मंगलवार, 8 मई 2018

विचार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का शिकार


विचार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का शिकार

हिंदी फिल्मों नें जातीय विद्वेष के धीमें जहर को बहुत धीरे-धीरे फैलाया, फिल्मों में राजपूत का मतलब एक निर्दयी, क्रूर व अत्याचारी होता है जिसके अंदर रावण . पंडित का मतलब धूर्त व पाखंडी तथा राजपूत जमींदार का चमचा . राजपूत जमींदार की बेटी का छोटी जाति के युवक से प्रेम , प्रेमी का राजपूत जमींदार से जंग और राजपूत जमींदार की पराजय व पंडित जी की अच्छे से धुलाई . फ़िल्म के निर्माताओं और कहानीकारों को यह फार्मूला खूब भाता था, और कमाल तो ये था कि सभी जातियों के दर्शकों की सहानुभूति छोटे जाति के युवक के साथ होती थी और वे जमींदार व पंडित की पिटाई पर ताली भी बजाते थे .
लेकिन दर्शकों के किस वर्ग नें उन फिल्मों से क्या सीखा और क्या पाया आज हमारे सामनें है . एक ऐसा वर्ग जिसे आसानी से बरगलाया जा सकता है और जो सुनी सुनाई काल्पनिक बातों को ही यथार्थ समझता है उसके दिमाग में उस जहर का असर प्रभावकारी ढंग से हुआ और उसनें यह मान लिया कि बड़ी जातियों के लोग उनके दुश्मन हैं . जिस प्रकार आज के नेता इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर अपनी रोटी सेंक रहे हैं उससे हिन्दू जातियों के बीच खाई और चौड़ी होती जा रही है और उसमें हमारे देश के अधिकांश बुध्दिजीवी आग में घी डालनें का काम कर रहे हैं .
हम सभी लोग फ़िल्म देखते रहे हैं . क्या आप को याद है किसी ऐसे फ़िल्म की कहानी जिसमें किसी पठान या उच्च जाति के मुसलमान की बेटी का छोटी जाति के युवक से ईश्क, उस पठान की पराजय हो जाती हो तथा कोई मौलवी या पादरी को धूर्त, बेईमान या पाखंडी दिखाया गया हो . जिसमें उसकी लोग धुनाई करते हों ,
जी नहीं आप ऐसी कहानी पर फ़िल्म नहीं देख सकते . ऎसी फ़िल्म बनानें की कोई सोच ही नहीं सकता ना ही किसी माई के लाल में वह हिम्मत है .फिल्मों में अपमानित और बेईज्जत होनें के लिए केवल राजपूत और ब्राह्मण ही हो सकते हैं जो पिक्चर हॉल में बैठकर अपनें ऊपर किये गये उपहास पर भी ताली बजानें का हौसला रखते हैं , भले ही वह अज्ञानतावश हो या अत्यंत खुले दिमाग के कारण हो .



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