाले को कैसे कह सकता है कि मिठाई ठीक नहीं बेचता , टमाटर के पौधे को कोई कैसे कह सकता है कि वह सेब का फल देनें में असफल रहा , कोई गधा कुत्ता ऐसा भौंकनें में कैसे सफल हो सकता है ?  आप खुद सोचिये , जब मैं कोई कार्य या फैसला स्वयं नहीं करता तो , मैं कैसे एक असफल प्रधान-मंत्री हो सकता हूँ ।
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रविवार, 2 सितंबर 2012

अजब मन्नू भईया का गजब इस्तीफा ---- ।


अरे अरे , बड़ा हँसे जा रहे हैं , क्या  बात है ?
तुम कहाँ से आ गये लल्लन ।
आप इतना जोर से हँस रहे हैं कि आवाज दूसरे देश तक जा रही है ।
जानते हो मैं क्यों हँस रहा हूँ ?
पता होता तो आप के यहाँ काहे आता , हमें तो लगा कि कहीं आप दिमागी ---- ।
सारे देश वालों को पागल कर दूँगा , तुम मेरे दिमाग पर उँगली उठाते हो ।
छोड़िये ना , हँसनें का कारण बताइये ।
देखो ये बीजेपी वाले , उनके साथी और रामदेव वगैरह मुझसे इस्तीफा माँग रहे हैं ।
सच कहें तो , देश की जनता की भी राय यही है ।
तुम और जनता क्या मुझे प्रधानमंत्री बनाये हो ?
हम सभी लोग जानते हैं कि आप को मैडम नें यह कुर्सी दी है ।
तब मैडम की यह कुर्सी है , देश की जनता से या किसी पार्टी से इससे क्या मतलब है ?
लेकिन दुनिया तो यही जानती है कि देश के प्रधानमंत्री आप ही हैं ।
दुनिया क्या जानती है मुझे उससे क्या लेना देना ।
तो आप इस्तीफा नहीं देनें वाले हैं ?
इस्तीफा क्या दुकान का सामान है कि निकाल के दे दिया ?
आप इस्तीफे का एलान कर दीजिये , बस लोग खुश हो जायेंगे  ।
देखते नहीं बीजेपी वाले , इसी बात पर हल्ला कर रहे हैं कि इस्तीफा दो ।
ना-ना-ना , बीजेपी वाले चालाकी कर रहे हैं , आप को नहीं पता ?
कैसी चालाकी ?
यही कि वे जानते हैं कि  वे लोग इस्तीफा मागेंगे और आप देंगे नहीं , और जनता को वे सब गलत मैसेज देंगे ।
तुम्हारा मतलब वे लोग इस्तीफा माँगनें का नाटक कर रहें हैं ?
सही कह रहें हैं आप , उनकी प्लानिंग है कि आप के रहते हुए आपकी पार्टी स्वतः कमजोर हो जायेगी ।
मैं कैसे अपनी पार्टी को कमजोर कर सकता हूँ , जबकि मेरे पास ना तो हाथ है ना पैर ,ना ही मुँह में जुबान ।
लेकिन , जनता के सामनें तो वे आप पर ही निशाना साधते हैं ।
देखो , वे सचमुच मूर्ख हैं , आज तक कोई खरोंच भी नहीं लगी मुझे , निशाना गलत लगाते हैं , वे लोग ।
मतलब जनता को हम यही मैसेज दे दें कि आप प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दे रहे हैं ।
जनता जानती है कि हम अपनी कुर्सी किसके आदेश से त्याग सकते हैं ?
वह आदेश मैडम से अभी क्यों नहीं ले लेते ?
मैडम को शुभ घड़ी और जनता के मूड के सही होनें का इन्तजार है ।
मान लीजिये अभी आज-कल में आप टपक जायें तब , देश का कौन प्रधान-मंत्री बनेगा ?
मैं टपका हुआ ही हूँ , राहुल बाबा के सिंहासन पर बैठनें तक मुझे फाईनली टपकनें नहीं दिया जायेगा ।
मतलब ये हुआ कि ना तो फाईनली आप टपकियेगा , ना ही सिंहासन खाली कीजियेगा ?
वह सिंहासन राहुल बाबा के लिये होगा , मेरे लिये वह कुर्सी या पद ही कहा जाता है ।
मैं आपके कहनें का मतलब नहीं समझा ?
क्यों कि प्रधानमंत्री के पद पर मेरी नियुक्ति हुई है और राहुल बाबा का उस पर पैतृक अधिकार है ।
मतलब आप अपनी कुर्सी निकट भविष्य में नहीं खाली कर रहे हैं ?
जिस मालिक नें मुझे सिंहासन की देखभाल के लिये नियुक्त किया है  उसके आनें तक मैं हटनें वाला  नहीं हूँ ।
आप तो कुर्सी और सिंहासन के चक्कर में हमें कन्फ्यूज कर दिये हैं ।
तुम ही नहीं पूरा देश ही कन्फ्यूज है , लेकिन मैं देश को पानी पिलाकर ही कुर्सी से उतरूँगा ।
फिर भी कब तक कुर्सी छोड़नें या इस्तीफा देनें का मन बनाये हैं ?
जब जनता कराह उठे और चिल्लाये कि राहुल बाबा को बुलाओ ,  तब मैं मैडम के आदेश से ---- ।
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