पुनर्ठेलुआ
भव
ठेलुआ
उसका असली नाम नहीं था बल्कि
लोगों द्वारा दी गई उपाधि थी
। ठेलुआ लोगों की निगाह में
आलसी व अनुपयोगी युवा था ।
घूरे के दिन फिरते हैं । ठेलुआ
के जीवन में भी अचानक परिवर्तन
हुआ । मोदी जी नें 8
नवम्बर
को 8.00
बजे
रात में नोट-बन्दी
का एलान कर दिया । ठेलुआ नें
टी.वी.
पर
न्यूज सुना । उसमें नई उर्जा
का संचार हुआ । ठेलुआ के जिम्मे
एक ऐसा काम आया जिसनें उसे एक
अत्यन्त उपयोगी व्यक्ति बना
दिया । ठेलुआ को उसके घर वालों
व अगल-बगल
के लोगों नें नोट बदलनें की
जिम्मदेारी सौंपी । ठेलुआ को आज
अपनी वास्तविक योग्यता का
अहसास हुआ । ठेलुआ 9
नवम्बर
2016
से
अपनें कर्तव्य को पूरी लगन व
निष्ठा के साथ निभानें के लिये
सुबह से शाम तक बैंक के आगे
लाईन में खड़ा रहनें का काम
करनें लगा । ठेलुआ अत्यन्त
व्यवहार कुशल था । कोई वृद्ध,
महिला
या बीमार लाईन में नहीं लग
पाता या पीछे रहता तो ठेलुआ
उसे अपनी जगह खड़ा कर देता और
खुद सबसे पीछे लाईन में जाकर
खड़ा हो जाता । शाम को वह थका
हारा खाली हाथ घर वापस आता और
लोगों को बताता कि जब तक उसका
नम्बर आता बैंक में नोट ही
खत्म हो जाता है ।
ठेलुआ
के दिन मजे से गुजर रहे थे ।
वह अपनें घर वालों के अलावा
अपने पड़ोसियों का भी चहेता
बन गया था । अब लोग उसे उसके
वास्तविक नाम से ही बुलानें
लगे थे । एक दिन तो वह बैंक के
काऊंटर के पास पहुँच कर रुपया
बदलनें ही वाला था कि एक बुजुर्ग
बेहोश होकर गिर गये । ठेलुआ
काऊन्टर छोड़कर तुरन्त बुजुर्ग
के पास गया और उनके परिजनों
को सांत्वना देनें लगा । उस
दिन भी वह पुनः खाली हाथ घर
वापस आया । ठेलुआ की यह संवेदनशीलता
वाली क्रिया रोज चलती । ठेलुआ
पत्रकारों और टी.वी.
वालों
के आनें पर अपनी कतार को छोड़कर
उनके पास जाकर खड़ा हो जाता
और रुपया न बदल पानें की शिकायत
करता ।
दिसम्बर
माह आते-आते
ठेलुआ का उत्साह कम होनें लगा
क्योंकि अब लाईनें कम होनें
लगीं थीं । उस दिन ठेलुआ हमेशा
की तरह कतार में सबसे पीछे
खड़ा था । तभी कुछ पुलिस वाले
आकर ठेलुआ को पकड़ लिये और
रोज-रोज
लाईन में खड़े होनें के बारे
में पूछ-ताछ
करनें लगे । ठेलुआ नें बताया
कि उसे भीड़ के कारण आज तक एक
भी नोट बदलनें का मौका नहीं
मिला है । पुलिस वाले ठेलुआ
को लेकर बैंक मैनेजर के पास
गये और ठेलुआ के पास रखे 4
हजार
रुपये के पुरानें नोट के बदले
दो हजार के दो गुलाबी नोट
दिलवाये । ठेलुआ को पुलिस की
यह हरकत अच्छी नहीं लगी,
क्योंकि
उसनें अपनें पराक्रम से वे
नोट हासिल नहीं किये थे । ठेलुआ
उदास मन से घर वापस आया ।
ज्यों-ज्यों
बैंक के सामनें कतारें कम होती
जाती ठेलुआ का मन उसी मात्रा
में दुखी हो जाता । 30
दिसम्बर
2016
के
बाद ठेलुआ "पुनर्ठेलुआ
भव"
रह
गया ।
ठेलुआ
अब फिर से एक अनुपयोगी प्राणी
रह गया है । काश,
नोटबन्दी
का एलान एक बार और होता तो ठेलुआ और उसके जैसे बहुत से लोगों
को अपनी उपयोगिता साबित
करनें का मौका मिलता । 
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