रविवार, 10 सितंबर 2017

प्रद्युम्न की माँ और --------- को समर्पित


प्रद्युम्न की माँ और --------- को समर्पित


तुम आओगे नहीं मालूम है , मैं दर्द सहकर, तुम्हारा नाम लेकर जी लूँगी, 

लेकिन, 

स्कूल से आकर जो कुछ भी तुम सुनाते थे,

उन्हें सुननें का जी करेगा तो क्या करूँगी,

तुम जो कपड़े उतार कर फेंक देते थे इधर उधर,

उन्हें सहजनें और साफ करनें का जी करेगा तो क्या करुँगी

तुम्हारी फर्माईशें जिनको पूरा करनें के लिये हम कुछ भी करते थे,

उन फर्माईशों को सुननें का जी करेगा तो क्या करूँगी,

रोज रात को मेरे बिना तुम सोते नहीं थे,

तुम्हें सुलानें का जी करेगा तो क्या करूँगी,

सुबह स्कूल जानें के लिये कितनी मशक्कत के बाद तुम तैयार होते थे,

तुम्हें फिर से तैयार करनें का जी करेगा तो क्या करूँगी,

टिफिन की तैयारी से होती थी, सुबह की शुरुआत मेरी,

तुम्हारे खाली टिफिन में कुछ रखनें का जी करेगा तो क्या करूँगी,

बाहर शोर हो रहा, बच्चे घर को लौटते होंगे,

ऊँगली पकड़कर, घर में लानें का जी करेगा तो क्या करूँगी

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