
रिकवरी आफ इंडिया
बनाम
डिस्कवरी आफ इंडिया
संसार के अधिकांश इतिहासकारों नें अपनें देश का इतिहास लिखते समय इस बात का ध्यान रखा कि उनकी आनें वाली पीढ़ी को अपनें इतिहास की जहाँ तक संभव हो सके सही-सही जानकारी दी जाये । वे अपनें देश के इतिहास पर गर्व कर सकें । योरोपीय और मुस्लिम इतिहासकारों नें सदा अपनें देश के महान लोगों के शौर्य, पराक्रम, समझदारी और उनकी विजय गाथा का वर्णन अपनें इतिहास लेखन में किया है ताकि आनें वाली पीढ़ियां उनके शौर्य, कुशलता व नीतियों का अनुसरण करती रहें और अपनें गौरवशाली अतीत को याद रखें । लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे देश के इतिहास को लिखनें वाले जिनमें अधिकांश
भारतीय थे जिन्हें हमारे देश में बुद्धिजीवियों की कोटि में गिना जाता रहा
है, उन्होनें ना जानें किस दबाव या लालच में हमारे देश का ऐसा इतिहास लिखा
है जिसमें भारतीयों की शौर्यता, पराक्रम राजनीतिक कुशलता का जिक्र ना करके
भारतीयों के अपमान, पराजय व मूर्खता का जिक्र ज्यादा है । हिन्दू समाज को
बाँटनें वाली बातों को इस तरह से बढ़ा-चढ़ा कर लिखा गया है जिसे पढ़कर कभी
भी हिन्दू समाज अपनी एकता कायम नहीं रख सकता ।
हमारे देश के इतिहास को लिखनें वालों नें इतिहास लिखते समय इस बात का ध्यान
रखा और पूरी सावधानी बरती कि देश की झूठी सेकूलरिज्म वाली छवि को कायम रखा
जाये तथा देश के लोगों को उन अत्याचारी मुस्लिम शासकों के बारे में भी
जानकारी ना हो सके जिन्होनें देश में हिन्दुओं का बुरी तरह से कत्लेआम किया
औरतों की इज्जत लूटी और बहुत से हिन्दुओं को मुसलमान बननें के लिये मजबूर
किया । यही नहीं ऐसे तमाम अत्याचारी मुस्लिम शासकों को न्याय-प्रिय और
सेकूलर सोच वाला बतानें का कुप्रयास भी किया । देश की जनता के सामनें सच
लानें की जगह यही प्रयास किया गया कि देश की आनें वाली पीढ़ी अपनें प्राचीन
इतिहास के बारे में कम से कम जानकारी रखें और भारत के लोग ये मानकर चलें
कि वे कायर, अदूरदर्शी तथा सदा पराजित होनें वाले पूर्वजों की सन्तानें हैं
जिन्हें आसानी से पराजित कर गुलाम बनाया जा सकता है ।
हमारे देश का इतिहास इस प्रकार का लिखा गया है कि हम उसे पढ़कर गर्व की जगह
शर्म महसूस कर सकते हैं । हमारा इतिहास हमें बताता है कि हम आपस में इतना
बँटे हुए थे कि कोई भी ऐरा गैरा लूटेरा आकर देश में लूटपाट करके , अपमानित
करके , लोगों की हत्या करके अपनी हूकूमत कायम कर सकता था । दुर्भाग्य से
यही सोच आज की हमारी पीढ़ी में संक्रमित कर दी गई है ।
हमारा इतिहास हमें यह भी बताता है कि किसी भी लूटेरे आक्रमणकारी से युद्ध
करनें का काम केवल राजपूत जाति के लोग ही करते थे और बाकी जाति के लोग केवल
मूक दर्शक रहते थे और राजपूतों के पराजित होनें के बाद खुद को उन
आक्रमणकारी लूटेरों के हाथों मरनें , गुलाम बननें और अपना धर्म परिवर्तन
करनें के लिये प्रस्तुत कर देते थे ।
उन तथा-कथित देश प्रेम से रहित इतिहासकारों में जवाहर लाल नेहरु जी का नाम
भी लिया जाता है । यह बात अलग है कि नेहरु जी ख्याति कभी एक अच्छे दार्शनिक, विचारक
या लेखक के रुप में नहीं रही है । वे बहुत बड़े विचारक अथवा अध्ययनशील
व्यक्ति रहे हों ऐसा भी कहीं उल्लेख नहीं मिलता है और ना ही वे शोधपरक
चीजों में रुचि लेनें वाले लोगों में गिने जाते रहे हैं । उनके बारे में
जहाँ तक मैंनें पढ़ा, सुना या जाना है, उनकी रुचि सुन्दरता में जरुर थी ,
वह चाहे गुलाब के फूल की सुन्दरता हो या किसी सुन्दर नारी की सुन्दरता हो ।
नेहरु जी नें जेल में रहते हुए अपनी बेटी को पत्र लिखे होंगे और उसे
प्रेषित भी किये होंगे यह बहुत सामान्य सी बात है । अपनी बेटी को पत्र
लिखकर अपनी पत्नी और बेटी का हाल-चाल पूछनें की बजाय भारत का इतिहास लिखनें
की जरुरत क्यों महसूस हुई यह बात कम से कम मेरी समझ में तो नहीं आती ।खुद नेहरु जी या नेहरू खानदान के बारे में यदि हम देंखे तो अभी तक देश
वालों को यह पता नहीं है कि उनके पूर्वज काश्मीर के किस नहर के किनारे के
क्षेत्र के रहनें वाले थे । क्या कोई एेसा सबूत या प्रमाण हमारे देश के
किसी आदमी के पास है जो यह साबित कर सके कि नेहरू खानदान की वंश-वृक्ष की
शुरुआत काश्मीर के अमुक स्थान से हुई थी और उसके निशान अब भी मौजूद हैं।
जिस खानदान का इतिहास ही पर्दे के पीछे छिपा हो और जिस आदमी को खुद अपनें
इतिहास के बारे में जानकारी ना हो वह हमारे भारत देश के इतिहास के बारे में
क्या खाक जानेगा ।
नेहरु जी द्वारा अपनें पत्रों के माध्यम से भारत के इतिहास के बारे में जो
भी सही या गलत लिखा गया , उन बातों की जानकारी उन्हें किन स्रोतों से
प्राप्त हुई थी इसका कहीं जिक्र नहीं है । तथाकथित "डिस्कवरी आफ इंडिया"
नामक पुस्तक में नेहरु जी द्वारा यह सिद्धान्त दिया गया
कि - भारत भूमि पर आर्य लोग बाहर से आये थे तथा यहाँ आकर उन्होंनें यहाँ के
मूल निवासियों को पराजित करके कब्जा कर लिया था ।
नेहरु जी नें वैसी कोई पुस्तक पत्र के रुप में लिखी होगी , यह विचारणीय
प्रश्न हो सकता है क्योंकि इतिहास लेखन जैसे जटिल कार्य को करनें के लिये
बहुत समय व परिश्रम लगता है जिसमें गहन अध्ययन और शोध की आवश्यकता होती है
और नेहरु जी से वैसी उम्मीद नहीं की जा सकती ।
ऐसा भी हो सकता है कि किसी शातिर दिमाग की यह उपज रही हो कि भारत के इतिहास
को यहाँ के देशवासियों के सामनें इस तरह से रखा जाये ताकि भारत देश के लोग
सदा इसी बात पर संघर्ष करते रहें कि कौन मूल निवासी और कौन विदेशी है ।
नेहरू जी नें आर्यों को विदेशी बताकर भारत में अत्याचार करनें वाले मुस्लिम
लूटेरों, आक्रमणकारियों, अत्याचारियों द्वारा देश पर किये गये आक्रमण,
अत्याचार और देश पर कब्जा कर लेनें की घटना को तथा अँग्रेजों द्वारा भारत
भूमि पर उसी प्रक्रिया को दुहरानें की घटना को न्यायोचित ठहरानें का अपराध
किया और साथ ही साथ देश की जनता को एकजुट रखनें की बजाय उनमें आपसी संघर्ष
और विद्वेष बढ़ानें का काम भी किया जिसका विस्तार आज तक कायम है । डिस्कवरी
आफ इंडिया नामक तथाकथित पुस्तक को लेकर लोगों के मन में सदा यह सन्देह रहा
है कि क्या नेहरु जी नें वास्तव में वैसा कोई लेखन का कार्य किया होगा ?
इस प्रकार के सन्देह पैदा होनें के कई कारण हैं , जिनका जिक्र करना यहाँ
जरुरी नहीं है , लेकिन कुछ बातें ऐसी जरुर है जिनपर हमे अवश्य गौर करना
चाहिये , तथा जिस काम को नेहरु जी नें किया ही ना हो उसके लिये उन्हें
कसूरवार ठहरानें की बजाय इस बात पर शोध करना चाहिये कि आखिर वे कौन लोग थे
जिन्होनें नेहरु जी को मजबूर किया कि - इस प्रकार देश के लोगों को आपस में
बाँटनें की क्षमता रखनें वाली वाहियात पुस्तक के लेखक के नाम के रुप में
जवाहर लाल नेहरु का नाम होना चाहिये । नेहरु जी को सदा साजिश का शिकार होना
पड़ा था। एडविना, जिन्ना , पाकिस्तान और चीन सभी नें नेहरु जी को मूर्ख
बनाकर साजिश करते हुए भारत के टुकड़े कर दिये , भारत की जमीन को हड़प लिया
और नेहरु जी बेचारे केवल मुँह बाये देखते रहे । उसी प्रकार नेहरु जी को एक
सोची-समझी साजिश के तहत डिस्कवरी आफ इंडिया का लेखक बताया गया है ।
सोचिये , नेहरु जी द्वारा अपनी पुत्री इंदिरा को भेजे गये उन पत्रो, जिनके
आधार पर चालाक लोगों नें बिना उन्हें पढ़े, बिना उनकी सत्यता को जानें,
बिना उन पत्रों पर शोध किये, उन पत्रों के आधार पर एक पुस्तक की रचना कर
डाली , वे कितने कुटिल व शातिर दिमाग के लोग रहे होंगे , क्योंकि आज तक देश
के सामनें या किसी म्यूजियम में नेहरु जी के वे पत्र नहीं मिलते जिन्हें
उन्होनें कथित रुप से अपनी पुत्री को लिखे थे ।
नेहरु जी द्वारा लिखे गये वे पत्र कहाँ किन परिस्थितियों में रखे गये हैं ,
उन्हें देश की जनता के सामनें आज तक क्यों प्रदर्शित नहीं किया गया ? ये
सब मुद्दे जरुर यह सोचनें पर विवश करते हैं कि कहीं ना कहीं कुछ गड़बड़
जरुर है । नेहरु जी नें जो पत्र अपनी बेटी को लिखे वे पत्र नेहरु जी या
उनकी बेटी नें पुस्तक प्रकाशन हेतु किसको सौंपे, उन पत्रों के संग्रहकर्ता
या प्राप्तकर्ता नें उन्हें प्रकाशन हेतु कब और किसे सौंपा । प्रकाशन के
बाद उन पत्रों का क्या हुआ ? ये प्रश्न हो सकता है किसी के लिये महत्वपूर्ण
ना हों लेकिन हम जैसे देश-भक्तों के मन में ये प्रश्न, यक्ष-प्रश्न से भी
ज्यादा पेचीदे और अनसुलझे हैं ।
विद्वान मित्रों तथा इतिहास पर शोध करनें वाले शोध-कर्ता बन्धुओं से विनम्र निवेदन
है कि वे मेरे इन अनसुलझे प्रश्नों का उत्तर देकर मेरी जिज्ञासा व अज्ञानता
को दूर करनें का प्रयास करेंगे ।