रविवार, 15 जुलाई 2012

देश के लोगों राजतंत्र का अन्त न हो --।



हम आपके विचार से सहमत हैं और पूरा देश भी झेलनें के लिये तैयार है ।
मैंनें तो कोई विचार कई दिन से प्रकट ही नहीं किये ।
आपको देख कर देश के लोग समझ जाते हैं कि आपके नस-नस में क्या चल रहा है ।
देखो मैं इन दिनों राष्ट्रपति के चुनाव में लगा हूँ ।
आप प्रणव दादा के पक्ष में हैं या विपक्ष में ?
मुझसे ऐसे सवाल करनें की हिम्मत कैसे की तुमनें ?
गुर्राइये नहीं , हम उस बारे में नहीं बल्कि कुछ खास विचार आपके साथ शेयर करना चाहते हैं ।
कोई और देश में नहीं मिला , विचार शेयर करनें को ?
देश हित के मैटर पर आम जनता से तो राय विचार नहीं हो सकता ना ।
देश हित के लिये , रामदेव बाबा , अन्ना , और ना जानें कौन-कौन है , फिर तुम मेरे पास क्यों आये ।
मैं जिस देश हित की बात करनें आया हूँ , उसके वे लोग एकदम खिलाफ हैं ।
मैं पहले से जानता था कि वे लोग केवल देश का अहित चाहते हैं , मैडम का भी यही विचार रहता है ।
मैं जिस मैटर को आपके साथ शेयर करनें आया हूँ , उसकी शुरुआत तो आप ही कर दिये ।
हें ---- हें --- , आखिर मैं देश का --------- ?
ठीक कहा ।
हाँ , तुम देश के भले के बारे में ----- ।
हमारे देश की जनता आज तक , अग्रजों के गोरे-गोरे चेहरे को भुला नहीं पायी है ।
तो मैं क्या कर सकता हूँ ?
आपको लम्बा समझाना पड़ता है तब समझ में आता है ,  मैडम की बात तुरन्त कैसे समझ लेते हैं ।
तुम कहना क्या चाहते हो ?
भले ही वे लोग हमें गोली मारते रहे हों , पेड़ पर लटका देते हों , लेकिन राज करना तो उन्हीं को आता था ।
हम भी यही कोशिश करते हैं कि लोगों  को, हमारे शासन और हमारे अँग्रेंज भाइयों के शासन में फर्क ना मालूम हो ।
लेकिन कुछ को छोड़ दिया जाये तो , आप लोग तो कालों में गिनें जाते हैं , देशी ही लगते हैं , चाहे कितना बनें ।
तुम अपना आईडिया, क्यों नहीं बताते ?
मेंरी शर्त है कि उसे आप मैडम तक पहुँचायेंगे , तब मैं बताऊँगा ।
मैडम तक जानें वाला आईडिया होगा तो , उनके आदमी के हाथ पहुँचवा दूँगा ।
क्या कहे , आप सीधे नहीं जा सकते ?
चुप रहो नौकरी से निकलवाना है, क्या ?
ये क्या बक-बक करनें लगे , आप नौकरी में नहीं हैं भाई , आप तो देश  ----- ।
सॉरी भूल जाता हूँ , कभी-कभी । जो कह रहे थे , उसे कहो ना ।
पता नहीं , मैडम तक मेरी बात आप पहुँचा पाइयेगा या नहीं , फिर भी सुनिये ।
सुनाओ ।
हम लोग विचार किये हैं कि , इंगलैण्ड की महारानी को , अपनें देश की महारानी घोषित कर दें , और लोकतंत्र को -- ।
जनता तैयार नहीं होगी , और यदि देश में ही आप्शन हो तो ?
देखिये , आप लोग कितना भी क्यों ना हो , डुप्लीकेट नजर आयेंगे , आप लोग अँग्रेज नहीं लगते ।
तुम एकदम मूर्ख हो , जिस चीज को तुम ज्ञानी बनकर हमें पढ़ानें आये हो ना , उसमें हम P.H.D. हैं , समझे ।
मतलब ?
तुमको दिखायी नहीं देता कि देश में लोकतंत्र है या राजतंत्र , महारानी के आदेश का पालन होता है कि नहीं ।
इंगलैण्ड की महारानी का आदेश हमारे यहाँ कहाँ आता है ?
मूर्ख हो , इंलैण्ड की महारानी के अधिकार दिखावटी हैं , मैं वास्तविक महारानी की बात कर रहा हूँ ।
हम तो अभी तक समझ रहे थे कि देश में लोकतंत्र चल रहा है, और देश १९४७ में आज़ाद हो चुका है ।
तुम जनता के दूत ना होते तो -- अभी फेंकवा देता ।
मेंरी जान बख्शी जाये , दुबारा हिम्मत नहीं करुँगा , एक बात की जानकारी दे देते तो मेरा जन्म सफल हो जाता ।
मैंनें सुना है , कि हर राजवंश का नाम होता है , जैसे गुलाम वंश , लोदी वंश , तुगलक वंश , मुगल वंश आदि ।
तो , देश में किस वंश का शासन है यह जानना है , तुम्हें , क्यों ?
जी ---- हाँ --- ।
अभी हम लोग खुद भी सोच में हैं कि , इस राजवंश का नाम क्या रखें , महारानी ही अन्तिम फैसला  करेंगी ।
हम दो चार नाम सजेस्ट करें , यदि इजाजत हो तो बतायें जो पहले से पापुलर हैं ।
शर्म नहीं आती , उस बारे में सजेस्ट करते हुए जिसपर फैसला महारानी को लेना है ।
शर्म तो आ रही है लेकिन करें क्या ?
मैं बताता हूँ --
              " तुम अपनी जान की कुर्बानी देकर भी लोकतंत्र को देश की सीमा के भीतर मत घुसनें देंना , और जनता से अपील करना कि देश से राजतंत्र का अन्त ना होनें पाये । "

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मंगलवार, 10 जुलाई 2012

कहानी --- महानगरीय ईश्क की ---


       महानगरीय ईश्क और --------- 
            जिस घटना का जिक्र मैं करनें जा रहा हूँ, वह घटना उस समय की है , जब गाँव का आदमी दिल्ली कमानें जाता था तो लोग उसे सावधान करते थे कि वहाँ देश भर के शातिर किस्म के लोग रहते हैं जो सीधे-सादे लोगों को ठग लेते हैं, सावधान होकर रहना।        
             लेकिन अब दिल्ली पहले वाली दिल्ली नहीं रही और देश के तमाम शातिर किस्म के लोग दिल्ली न जाकर अपनें ही इलाके में अपना व्यवसाय कर सुखी हैं ।
            मेंरा एक मित्र किशोरावस्था से कुछ ऊपर हुआ तो उसके अन्दर अपनें पैरों पर खड़े होनें की भावना नें हिलोरें मरना शुरु किया । वह अपनें एक बाल-मित्र के यहाँ जानें की योजना बनाकर दिल्ली गया । वहाँ उसके साथ क्या-क्या घटना और दुर्घटना हुई, उसनें विस्तार से मुझे सुनाया । मैंनें उसे वचन दिया कि मैं उसके साथ घटी घटना किसी को नहीं बताऊँगा , सो मैनें किसी को उस घटना के बारे में नहीं बताया लेकिन उस घटना को लिखूँगा नहीं , ऐसा वचन मैनें उसे नहीं दिया था । अतः लेखन के माध्यम से उसकी व्यथा-कथा को ज्यों का त्यों आपके समक्ष रख रहा हूँ ।
             " बबुआ का पत्र मिलते ही मैं और अधिक विलम्ब नहीं करना चाहता था , यद्यपि उसनें मुझसे दिल्ली आनें का कोई स्पष्ट आग्रह नहीं किया था , वैसे भी आग्रह की कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि बबुआ मेरा बाल-सखा था, इसलिये औपचारिकता जैसी कोई चीज भी नहीं थी । जैसे-तैसे पैसों का जुगाड़ कर मैंनें दिल्ली का टिकट कटाया । अपनें गाँव से विदा करनें और मुझे सम्मान के साथ स्टेशन तक छोड़नें के लिये मेरे कई मित्र भी साथ में स्टेशन आये । ट्रेन आई और मैं अपनें मित्रों से विदा लेकर दिल्ली जानें वाली खचाखच भरी ट्रेन की बोगी में घुस गया।
            दोपहर के आस-पास मैं इस महानगरी के प्लेटफार्म पर खड़ा होकर मानव योनि में पैदा करनें के लिये पहली बार भगवान को धन्यवाद दे रहा था । मैं प्लेटफार्म पर खड़े लोगों, आस-पास नजर आ रही सारी चीजों को ध्यान से देखकर आत्मसात करता जा रहा था ताकि मेरे गाँव का कोई आदमी दिल्ली के बारे में पूछे तो उसे सारी जानकारी मैं दे सकूँ ।
              मैं धीरे-धीरे चलते हुए,प्लेटफार्म की सारी चीजों को दिमाग में भरते हुए प्लेटफार्म से निकल कर बाहर आया । आटो वाले, रिक्शा वाले सभी मेरे पास आकर सम्मान पूर्वक पूछ रहे थे- सा'ब कहाँ जाना है । मैं अपनें मित्र बबुआ के पता वाला कागज दिखाता तो वे लोग मुँह बनाकर चल देते और दूसरे यात्रियों से पूछ-ताछ करनें लगते । किसी भी आटो या रिक्शे वाले नें मुझे अपनें मित्र के यहाँ जानें का रास्ता नहीं बताया ।
                मैं सोचकर परेशान था कि - हमारे गाँव में जब कोई अनजान आदमी किसी का पता पूछता है तो हम लोग उसे सही-सही रास्ता बताते हैं और कभी-कभी उसे उस जगह पहुँचा भी देते हैं। लेकिन यहाँ तो सब अजीब सा बेरुखा बर्ताव कर रहे हैं ।
                मेरे अन्तर्मन नें समझाया - यहाँ के सभी लोग अपनें काम मे लगे हैं, कोई खाली नहीं है। सब भाग रहे हैं, किसी के पास ठहरनें का वक्त नही है । यह सब देश, समाज और व्यक्ति के विकास करनें के लिये जरुरी भी है, तभी तो दिल्ली नें इतना विकास किया है ।  इंसानियत और भलाई जैसे शब्द का प्रयोग यहाँ कम ही होता है क्योंकि ये शब्द विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं ।  मैं अपनें अन्तर्मन की सलाह से सन्टुष्ट हुआ ।
              अब मैं इस कोशिश में लग गया कि कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो मुझे अनजान समझकर मूर्ख ना बनाये और बबुआ के मोहल्ले का सही-सही पता बता सके ताकि उसके घर तक पहुँचनें में मुझे आसानी हो जाये ।
                मैं तीस चालीस कदम आगे बढ़ा तो देखा कि चार-पाँच लोग घेरा बनाकर कुछ कर रहे थे ।  मुझे लगा कि वे लोग मुझे सही रास्ता बता सकते हैं । मैं धीरे से जाकर उन लोगों के करीब में खड़ा हो गया और प्रतीक्षा करनें लगा कि वे हमारी ओर ध्यान दें तब मैं उनसे बबुआ का पता ठिकाना आदि पूछूँ । वे लोग पूरी तन्मयता के साथ ताश खेल रहे थे। मेरी उपस्थिति का उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता देख मेंरा धैर्य जवाब देनें लगा, मैंने उनमें से एक खिलाड़ी के कन्धे को हल्के से छूकर कहा - भईया जरा ये पता बता सकते हैं । सभी खिलाड़ियों नें मेंरी ओर एक साथ घूर कर देखा , मैं सिटपिटा गया । मेरा विधिवत् निरीक्षण करनें के उपरान्त वे लोग पुनः पूरी एकाग्रता के साथ अपनें खेल में भिड़ गये । थोड़ी देर बाद मैनें फिर उन लोगों से विनती, प्रार्थना व निवेदन के भाव को एक साथ प्रदर्शित करते हुए अनुरोध किया । उन सभी के चेहरे पर क्रोध और तिरस्कार के सम्मिलित भाव प्रकट हुए, उनमें से एक खिलाड़ी नें मेरे हाथ से बबुआ के पते वाली पूर्जी ले ली । उसनें पूर्जी को आगे पीछे से देखा फिर मुझे हाथ के ईशारे से समझाया कि अभी बताता हूँ और इतमीनान के साथ फिर खेलनें में जुट गया । मैंने कुछ समय बाद अपनें अनुरोध को दुहराया तो उसनें मुझे उसी अन्दाज में समझाया, मैं चुप हो गया । उनका खेल अनवरत चलता रहा , आधा घन्टा और बीता, मैं अधीर होनें लगा , मैंने फिर आग्रह किया , उसनें पुनः उसी अन्दाज में चुप रहनें की सलाह दी । अब मुझे क्रोध आनें लगा । मैनें कठोर होकर कहा , मैं एक घन्टे से ज्यादा समय से आप लोगों से पता पूछ रहा हूँ , और आप लोग । उनमें से एक बोला , कैसा पता ? मैनें घबराकर कहा- वही पता जो कागज पर लिखा था । तभी दूसरा  बोला - ये ले अपनी चिट, आगे बढ़, किसी दूसरे से पूछ लेना । इसमें लिखा पता हमें नहीं मालूम । भाई साहब , शुरू में ही कह देते - मैंनें दबा हुआ रोष प्रकट किया । क्या खाक कह देते,  तुम्हें खुद ही तमीज होनी चाहिये कि जब कहीं चार-पाँच लोग आपस में बात कर रहे हों , या कुछ कर रहें हों, उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहिये - उनमें से एक नें मुझे तमीज सिखायी ।
                चूँकि, लोगों ने पहले से बता दिया था, इसलिये इस हादसे का ज्यादा असर मेरे ऊपर नहीं हुआ लेकिन मैं इस अनजानी नगरी में कितना असहाय हूँ इसका अहसास हो रहा था । थकान लग रही थी । मैं आगे बढ़ा । कुछ दूरी पर एक टी स्टाल देखा, कदम स्वतः उधर बढ़ गये । जेब देखा , पैसे सही सलामत थे । मेरा मूड खराब हो रहा था  । चाय का आर्डर देकर मैनें इधर-उधर निगाह घुमायी । लगभग बगल में ही फुटपाथ पर एक कपड़े की दुकान सजी थी। दुकान पर गठीले बदन का, भद्दा सा काला-कलूटा एक आदमी चिल्ला-चिल्लाकर कपड़े बेच रहा था । उसकी दुकान पर रंग-बिरंगी शर्ट, टी-शर्ट , पैन्ट आदि कपड़े थे जो बहुत सुन्दर लग रहे थे। इक्का-दुक्का लोग ही उस दुकान के आस-पास थे।  मैंने चाय समाप्त की, चाय वाले को पैसे दिये । चाय की दुकान के पास खड़े-खड़े ही कपड़े की दुकान पर सजे कपड़ों पर निगाह डालनें लगा ।
               मुझे देखकर वह कपड़े वाला जोर-जोर से चिल्लाकर बोलनें लगा - सा'ब , आठ-आठ रुपये , ले लो सब आठ-आठ रुपये में । मैं चौंक गया और सोचनें लगा कि इतनें अच्छे रंग-बिरंगे कपड़ों की कीमत तो हमारे गाँव के बाजार में बहुत ज्यादा होती है । अवश्य ही यह कपड़े वाला या तो पागल है या ये सारे कपड़े चोरी के हैं और यह दुकानदार जल्दी से उन्हें बेचकर भागनें के चक्कर में है । मेरे पास पैसे ज्यादा नहीं थे नहीं तो सारी दुकान ही खरीद लेता और ले जाकर अपनी गाँव की हाट में बेच देता । 
                अभी मैं कुछ सोच ही रहा था कि अकस्मात् ना जानें कहाँ से कई सुन्दरियाँ एक साथ प्रकट हो गईं और मुझसे पहले ही दुकान पर पहुँचकर कपड़ों का मोल-भाव करनें लगीं । वे सभी शहरी परिधान में परियाँ लग रही थीं जिनका दर्शन हमारे गाँव में दुर्लभ नहीं असंभव है । मेरे अन्दर कुछ उर्जा सी महसूस होनें लगी । थोड़ी देर पहले उन ताश खेलनें वालों द्वारा दिये गये सदमें से मैं अब लगभग ऊबर चुका था । मेरे कदम स्वतः कपड़े की दुकान की ओर बढ़नें लगे ।
             वह कपड़े वाला ससुरा अपनें गन्दे-गन्दे दाँतों को बार-बार बाहर निकाल कर हौले-हौले मुस्कराकर उन सुन्दरियों से मोल-भाव कर रहा था । पता नहीं क्यों मुझे उससे जलन होनें लगी थी । अब तो हद हो गई थी वह उनके हाथ पकड़-पकड़ कर कपड़े छँटवा रहा था और वे सब विरोध करना तो दूर मजे से खिलखिलाये जा रहीं थीं । शायद यहाँ की यही सभ्यता हो सोचकर, मैंनें अपनें बेचैन मन को धीरज बँधवाया । मुझे बरबस उस कपड़े वाले के भाग्य से ईर्ष्या होनें लगी । वह धर्मेन्द्र , जीतेन्द्र जैसे किसी फिल्मी हीरो जैसा होता तो एक बात थी । वह बेहूदा, एकदम काला कलूटा, गन्दा, शक्ल से किसी विलेन जैसा लगता था । किसी के भाग्य से ईर्ष्या नहीं करनीं चाहिये , मेंरी अन्तरात्मा नें मुझे समझाया ।
              तभी कपड़े वाले की आवाज आयी ,सा'ब - क्या सोच रहें हैं , इतनी देर से ? वह व्यवहार कुशल था , मेरी समझ में आ चुका था । मेंरी झिझक को समझते हुए बोला - सा'ब ,आठ-आठ रुपये में अपनीं मन पसन्द की चुन लो । सब एक से बढ़कर एक हैं, कहते हुए उसनें एक साथ उन सुन्दरियों तथा मेंरी ओर शरारत वाले अन्दाज से देखा और हौले से मुस्कराया । उसके कहनें की स्टाईल से मैं शर्मा गया किन्तु सुन्दरियों पर उसका कोई असर नहीं पड़ा उन सुन्दरियों  नें बेहद शरारत भरी नजरों से मेंरी ओर देखा और जोर से खिलखिलाईं । मेरे अन्दर गजब के भौतिक परिवर्तन होनें लगे - माहौल बेहद खुशनुमा हो गया था । दुकानदार और वे सुन्दरियाँ मेरे लिये अब अपरिचित से नहीं लग रहे थे ।  
              उन सुन्दरियों नें इतनी देर में बहुत से कपड़े उलट-पलट डाले लेकिन कोई कपड़ा पसन्द नहीं किया । कपड़े इतनें सस्ते और अच्छे लग रहे थे कि मैनें पक्का इरादा कर लिया था कि कुछ कपड़े मैं अपनें और घर वालों के लिये जरुर लूँगा । इतनें में सबसे आकर्षक लगनें वाली सुन्दरी नें मेंरी ओर इशारा करते हुए अन्य सुन्दरी से कहा - ये टी-शर्ट तो इन पर खूब जँचेगी । दूसरी बोली हट ये नहीं ये वाली । वे दोनों मेरे सांवले रंग रुप और कद काठी के अनुसार अपनें-अपनें चयन को वरीयता दे रहीं थीं । मैं उनकी बातों पर अपनी कान लगाये था लेकिन निगाह केवल कपड़ों पर डाल रहा था । आज मुझे अपनें ऊपर सचमुच गर्व हो रहा था । पहली बार अहसास हुआ कि मैं भी इस दुनिया में कुछ हूँ ।
               तभी दुकानदार बोला - आप लोग क्यों बहस किये जा रही हैं , सा'ब , आप दोनों की पसन्द की एक-एक पीस ले लेंगे, क्यों सा'ब । क्यों नहीं - क्यों नहीं, मैनें उसकी बात को बीच में लपकते हुए कहा । मैं अपनी पोजीशन खराब नहीं करना चाहता था, मैंनें तुरन्त सहमति दे दी । वे दोनों सुन्दरियाँ प्रसन्न हो गईं और मैं पुलकित । अन्य सुन्दरियाँ भी मेरे कहनें के अन्दाज से प्रभावित दिखीं ।
               मैं आज स्वयं को संसार का सबसे प्रसन्न और सुखी प्राणी समझ रहा था । जिसके बारे में इतनी सुन्दर कन्याएं बात करें वह कितना भाग्यशाली होगा । उन दोनों सहेलियों नें मेरे लिये गहरे हरे रंग और सुर्ख लाल रंग की दो टी-शर्टें पसन्द कीं जो बेहद पुरानी जैसी दिख रहीं थीं लेकिन मेरे पास उन्हें स्वीकार करनें के अलावा कोई विकल्प नहीं था । सुन्दरियाँ उन्हें एकदम लेटेस्ट मॉडल की टी शर्ट बता रही थीं । मैंनें भी सोचा - हो सकता है । 
                 वह दुकानदार मेरी ओर देख कर बोला - दोनों पीस पैक कर दूँ , सा'ब । मैनें ऊँची आवाज में कहा - यह भी कोई पूछनें की बात है, दोनों पीस पैक कर दो । मेंरे इतना कहनें पर , उन दोनों हसीनाओं नें जिस अन्दाज़ में मुझे देखा - कुछ --- पूछिये -- मत । मैं बुरी तरह से घायल हो चुका था । दुकानदार नें मुझे दोनों पीस पकड़ाये, मैंनें अपना रोब जमानें के लिये, जेब से थोड़ा पुराना पर्स निकाला, पर्स में से सारे रुपये निकाले और आहिस्ता से गिनकर सोलह  रुपये दुकानदार को दिये ।
                 उस कपड़े वाले की दुकान पर इक्का-दुक्का लोग आते और देख कर चले जाते किन्तु स्थायी रुप से दुकान पर रहनें वालों में मैं और वे पाँच सुन्दरियाँ ही थीं । मेरे पैर में मानों बेड़ियाँ पड़ गयी हों , मेंरा वहाँ से हटनें का मन ही नहीं कर रहा था । तभी सबसे आकर्षक दिखनें वाली सुन्दरी बोली - हमारी बकिया सहेलियाँ भी चाहती हैं कि आप एक-एक टी-शर्ट उनकी पसन्द की भी लें ।
                  मैं किसी भी तरह से इस खूबसूरत मौके को गँवाना नहीं चाहता था , उस सुन्दरी के प्यार भरे आग्रह को अस्वीकार करनें का साहस मेरे अन्दर नहीं था और उसके स्पष्ट आमंत्रण वाले भाव को मैं थोड़ी कंजूसी कारण गंवाना भी नहीं चाहता था सो मैनें बहादुर आशिकों  की तरह मुस्कराकर कहा - आपके आदेश को मैं कैसे ठुकरा सकता हूँ। मेरे इतना कहनें पर जो खुशी उसके चेहरे पर छाई उसका वर्णन करना मेरे लिये संभव नहीं ।
                   दो टी-शर्ट तो मैं पहले ही ले चुका था । शेष तीन सहेलियों नें भी अपनी-अपनी पसन्द के तीन टी-शर्टों का चयन किया जो देखनें में भद्दे व पुरानें जैसे लग रहे थे , लेकिन मैं उनकी पसन्द को नापसन्द करनें की स्थिति में नहीं था । सच्चाई तो यह थी कि मुझे पहले वाली दोनों टी-शर्टें भी पसन्द नहीं थीं लेकिन स्वयं उपस्थित हुए इस खूबसूरत अवसर पर उन सुन्दरियों की भावना को ठेस पहुँचा कर मैं बनते जा रहे खेल को बिगाड़ना नहीं चाहता था । साथ ही साथ लोग दिल के आगे कैसे मजबूर हो जाते हैं , पहली बार जाना ।
                मैनें दुकानदार को पर्स से निकालकर सौ रुपये दिये ।  दुकानदार बोला साहब पचास रुपये और । मैंनें कहा - भाई आठ रुपये के हिसाब से तीन टी-शर्ट का चौबीस रुपया ही हुआ ना । नहीं सा'ब ये तीनों पीस पचास रुपये वाली हैं - दुकानदार बोला । मैं मोल-भाव करके बनी बनायी इमेज खराब करना नहीं चाहता था । यह जानते हुए कि दुकानदार नें मौके का फायदा उठाकर मुझे चूना लगाया है  मैंनें मन मसोसकर पर्स से पचास रुपये अतिरिक्त निकाल कर उसे दे दिये , दुकानदार नें मुस्कराकर कुल 150 रुपये मुझसे लिये और अपनी जेब में ठूंसा ।
                इस प्रकार मैंनें कुल 166 रुपये में पाँच टी-शर्ट खरीदी । मैं दुकान से हटना चाहता था, लेकिन ना जानें कौन सी अनजान शक्ति मुझे जकड़े हुए थी । मैं सोच रहा था कि वे पाँचों सुन्दरियाँ कपड़ें खरीद कर वहाँ से हटें, तब मैं उन्हें चाय-वाय का आफर करूँ । वे वहाँ से सरकनें का नाम नहीं ले रहीं थीं । मैं बबुआ के यहाँ जानें के बारे में भूल चुका था ।
                लड़कियाँ कपड़ों को बार-बार केवल उलट-पलट रहीं थीं । तभी दुकानदार फिर बोला - सा'ब आपनें तो अपनीं पसन्द का कुछ खरीदा ही नहीं । सभी सुन्दरियाँ भी एक स्वर में बोली , हाँ भाई हाँ । मैंनें सोचा कि पाँच टी-शर्ट तो ले चुका हूँ , एक और लेनें में बुराई क्या है । मैंनें , कपड़ों के ढेर में से एक टी-शर्ट पसन्द की, और दुकानदार से पूछा , इसका क्या दाम लगाओगे भाई । दुकानदार बोला , दूसरे ग्राहक से पूरे ढाई सौ (250) रुपये लेता लेकिन आपसे केवल दो सौ रुपया लूँगा । मैं समझ गया कि यह चालाक दुकानदार मौके का फायदा उठा रहा है सुन्दरियाँ मेंरी पसन्द की दाद दिये जा रही थीं और मैं ठगे जानें के दुःख के बावजूद बाग-बाग हुआ जा रहा था ।  मैंनें दाम के मसले पर दुकानदार से हुज्जत करना उचित नहीं समझा, सो चुप ही रहा और पर्स से 200 रुपये निकाल कर उस धूर्त दुकानदार को दे दिये । इस प्रकार उस चालाक दुकानदार नें मेरी मजबूरी का लाभ उठाते हुए मुझे दो बार खुलेआम ठगा था लेकिन मेरे पास ठगे जानें के अलावा कोई रास्ता ही नहीं था । 
               इधर मन में लड्डू फूट रहे थे , उधर जेब हल्की होती जा रही थी । मैं इतनी देर में यह निष्कर्ष निकाल चुका था कि वह जो सबसे सुन्दर वाली, कोमल काया वाली, पतली सी लड़की थी, जिसे मैं मन ही मन अपना बना चुका था, वह भी मुझपर आसक्त हो चुकी है , उसके सारे हाव-भाव इस बात की गवाही दे रहे थे कि वह भी मेरे साथ अपनें सुन्दर संसार की कल्पना कर रही थी । वह बार-बार मेंरी ओर देखकर -- मुस्कराकर-- नज़रें झुका लेती थी , मैं तो उसपर शुरू से कुर्बान था । तभी दुकानदार नें उसी सुन्दरी को डाँटते हुए कहा - सा'ब नें इतनी देर में कई टी-शर्ट खरीद ली और आप लोग हैं कि दो घन्टे से बस ये वाली और वो वाली करे जा रहीं हैं । कुछ लेना नहीं है तो आगे बढ़िये आप लोग ।
               मुझे बड़ा गुस्सा आया , लेकिन लड़कियों को उस दुकानदार पर कोई क्रोध नहीं आया । परदेश का मामला था सो मैं भी चुप रहा । वही सुन्दर वाली कन्या जो कि भावनाओं में अब मेरी वाली हो चुकी थी, उसनें एक सूट-पीस पसन्द किया । दाम चुकानें के लिये उसनें इधर-उधर टटोला, फिर घबराकर बोली - हाय मेंरा पर्स और कहकर सुबकनें लगी । जिसको मैंनें अपना मान लिया हो उसकी आँख में आसूँ ? मुझे बर्दास्त नहीं हुआ । मैंनें बिना देर किये दुकानदार से कहा - कितनें पैसे देनें हैं । वह बोला -सा'ब , एक सौ पचास रुपये । मैंनें उस सुन्दरी के बहुत बार मना करनें के बावजूद भी दुकानदार को 150 रुपये दे दिये । मेरे पेमेन्ट करनें के बाद उसनें अपनी आँसू भरी आँखों से मेंरी और देखा , उसकी आँखों में कृतज्ञता और प्रेम के सम्मिलित भाव थे । वह मेरे लिये अब ना तो अपरिचित थी ना ही नई जान पहचान वाली ।
                मैं प्यार की राह पर लगातार सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जा रहा था । यद्यपि उस कलूटे दुकानदार नें मुझे इस क्रम में कई बार ठगा । मैं खड़े-खड़े ही कल्पना में उस अपनी वाली के साथ भविष्य के बारे सोच रहा था तभी उसकी मधुर आवाज मेंरे कानों में पड़ी - वह मुझसे बोली मैं अपनीं सहेलियों के लिये भी एक-एक सूट पीस खरीदनें आई थी ।
                मैंनें मन ही मन घबराते हुए हिसाब लगाया । मेरी जेब से अब तक कुल पाँच सौ सोलह (516) रुपये निकलकर उस कपड़े वाले की जेब में जा चुके थे । मेंरी जेब में मात्र चार सौ चौरासी  (484) रुपये कुछ पैसे ही शेष बचे थे ।
                मैनें प्यार में कुर्बान होनें वाले आशिकों की कहानियाँ सुनी थी सो मैंनें अपनें आपको भगवान के हवाले करते हुए , दुकानदार से कहा - भाई इनकी सहेलियों के लिये भी निकाल दो । सहेलियों नें अपनी-अपनी पसन्द से कपड़े चुनें । दुकानदार से दाम पूछा । उसनें उन चारों सूट पीस का दाम साढ़े चार सौ (450) रुपया बताया ।
                 मेरी स्थिति साँप और छछून्दर वाली हो गई थी । मैं अब ना तो निगल पा रहा था ना ही उगल पा रहा था । जिस प्रकार एक जुआरी लगतार हारते-हारते अपनें अन्तिम दांव में अपनें पास का सब कुछ बचा-खुचा लगा देता है ठीक उसी अन्दाज में मैनें भगवान का नाम लेते हुए भारी मन से 450 रुपया दुकानदार को पेमेन्ट कर दिया । भगवान की कृपा से उसनें अपनी ठगनें की परम्परा को आगे नहीं बढ़ाया, अन्यथा --- ।
                सभी सुन्दरियाँ मेरी दरियादिली का तारीफ किये जा रही थीं और मेरा मन इस बात को लेकर चिन्तित था कि इस महानगर में बिना पैसे के मैं कैसे रह पाऊँगा । प्लेटफार्म पर जब उतरा था तब मेरे पास कुल 1000 रुपये और कुछ फुटकर पैसे थे, जिसमें से 966 रुपये अब तक मेरी जेब से जा चुके थे ।
                 अब मेरे पास थे, मात्र चौंतिस (34) रुपये कुछ पैसे, छः टी-शर्ट और ईश्क का भूत । कुछ पानें के लिये कुछ खोना पड़ता है । मैं कुछ पा तो नहीं पाया था लेकिन पानें की संभावना में बहुत कुछ खोता जा रहा था । वे पाँचों सुन्दरियाँ मेरी तारीफ में लीन थीं । मैं जानता था कि जो सबसे दबे जुबान से मेरी तारीफ कर रही है उसके दिलो दिमाग पर मैं पूरी तरह से हावी  होता जा रहा हूँ ।
                 मैं अपनीं जीत पर प्रसन्न हो रहा था लेकिन मुझे इस बात की चिन्ता भी सता रही थी कि यदि मेरी वाली सुन्दरी मेरे साथ जाने को तैयार भी हो जाये तो मैं उसे कैसे अपनें घर ले जाऊँगा क्योंकि मेरे पास तो खुद गाँव जानें के लायक पैसे भी नहीं बचे थे । फिर ये भी तो हो सकता है कि यदि मैं किसी प्रकार उसे साथ लेकर अपनें गाँव जाऊँ और घर वाले मेरी बात को ना मानें तथा घर से ही निकाल दें , तब क्या होगा । अन्ततः मैनें अपनें अन्तर्मन की बात को मानते हुए दिल्ली में ही रहकर काम करनें के बारे में सोचना शुरु किया । 
                   मुझे ना तो बबुआ के यहाँ जानें की फिक्र थी ना ही अपनें घर वापस होनें की चिन्ता । मैं तो केवल उसी के बारे में सोच रहा था कि पता नहीं घर पर वह एडजेस्ट कर पायेगी या नहीं , फिर विचार आता , लड़कियाँ सब एडजेस्ट कर लेती हैं । मेंरी जीवन संगिनी के रुप में वह बिल्कुल फिट नजर आ रही थी , उसके दिमाग में भी ऐसा ही कुछ चल रहा होगा, मेरे दिल नें कहा । वह भी किसी ख्याल में डूबी थी, मैं जानता था कि उसके ख्यालों में भी वही विचार आ रहे होंगे जो मुझे आ रहे थे । बिना कुछ कहे भी कितनी बातें कही जा सकती हैं, इसका अनुभव मुझे पहली बार हुआ ।
                    वह बार-बार मेंरी ओर देखकर पैर के अँगूठे से जमीन कुरेद रही थी, अपनी ऊँगलियाँ मरोड़ रही थी। मैंनें सुना था कि ये सब हरकतें लड़कियाँ तभी करती हैं, जब किसी लड़की के मन में किसी के लिये कुछ हो । सारे लक्षण इस बात की गवाही दे रहे थे कि ईश्क के शोले दोनों ओर भड़क रहे थे । हम दोनों बुरी तरह से ईश्क के गिरफ्त में आ चुके थे । मैं अपनीं विजय का जश्न अन्दर ही अन्दर मना रहा था लेकिन ऊपर से शान्त ही बना रहा । सुन्दरियाँ मेंरी ओर देखकर आपस में काना-फूँसी कर रही थीं।  मैं सब समझकर अनजान बना रहा । 
               धीरे-धीरे , दिन ढलनें लगा । बिना कुछ खाये-पीये तीन-चार घन्टे बीत गये थे , लेकिन भूख प्यास का नामो-निशान नहीं था । दुकानदार नें दुकान समेंटना शुरु कर दिया, नोटों को गिनकर जेब में डाला और कपड़े के गट्ठर पीठ पर लादकर वह चलनें लगा , उसके पीछे वे सुन्दरियाँ और उनके पीछे मैं ।
                मेंरी समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे रोकूँ उस सुन्दरी को, कैसे आगे की योजना बनाऊँ । वे सभी पीछे मुड़कर देखनें का नाम ही नहीं ले रही थीं । मैंनें आवाज देकर , अपनें होनें का अहसास कराया , सभी सुन्दरियाँ रुकी और साथ में वह काला-कलूटा दुकानदार भी रुका । मैनें सुन्दरियों से विनम्रता पूर्वक चाय पीनें का आग्रह किया । वह कलूटा कपड़े का गठ्ठर जमीन पर रख कर मेरे पास तेजी से आया और बोला - क्यों भाई , ज्यादा आशिकी चढ़ी है ? जाओ अपना काम करो , तुम्हारे जैसे यहाँ रोज आते हैं , गँवार कहीं का । मैं जड़वत् हो गया ।
                 वे सुन्दरियाँ ठहाके मार-मार कर हँस रहीं थीं, जिस बेवफा के लिये मैं अपना जीवन कुर्बान करने को तैयार था वो बेवफा सबसे तेज ठहाके लगा रही थी । मैं ग्लानि के सागर में डूब रहा था । मेंरे सारे सपनें, सारे अरमान  रेत के महल की तरह  ढह गये थे । मेंरी एक बेहद खूबसूरत दुनिया एक झटके में तबाह हो गई थी । मैं थका , हारा , लुटा-लुटा, पुनः उस चाय वाले के दुकान पर आकर बैठ गया । 
                मैंनें सारे घटना-क्रम को याद किया और स्वयं को धिक्कारना शुरु किया । तभी एक हाथ मेंरे कन्धे पर पड़ा और आवाज आई - दोस्त क्या विचार है ? मैं भी कभी तुम्हारी तरह से ही अपनें गाँव से दिल्ली आया था ।  मैंनें इस चाय की दुकान पर काम करते-करते घर जानें का पैसा जमा कर लिया है । मुझे अपनी मुक्ति के लिये तुम्हारे जैसे ही आदमी की ही जरुरत थी जो इस दुकान पर आगे मेंरी जगह काम कर सके, तभी मेंरा मालिक मुझे जानें देगा । तुम इसी दुकान में नौकरी करके पैसा जमा करो और अपनें जैसे किसी शिकार का जाल में फँसनें तक इंतजार करो, भगवान तुम्हारी मदद करे । 
                 इसके बाद की घटना के बारे में मैं कुछ भी बता पानें में असमर्थ हूँ क्योंकि मैनें वचन दिया था कि उसके बाद की घटना के बारे में लिखूँगा भी नहीं ।

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सोमवार, 9 जुलाई 2012

टाईम मैगजीन : नई बात तो नहीं कही ।




नाराज हैं  हम लोगों से ?
तुम क्यों आ जाते हो , वक्त बेवक्त , मेरा समय खराब करनें ।
हम टाईम मैगजीन वालों की नासमझी के बारे कहनें आये हैं , पेपर में पढ़ा तो, अपनें को रोक नहीं पाये ।
देखो , मैनें सुना है कि मेरे बारे में सब गलत लिखा है उसमें ।
वही तो कहनें आये हैं , कि आप तो कोई काम किये ही नहीं इतनें सालों में , फिर भी वे आपको नकारा बता रहे हैं ।
वही तो मेंरी समझ में नहीं आ रहा है कि , कैसे मुझे नकारा और दूसरे की राय पर काम करनें वाला बताया है ।
आपके कुशलता पूर्वक और अनुशासन के साथ आदेश पालन को ही वे लोग नकारापन बता रहें हैं ।
देखो , मुझे देश और विदेश में बदनाम करनें की साजिश चल रही है और तुम्हारे जैसे लोग भी उसमें शामिल हैं ।
हम जनता हैं , अपना विचार प्रकट करते हैं , इन सब में दोष आप ही लोगों का है ।
हमारा क्या दोष है , देश को चलाना आसान समझते हो ।
दोष ये है कि , विदेशी लोग कहें कि हमारे बाप का नाम फलां है तो, हमें अपनें बाप पर शक होनें लगता है ।
क्या मतलब तुम्हारा ?
मतलब ये कि , हमारी सारी सोच , हमारी बुद्धि , सब कुछ उनके पास गिरवी रखी है ।
इतना बड़ा देश हम चला रहें हैं , बिना अपनी सोच से ।
अच्छा टाईम मैगजीन वालों नें क्या गलत लिखा है , आप बताइयेगा ।
अभी देखा नहीं हूँ क्या लिखा है , केवल सुना है कि मेरे बारे में गलत टिप्पणी की है ।
पढ़नें की जरुरत नहीं है , पहली बार हम भारत वासियों को गर्व का अनुभव हुआ है ।
मेरे बारे में इतनी बड़ी और विश्व की प्रसिद्ध मैगजीन में कुछ छपा है , मैं जरुर पढ़ूँगा ।
उनके पास कोई मैटर नहीं रहा होगा , सो आपके बारे में लिख दिया । पढ़नें से क्या फायदा ।
अब तो मैं जरुर पढ़ूँगा , क्योंकि तुम मुझे रोक रहे हो पढ़नें से ।
हम किसी दल के नहीं हैं , ठेठ भारतवासी हैं , अपनें देश से प्रेम है , आपके चलते देश कोई कुछ कहे -----।
देखो , मुझे किसी के कहनें , लिखनें की कोई चिन्ता नहीं रहती है । इसलिये जरुर पढ़ूँगा ।
पढ़िये , देखियेगा , उसमें एक भी ऐसी बात नहीं लिखी है जो देश की सारी मैगजीनों में या पेपरों में पहले ना छपी हो ।
क्या , सारी बातों को उन्होनें चुरा कर लिखा है ।
सारी दुनिया को ज्ञान देनें वाले हमारे देश में आपके बारे में जो सात-आठ साल में लिखा गया है उसे ही वे --- ।
तुम्हारा मतलब टाईम पत्रिका का स्तर अब गिर गया है ।
                                 " उनका स्तर गिरा है या नहीं आप बताइयेगा लेकिन हमारे देश के माननीयों का स्तर गिरा नहीं बल्कि जमीन में बहुत गहरे धँस चुका है । 
                                           --- जय ----- हिन्द ----- ।
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शनिवार, 7 जुलाई 2012

लन्दन ओलम्पिक : कलमाडी चाहिये ----- क्या ?




कोई दुभाषिया है आपके यहाँ , मैं बहुत जल्दी में अपनें देश से आ रहा हूँ ।
मैं तुम्हारी भाषा खूब समझता हूँ , गुलाम और मालिक को एक दूसरे की भाषा जरूर आनी चाहिये ।
हम रहे होंगे , कभी गुलाम , अब नहीं हैं , समझे ।
काम की बात बताओ । कैसे यहाँ आये ?
आप लोग यहाँ लन्दन में बहुत बड़ा खेल का आयोजन कर रहें हैं सुना है ।
हाँ , हम लोग 27 जुलाई से 12 अगस्त तक ओलम्पिक खेलों का आयोजन कर रहे हैं ।
हमारे यहाँ से भी खिलाड़ी आ रहे हैं ।
लेकिन , तुम्हारे देश के खिलाड़ी , अच्छा नहीं कर पाते हैं ।
हमारे देश के शातिर खिलाड़ी खेल नहीं खेलते , व्यवस्था करते हैं ।
हमारे लन्दन में भी बहुत से लोग हैं जो व्यवस्था में लगे रहते हैं ।
हम भारत से आये हैं , जिस व्यवस्था के बारे में बतानें , आपका दिमाग उसे सोच भी नहीं सकता ।
कौन सी व्यवस्था ?
आपनें सुना तो होगा , कामनवेल्थ गेम का आयोजन हुआ था भारत में सन् 2010 में 3 से 14 अक्टूबर तक ।
सुना तो था , लेकिन उसमें बहुत घोटाला हुआ था , उसके हेड कलमाडी जेल भी गये यह भी सुना है ।
नहीं घोटाला नहीं हुआ था ।
तब क्या हुआ था ?
उनको अकेले गलत फँसाया गया , जबकी रुपया खानें वाले , उनसे भी बड़े मुँह और पेट वाले थे ।
समय कम है , जो कुछ कहना है जल्दी कहो , तुम भारतीय लोग ,मैटर बहुत लम्बा खींच देते हो ।
देखिये , हमारे कलमाडी साहब  आजकल खाली है , यदि आपको ओलम्पिक खेल में उनका सहयोग लेना हो -- ।
पूरी दुनिया में बदनाम हैं , हम कैसे अपनें साथ लेंगे उसको ।
दुनिया भर के अपराधी और मौत के फतवा वाले को आपके देश में शरण दिया जाता है , कलमाडी कोई --।
नहीं - नहीं , कलमाडी सब गड़बड़ कर देगा , देश बदनाम होगा सो ऊपर से ।
अरे भाई कलमाडी का चेहरा , किसी जानवर में बदलवा देंगे , कहोगे तो तुम्हारे , डॉग स्कवाएड में ---।
हमारे डॉग स्कवाएड को खराब तो नहीं करेगा , कहीं आतंकवादियों से मिल गये हमारे डॉग्स तब ।
आप लोग उन्हें कुत्तों के साथ रखियेगा तो , मैं गारन्टी नहीं दे सकता  ।
तुम कलमाडी को अपनें पास ही रखो , कलमाडी से ज्यादा शातिर हमारे यहाँ हैं ।
कैसे ?
देखो ये माल कितनें का होगा , कलमाडी के अनुसार बताओ ।
तीन हजार डॉलर का होगा ।
सही अनुमान लगाया , लेकिन इसे हमनें दो हजार डॉलर में ले लिया ।
एक हजार डॉलर अपनें पल्ले से दोगे क्या ?
ये दूसरा माल कितनें का होगा , कलमाडी के रेट से बताओ ।
ये दो हजार डॉलर का होगा ।
फिर ,  तुम्हारा अनुमान एकदम सही है । इसे तुम्हारा कलमाडी कितनें में खरीदता ?
बीस हजार डॉलर में ।
कलमाडी ,  टुच्चों वाली चोरी की बात सोचता रहा , और जेल गया ।
आप कलमाडी को टुच्चा किस्म का चोर कहते हैं ।
और क्या , वही सामान हम दो हजार डॉलर की जगह , दो लाख डॉलर पर किराये में ले रहें हैं ।
दो हजार का माल दो लाख का , ये बहुत ज्यादा लूट है ।
लेकिन तीन हजार वाला माल भी तो दो हजार में ले रहे हैं , कोई हल्ला करेगा तो तीन का माल दो में लिया बतायेंगे ।
आप लोग तो हमारे देश के लूटेरों से भी ज्यादा शातिर हैं ।
तो समझ गये , हमें कलमाडी की कोई जरुरत नहीं है , चेला गुरु को क्या पढ़ायेगा ।
अगर आपत्ति ना हो तो , अनुरोध करें ।
हाँ - हाँ , कहो ।
कलमाडी साहब को आपके पास कुछ शिक्षा ग्रहण करनें के लिये यहीं बुला लें , यदि आदेश हो तो ।
वॉय नाट , श्योर ।

                      " कलमाडी साहब को यहीं बुला लेते हैं , उन्हें ओलम्पिक खेलों को देखनें का मौका मिलेगा , और अपनी गलतियों पर विचार और समीक्षा करनें का समय भी मिलेगा । भारत में निकट भविष्य में आयोजित होनें वाले खेलों के आयोजन में सफलता पूर्वक घोटाले को कैसे अंजाम दिया जाये , इस पर गहन परामर्श लिया जायेगा । कलमाडी रहे या दूसरा , यहाँ की शिक्षा  सभी के काम आयेगी , आखिर हम गुलाम रहे हैं उनके ।
                      हल्लो कलमाडी साहब --- फिर जेल में डाल दिये क्या -- इडियट -- इंडियन ।
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गुरुवार, 5 जुलाई 2012

प्लीज़ - ढ़ंके रहो -- ।



हमारे देश के लोगों को बड़ी प्राब्लम रहती है ।
मच्छरों के बारे में , चिन्तित हैं का , पूरे देश में आतंकवादियों से ज्यादा इनका आतंक है ।
मैं मच्छरों के बारे में नहीं , बार-बार परेशान करनें वाले लोगों की बात कर रहा हूँ  ।
आप आज नहीं पूछे कि हम कैसे इस समय , आप के पास तक पहुँचे ।
मुझे मालूम है तुम , कोई जुगाड़ लगा कर आये होगे ।
ना , अबकी बार , पास बनवाये हैं , आपसे मिलनें के लिये ।
इधर कोई पास तो जारी ही नहीं हुआ मेरे कार्यालय से -- ।
सच बतायें एकदम फर्जी हैं लेकिन कोई कह नहीं सकता , आप भी नहीं ।
देखें ।
लेकिन शर्त ये है कि , चुप ही रहियेगा, जैसे देश के तमाम जरुरी मुद्दे पर रहते हैं । लीजिये देखिये ।
इस पर तो मेरा भी हस्ताक्षर है , लेकिन मैंने तो बनाया ही नहीं ।
हम कब कह रहे हैं कि आपनें बनाया है , मैं तो कह ही रहा हूँ कि फर्जी है ।
मैं कार्यवाही करुँगा , तुम्हारे खिलाफ ।
कार्यवाही क्या करियेगा , आपको पता भी रहता है कि आप कहाँ-कहाँ दस्तखत कर देते हैं ।
तुमनें ये दस्तखत किससे बनवाये , सच बताना ।
सुनियेगा तो आप मेरे भी फैन हो जाईयेगा ।
जल्दी बताओ ।
दादा का हस्ताक्षर किसनें बनाया है , उस संस्थान के इस्तीफा वाले कागज पर , पता है ।
इस बारे में मुझे कुछ मालूम नहीं है , लेकिन कुछ लोग दस्तखत को जाली बताकर हल्ला कर रहे हैं ।
हाँ , मैं उसी डिस्प्युटेड दस्तखत की बात कर रहा हूँ । जिसके कारण दादा का रंग सांवला हो रहा है ।
तुम बात को लम्बा कर रहे हो , जानते हो तो बताओ , किसका दस्तखत है ।
सच्चाई सुनियेगा , आपके नाक के नीचे ही सब कुछ होता है , लेकिन आप को वह नजर नहीं आ सकता ।
देखो कुछ लोगों पर मुझे शक रहता है , लेकिन वे जादूगर टाईप के हैं , उनपर मेरा बस नहीं चलता ।
हाँ  ये सब बात हम जनता को खूब मालूम है ।
तुम दस्तखत वाली बात को क्यों नहीं बताते । 
उस्ताद की जगह पर , नये जमूरे को दस्तखत की नकल करना पड़ा , जल्दबाजी में , इसी से गड़बड़ा गया ।
ये बात तुम्हें कैसे पता चली ।
कुछ बातें आप को बताना खतरनाक हो सकता है ।
मैनें वादा किया है कि किसी से कुछ नहीं कहूँगा , अब तो बताओ ।
मैडम के सामनें आपको अपना होश तो रहता नहीं , वादा क्या याद रखियेगा ।
कुछ हिन्ट ही दे दो, यदि नहीं बताना चाहते हो ।
हम बता देंगे , लेकिन बदले में मुझे क्या मिलेगा ।
तुम ब्लैक मेल करना चाहते हो ?
जी नहीं , हमेशा मौका चूक जाता था । अबकी मौके का लाभ लेना चाहता हूँ ।
अच्छा क्या चाहते हो बोलो ।
तैयार हैं  तो सुनिये - पहला मिलेटरी की ५०% सप्लाई मेरे हाथ रहेगी , दूसरा- मुझे राज्य सभा की --- ।
इतनी बड़ी माँग ? मैं पूरी नहीं कर सकता , राय लेकर कुछ बता सकता हूँ ।
ठीक है , सबसे राय लेकर , मुझे मिस काल दीजियेगा । नमस्कार ।
             मैं भी कितना वो हूँ , मुझे क्या जरुरत है , वैसे लोगों की , थका दिया मूर्ख नें ।
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बुधवार, 4 जुलाई 2012

गाँधीजी के बन्दर जी -- भेंट वार्ता .







आइये , बन्दर जी , आप लोगों का स्वागत है , बैठिये ।
धन्यवाद ।
आप तीनों मे से कौन बोला ?
ये तीनों नहीं , मैं बोल रहा हूँ , मुझे मदारी कह सकते हो ।
तुम क्यों आये ?
मैं ही इन्हें दाना पानी देता हूँ । पिछले ६०-६२ साल से ।
लेकिन मुझे तो इन लोगों से बात करनी थी ।
ये तीनों ठीक से बोलने लायक नहीं रह गये हैं , जो ये कहना चाहेंगे , मैं कह दूँगा ।
तुम्हे मालूम है , ये तीनो लोग कौन हैं ? इन्हें साधारण बन्दर मत समझना ।
खूब अच्छे से जानता हूँ । इनके असर से ही देश में , लोगों ने देखना , सुनना और कहना सब बन्द कर दिया है ।
कैसी बात करते हो , बन्दर की बात भी कभी , इन्सान मानता है ?
मेरा मदारी सच कह रहा है , भाई ।
अब कौन बोला मदारी जी ?
वही जो केवल आँख बन्द किये है ।
बकिया क्या नहीं बोलते मदारी जी ?
जबसे मेरे साथ हैं तबसे तो बोलते नहीं सुना , केवल बन्द आँख वाला ही बोलता है कभी-कभी ।
मेरे आलावा ये दोनों कभी बोले ही नहीं तो सुनोगे कैसे ?
ये दोनों बोल नहीं पाते हैं ,क्या , मदारी जी ?
साहब , देखते नहीं पहला बन्दर अपना कान बन्द किये है , वह कुछ सुनता ही नहीं, तो बोलेगा क्या ।
इस बन्दर का प्रभाव तो पूरे देश में है मदारी जी , देश के नेता हों या अधिकारी , सभी इसके अनुयायी हैं ।
हाँ साहब , सब देखता समझता है लेकिन फिर भी हमेशा स्माईलिंग फेस बनाये रखता है , मोहन बाबू जैसा ।
कौन , मोहन दास करम चन्द गाँधी जी , हमारे बापू जी ?
नहीं साहब , अपनें मनमोहन जी का बात कर रहा हूँ ।
बड़े समझदार लगते हो , मदारी जी । 
हाँ साहब , दूसरा वाला बन्दर जो मुँह बन्द किये है , देखता , सुनता सब है लेकिन बोलता नहीं ।
इसका भी जबरदस्त क्रेज है हमारे देश में , सभी इसके परम् भक्त हो गये हैं ।
मैं एक बात बोलूँ ।
कौन बोला ।
मैं ,तीसरा बन्दर हूँ  मुझेबोलने वाला बन्दर कह सकते हो, मैं सुन भी सकता हूँ ,लेकिन बापू आँख बन्द कर दिये हैं ।
हाँ बोलिये, आप क्या कहना चाहते हैं ?
देखिये , बापू हमारे माध्यम से लोगों को कुछ मैसेज देना चाहते थे , लेकिन वह मैसेज ही बदल गया है ।
देखियेर बन्दर जी , आपका क्रेज भी कम नहीं है , देश में सभी आप तीनों की ही नकल कर रहे हैं ।
हम सोचते थे कि बापू के स्वर्गीय होनें के बाद - लोग हमें पकड़ कर जंगल में भेजवा देंगे ।
नहीं-नहींं , ऐसा कैसे होता , आप तीनों ही देश के वास्तविक प्रतीक हैं ।
मैं देखता नहीं , लेकिन सुनता सब हूँ , बापू की बात माननें वाले कहीं सुनायी नहीं पड़ते ।
आप देखनें वाले बन्दर से पूछिये , वे बता देंगे कि बापू का कितना सम्मान होता है , २ अक्टूबर को ।
देखनें वाले बन्दर की बात मत कीजिये , सब देखकर अकेले-अकेले आनन्द उठाता है ।
फिर भी पूछ कर तो देखिये ।
हद करते हैं ,कैसे पूछें , देखनें वाला बन्दर मुँह बन्द किये है , बोलेगा नहीं ,दूसरा कान बन्द किये है , सुनेगा नहीं ।
आप एक काम करिये बन्दर जी , चुपके से आँख खोल कर सब नजारा देख कर फिर आँख बन्द कर लीजियेगा ।
साहब आप ठीक नहीं कर रहे हैं , बन्दर जी को इंसानों जैसा बेईमानी का पाठ सिखा रहें हैं । 
मदारी जी , आप ख्वामख्वाह नाराज हो रहें , इसे बेईमानी नहीं होशियारी और समझदारी कहते हैं ।
देखिये साहब , अगर बन्दर भी बेईमान होनें लगेंगे तो , गाँधी जी की आत्मा को दुःख होगा ।
मदारी जी , गाँधी जी के चेलों को उनकी फिक्र नहीं है , फिर बन्दर जी को क्यों हो , क्यों बन्दर जी ?
लेकिन मैं अपनी आँखें खोलकर अब क्या करुँगा , वृद्ध भी हो चला हूँ ।
बन्दर जी कहाँ हैं आप , पूरे देश में नये किस्म के बन्दरों का राज है , हर जगह , आँख खोल कर देखियेगा ।
दूसरे किस्म के बन्दर ?  भाई , हम तीनों तो ब्रह्मचारी रहे हैं , वे हमारी सन्तान नहीं हो सकते ।
हम आप पर चरित्र-हीनता का आरोप नहीं लगा रहे बन्दर जी ।
फिर भी यदि शक हो तो हमारा डी एन टेस्ट करवा सकते हैं , जैसे एन डी का हुआ ।
आपनें कैसे जाना उन्हें ? आपकी तो आँख बन्द रही है , जमानें से ।
को नहीं जानत है जग में -------। लोग उनके बारे में चटकारे ले लेकर बात करते हैं , मेरा कान खुला है भाई ।
बन्दर जी , बुरा ना मानें तो , एक बात कहें , क्यों कि आपका मदारी अभी बाहर बीड़ी पीनें गया है ।
बोलिये ।
मदारी जो आप को लिये-लिये घूमता है ना , वह आपके स्टेन्डर्ड का नहीं लगता ।
क्या मतलब ?
सुनिये ,देश में तरह-तरह के मदारी हो गये हैं वे अपनें बन्दरों से करतब कराते हैं और फिर दोनों शान से रहते हैं ।
कैसे करतब ? क्या करतब दिखाते हैं ?
कुछ नहीं , बस छलाँग लगाकर-लगाकर जहाँ मौका मिला माल उड़ाया और मदारी को दे दिया ।
लेकिन बन्दरों को तो केवल गाली मिलती होगी ।
छोड़िये , गाली की चिन्ता , आँखे खोलिये , चलते हैं एक बड़े मदारी के पास ।
इन दोनों बन्दरों का क्या होगा ?
छोड़िये केवल अपनें बारे में सोचिये ,जो इनकी किस्मत में ऐसे हा पड़ा रहना लिखा है । जल्दी आँखें खोलिये ।
वाह , क्या दुनिया है , कमाल की , बताइये , बेवकूफों जैसा मैनें आँखें बन्द किये ६०-६५ साल बिता दिये ।
अब कैसा महसूस हो रहा है ।
वाह -वाह कुछ पूछिये मत , जब आँख बन्द किया था तो सब ब्लैक एन्ड व्हाईट था , और अब एकदम रंगीन ।
अब आपका क्या प्रोग्राम है , कुछ बताइयेगा ?
मैं  बता रहा हूँ  ---
              " हमनें जीवन के बहुमूल्य क्षण , बापू के चक्कर मे बर्बाद किये हैं , भारत वासियों के मन में गाँधी जी से ज्यादा श्रद्धा बन्दरों और उनके मदारियों के प्रति है । यहाँ , हम बुजुर्ग बन्दरों  के आदर्श श्री एन डी तिवारी जी एवं  मार्ग दर्शक मनु सिन्धवी साहब हैं । इनके अलावा , कपि-श्रेष्ठ कपिल जी , दिग्भ्रमित से दिग्गी राजा , कलंकी कलमाडी जी और बिना मुकुट वाला राजा है , बिना इनके दर्शन के मेरा जीवन कितना सूना -सूना था ।
                        चलिये ना, किसी मदारी के यहाँ , बर्दाश्त नहीं हो रहा है , चलिये --- ना -- ।

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रविवार, 1 जुलाई 2012

मुँदहूँ आँख कतऊँ कुछु नाहीं --- रोबटों की दुनिया ।



बाढ़ देख आये ?
बड़ा भयावह सीन था ।
हमरो मन करत रहा बाढ़ देखे के , आकाश से देखे में बड़ा मजा आवा होई ?
हम लोगो की स्थिति स्वयं देखकर आँकलन करना चाहते थे कि कितनी क्षति हुई ।
ओकर आकँड़ा तो आपके मुलाजिम अच्छा से दे सकत रहें ।
तुम फालतू आदमी  हो ।
काहे ? देश का हर काम जब गलत रिपोर्ट पर हो सकत है तो , का फायदा देश के पैसा आकाश में फूँके से ।
हमे राय देते हो ।
राय नहीं सच्चाई कह रहे हैं ।
राहत कार्य के रुपया की जो घोषणा करे हैं , ना ओके हाल देखियेगा ।
मैं स्वयं निगरानी रखूँगा ।
आप और निगरानी , इ संभव नहीं हो सकत , नाही तो देश की हालत ऐसे थोड़ी ना होती ।
तुम जनता , निपट गँवार और मूर्ख हो , निगरानी से मेंरा मतलब ---- ।
देखिये , राहत कार्य मे कुछ शातिर लोग ऐसे ताक में रहते हैं जैसे लाश को नोचे के लिये गिद्ध ।
तो मैं क्या करूँ ।
करनें को सब कुछ किया जा सकत है , सही व ईमानदार आदमी के उ सब काम  में लगावा ही नै जात है ।
देखो मैं असहाय हो जाता हूँ । मेरी कुछ उम्र भी हुई , ज्यादा तनाव मैं झेल नहीं सकता ।
तब काहे झूठै नाटक करते हैं कि कठोर कदम उठाऊँगा , दुश्मन को उसके घर में घुस कर मारुँगा ।
नहीं, नहीं, मैनें किसी दुश्मन को मारनें की बात कही ही नहीं , मैं पूरी तौर पर अहिंसक हूँ ।
आप कबौ-कबौ चीन व पाकिस्तान के लिये कुछ ज्यादा बोल जात हैं न , ए लिये कहे रहे ।
देखो , मैं वास्तव में एक रोबोट से ज्यादा कुछ नहीं रह गया हूँ , जितना ---- डाला गया ------ बस उतना ।
जनता जब चिल्लात है तो , ओके उत्तर आप देर से देत हैं ,  ई सही है , लेकिन उत्तर कैसे देत हैं ?
तुम जैसे जनता के दूत से भी बात करनें के लिये मेंरी प्रोग्रामिंग की जाती है , और उसका संचालन --।
संचालन का काम तो कोई एक ही करता होगा ?
कभी-कभी कई लोगों के हाथ से भी संचालन होता है जिसके कारण , मैं गड़बड़ा जाता हूँ , कभी-कभी ।
दिग्विजय सिंह तो उच्च तकनीकी वाले रोबोट हैं ?
नहीं भाई , उनके सारे यंत्र खराब हो गये हैं , रिपेयर लायक भी नहीं बचा है ।
ई अन्ना और रामदेव बाबा , अक्सर आप जैसे अन्य रोबटों को इंसान समझ लेते हैं ।
इसमें गलती तो उन्हीं लोगों की है ना ।
सरासर गलती है , लेकिन चिदरम्बरम् , सलमान खुर्शीद और कपिल सिब्बल तो वास्तविक इंसान लगते हैं ।
यदि वे लोग ही चकमा खा जायें तो , मैं क्या कर सकता हूँ ?
यही भ्रम के कारण तो सब गड़बड़ हो जाता है ।
एक बात है , आप लोगो की तकनीकी दुनिया में सबसे आगे लगती है ।
पुरानी बातों का मुझे स्मरण नहीं रहता है ।
कोई बात नहीं , हम याद कराते हैं , पुरानें रोबोट  थे एन डी तिवारी जी, वे जूता चप्पल उठाते थे ।
हमारे ग्रुप के पुरानें मेम्बर हैं ,बहुत काम करते हैं , लेकिन पता नहीं कौन उनको बाप बनानें पर तुला है ।
ई जानकारी आपको भी है , लेकिन सुना है , गोपियों संग रास-लीला के शौकीन रहे हैं ।
उनकी सोहबत यानी संगत शायद ठीक नहीं थी ।
लेकिन उहो तो आपै के प्रोडक्शन कम्पनी के देन रहे ।
उनमें विकृति आ गयी होगी ।
ना ,ना हम जनता इतनें मूर्ख नहीं हैं , उन्हें उसी तरह से प्रोग्राम किया हुआ था , ताकि और लोग भी------ले सकें ।
कितनी गन्दी बातें करते हो , भागो यहाँ से ।
किस किस को भगाइयेगा , सभी आप को घेर कर उस समय नोचेंगे , जब आपको कबाड़ में डाला जायेगा  ।
प्लीज , जाओ यहाँ से , ना तो मेरी समझ में कुछ आता है , ना ही मैं कुछ देख पाता हूँ , परेशान हूँ ,क्या करुँ ।  
आप कुछ करें या न करें हम जरुर समझ गये हैं कि , आप में डाले गये प्रोग्राम का नाम है -
                               " मुँदहूँ आँख कतऊँ कुछु नाहीं "।
                                           प्रोग्राम बनाये वाले और डाले वाले के जय ।  
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 रिकवरी आफ इंडिया   बनाम   डिस्कवरी आफ इंडिया   संसार के अधिकांश इतिहासकारों नें अपनें देश का इतिहास लिखते समय इस बात का ध्यान र...