राहुल गाँधी के 59 दिन के अज्ञातवास के बाद देश की राजधानी में पदार्पण करनें पर पुरानें धुरन्धर काँग्रेसी नेता भले ही दिखावटी रुप से खुश नजर आते हों और सत्ता पर बैठे पार्टी के लोग दिखावटी रुप से नाखुश रहे हों, लेकिन मैं और मेरे मित्र खेदू को उनके आगमन पर बेहद प्रसन्नता हुई और हमारे हृदय को इस बात से राहत मिली कि अब फिर से राजनीति के क्षेत्र में किसी हास्य कलाकार को अपनी प्रतिभा दिखानें का अवसर मिलेगा, जो हमें और हमारे देश की जनता के लिये स्वास्थ्यप्रद सिद्ध होगा ।
देश की हर राजनीतिक पार्टी में कोई ना कोई ऐसा हास्य कलाकार होता है जिसे हास्य से कुछ लेना देना नहीं होता लेकिन जनता उसकी बातों पर खूब ठहाका लगाती है , इस कोटि में आनें वाले नेताओं में लालू यादव शामिल हैं , उनसे बहुत पहले एक समाजवादी नेता राजनारायण जी हुआ करते थे ।
मनमोहन जी नें जब सोनिया गाँधी जी की कृपा से देश को 10 साल तक और कुछ दिया हो या ना दिया हो लेकिन अपनी लाजवाब हास्य प्रतिभा से देश के लोगों को हँसनें के तमाम अवसर प्रदान किये थे, उनके सहयोगी कलाकार के रुप में दिग्विजय सिंह, सुशील कुमार शिन्दे जैसे प्रतिभावान कलाकार थे, लेकिन जनता नें उनकी कला की सराहना तो की लेकिन सम्मान नहीं दिया ।
देश की हर राजनीतिक पार्टी में कोई ना कोई ऐसा हास्य कलाकार होता है जिसे हास्य से कुछ लेना देना नहीं होता लेकिन जनता उसकी बातों पर खूब ठहाका लगाती है , इस कोटि में आनें वाले नेताओं में लालू यादव शामिल हैं , उनसे बहुत पहले एक समाजवादी नेता राजनारायण जी हुआ करते थे ।
मनमोहन जी नें जब सोनिया गाँधी जी की कृपा से देश को 10 साल तक और कुछ दिया हो या ना दिया हो लेकिन अपनी लाजवाब हास्य प्रतिभा से देश के लोगों को हँसनें के तमाम अवसर प्रदान किये थे, उनके सहयोगी कलाकार के रुप में दिग्विजय सिंह, सुशील कुमार शिन्दे जैसे प्रतिभावान कलाकार थे, लेकिन जनता नें उनकी कला की सराहना तो की लेकिन सम्मान नहीं दिया ।
मनमोहन जी के अवकाश ग्रहण के बाद हमारे जैसे टुच्चों और लुच्चों को लगता था कि काँग्रेस के पास अब कोई प्रतिभावान् हास्य कलाकार नहीं रह गया है लेकिन ऐसा नहीं हुआ । राहुल गाँधी नें एक मंजे हुए हास्य कलाकार की तरह देश के लोगों का मनोरंजन करना शुरु कर दिया है । ये अलग बात है कि अभी राहुल गाँधी के अभिनय को देखनें के लिये हमारे देश की जनता खुद को तैयार नहीं कर पा रही है ।
मुझे देश की जनता के हास्य-बोध पर दया आती है । राहुल गाँधी द्वारा किसानों के पक्ष में चिल्लाकर बोलना , हवा में डाँटना, हर बात पर बोलनें के लिये बगल में सलाहकारों की फौज रखना कि अब ये बोलना है - अब ऐसा बोलना है , ये सब उसी हास्यकला का हिस्सा है जिसपर हमारे देश की जनता हँसनें की बजाय - गम्भीर मुद्रा में आ जाती है ।
मैं देश की जनता से पूछता हूँ कि क्या ये जरुरी है कि हर हास्य कलाकार जोर-जोर से ठहाके लगा कर हँसे तभी आप कहेंगे की वह हास्य कलाकार है , क्या आप लोगों नें सुरेन्द्र शर्मा जैसे हास्य कवि को कभी मंच पर हँसते हुए देखा है ? नहीं देखा ना । यही तो मैं कहना चाहता हूँ - राहुल गाँधी जी की बातों पर आप भले ध्यान ना दें लेकिन उनकी बातों में उन हर चीजों पर अतिरिक्त ध्यान दें जिसपर आपको ठहाके लगानें का अवसर मिल सके ।
वैसे भी गौर करनें वाली बात ये है कि देश की राजनीति का मतलब ही हास्य हो गया है । यही नहीं हमारे देश के नेताओं नें देश के सारे विभागों को हास्य-रस प्रधान बनानें का पूरा इंतजाम कर रखा है जहाँ किसी परेशान आदमी का काम हो या ना हो लेकिन परेशान आदमी की फजीहत पर लोगों को हँसनें का अवसर प्रदान करनें का प्रयास जरुर किया जाता है ।
वैसे भी गौर करनें वाली बात ये है कि देश की राजनीति का मतलब ही हास्य हो गया है । यही नहीं हमारे देश के नेताओं नें देश के सारे विभागों को हास्य-रस प्रधान बनानें का पूरा इंतजाम कर रखा है जहाँ किसी परेशान आदमी का काम हो या ना हो लेकिन परेशान आदमी की फजीहत पर लोगों को हँसनें का अवसर प्रदान करनें का प्रयास जरुर किया जाता है ।
राहुल जी बहुत परिश्रम करनें के बाद जनता के सामनें अपनी हास्य-कला का प्रदर्शन करते हैं लेकिन हमारे देश की नासमझ जनता - उच्च कोटि के हास्य को नजर अन्दाज कर देती है तथा निम्म कोटि के हास्य पर ताली बजाती है । ये तो ठीक वैसा ही है जैसे - कोई बहुत अच्छी फिल्म पिट जाये और एक घटिया फिल्म बाक्स आफिस के सारे रिकार्ड तोड़ दे ।







